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अब मुश्किल है कज्ज़ाफी का बचना

Rastriya Sahara, 22 March 2011 : लीब्या ने ज्यों ही संयुक्तराष्ट्र के ‘उड़ान-निषिद्घ क्षेत्र्’ के प्रस्ताव को माना तो ऐसा लगा कि इस अरब राष्ट्र में शायद बातचीत से शांति लौट आएगी| ट्यूनीसिया और मिस्र की तरह कोई संतोषजनक समाधान निकल आएगा लेकिन लीब्याई तानाशाह मुअम्मर कज्ज़ाफी ने लड़ाकू जहाज उड़ाना तो बंद कर दिए लेकिन पूर्वी लीब्या के शहरों पर अपने फौजी हमले जारी रखे| उन्होंने कई शहरों पर अपने टैंक और पैदल सैनिकों को चढ़ा दिया| वे भूल गए कि सं.रा. प्रस्ताव में सुरक्षा परिषद ने यह भी कहा था कि लीब्या के आक्रमणग्रस्त नागरिकों की रक्षा भी उसका कर्त्तव्य है| यह दूसरा प्रावधान पहले प्रावधान से अधिक व्यापक और गंभीर है|

नागरिकों की सुरक्षा के नाम पर पश्चिमी राष्ट्र कुछ भी कर सकते हैं| वे ज़मीन, आकाश और समुद्र – तीनों से हमले कर सकते हैं| यदि सं. रा. प्रस्ताव केवल उड़ान बंद करने तक सीमित होता तो कज्ज़ाफी ने अपने जहाज उड़ाना तो बंद कर ही दिए थे| सारा झगड़ा खत्म हो जाना चाहिए था लेकिन पश्चिम राष्ट्रों को पता था कि कज्ज़ाफी हुस्नी मुबारक और बिन अली की तरह कमजोर आदमी नहीं है| वह आखिरी दम तक लड़ेगा| उसके अपने कबीले- कज्ज़ाफ के लड़ाकू लोग शेष लीब्या को डंडे के जोर पर चुप कर देंगे| इसलिए फ्रांस, बि्रटेन और अमेरिका ने अपनी सेनाओं के तीनों अंगों को सकि्रय कर दिया है| यदि पश्चिमी राष्ट्र सिर्फ उड़ान-निषेध के लक्ष्य से बंधे रहते तो शायद लीब्या में वही हालत होती जो नौवें दशक में एराक और बोस्निया में हुई थी| जैसे सद्दाम हुसैन और मिलोसविच बरसों टिके रहे, वैसे ही कज्ज़ाफी भी टिके रहते|

लेकिन अब लगता है कि कज्ज़ाफी का टिके रहना मुश्किल है| एक ही दिन में फ्रांस और बि्रटेन ने मिलकर ढाई सौ प्रक्षेप्रास्त्र् छोड़ दिए हैं| ये प्रक्षेप्रास्त्र् किन्हीं हवाई जहाजों को गिराने के लिए नहीं मारे गए हैं| इनके द्वारा बेंगाजी शहर की तरफ बढ़ते हुए कज्ज़ाफी के टेंकों को मार गिराया गया है, लीब्या के लगभग सभी फौजी ठिकानों और भंडारों को निशाना बनाया गया है| कज्ज़ाफी के महल को भी नहीं बख्शा गया है| अमेरिकी प्रवक्ता का कहना है   कि इस फौजी कार्रवाई का निशाना स्वयं कज्ज़ाफी नहीं है| उसने दावा किया है कि इस शुरूआती पश्चिमी हमले ने कज्ज़ाफी की फौज के घुटने तोड़ दिए हैं| पश्चिमी हमला इतना जबर्दस्त रहा कि कज्ज़ाफी की फौजें जहां थीं, वहीं ठप्प हो गई हैं| दो दिन पहले तक बेंगाजी और ब्रेगा के जो बागी सैनिक हताश हो रहे थे, उनमें  नए उत्साह का संचार हो गया है|

फ्रांस ने तो लगभग एक हफ्ते पहले से ही लीब्या की वैकल्पिक बागी सरकार को मान्यता दे दी थी| फ्रांसीसी राष्ट्रपति सारकोज़ी उनके साथ निरंतर संपर्क में है| जाहिर है कि पश्चिमी राष्ट्रों ने इतना गंभीर कदम इसलिए नहीं उठाया है कि वे किसी तरह युद्घ बंद करवा दें| उन्हें पता है कि कज्ज़ाफी अपनी तलवार तब तक म्यान में नहीं डालेंगे जब तक कि उनकी कमर न टूट जाए| यह हमला उनकी कमर तोड़ने के लिए ही किया गया है| यदि पश्चिमी राष्ट्र अब झिझकेंगे और लक्ष्य की प्राप्ति नहीं करेंगे तो पश्चिम एशिया में उनकी कमर टूट जाएगी| पश्चिमी राष्ट्रों को सबसे तगड़ा समर्थन तो अरब लोग का ही मिला है| अरब लीग ने बाक़ायदा प्रस्ताव पारित करके संयुक्तराष्ट्र संघ और पश्चिमी राष्ट्रों से आग्रह किया था कि वे कज्ज़ाफी के विरूद्घ कार्रवाई करें| वास्तव में किसी एक भी अरब राष्ट्र ने संयुक्तराष्ट्र की कार्रवाई का विरोध नहीं किया है| बल्कि मोरक्को, संयुक्त अरब अमारात और क़तार जैसे राष्ट्र पश्चिमी राष्ट्रों के स्वर में स्वर मिलाकर कज्ज़ाफी के विरूद्घ खड्रगहस्त हैं| सउदी अरब, जोर्डन और मिस्र ने भी कज्ज़ाफी के विरूद्घ काफी सकि्रयता दिखाई है| इस समय पश्चिमी राष्ट्र एराक, अफगानिस्तान और लीब्या में जिस तरह एक साथ उलझे हैं, पहले कभी नहीं उलझे| अरब राष्ट्रों  के शासक तो पश्चिमी राष्ट्रों  के साथ हैं लेकिन अरब जनता पश्चिमी हस्तक्षेप को बिल्कुल भी पसंद नहीं करती| इसे वह अपनी अरब अस्मिता पर सीधा प्रहार मानती है और यह भी मानती है कि हर पश्चिमी हमले के पीछे असली इरादा यही होता है कि अरब तैल, गैस और खनिजों पर कब्जा किया जाए| इसीलिए अगर लीब्या अफगानिस्तान और एराक़ की तरह लंबा खिंच गया तो पश्चिम को लेने के देने पड़ जाएंगें| संयुक्तराष्ट्र की प्रतिष्ठा भी चौपट हो जाएगी|

लीब्या के विरूद्घ सैन्य कार्रवाई का भारत, रूस और चीन जैसे राष्ट्र स्पष्ट विरोध कर रहे हैं| उन्होंने सुरक्षा परिषद में भी लीब्या-विरोधी प्रस्ताव का साथ नहीं दिया| उधर कज्ज़ाफी कह रहे हैं कि वे अपने देश से पश्चिमी राष्ट्रों से व्यापार बंद करेंगे और अपने तेल के ठेके भारत और चीन को दे देंगे| भारत, रूस और चीन की बात जाने दें, खुद ओबामा ने कहा है कि अमेरिकी सैनिक लीब्या में नहीं लड़ेंगे| जाहिर है कि वे लीब्या को दूसरा वियतनाम बनता हुआ नहीं देखना चाहते| लीब्या की लड़ाई में असली नेतृत्व यूरोप का है और यूरोप में भी फ्रांस का है| इस समय पेरिस ही लीब्या-युद्घ का मुख्यालय बना हुआ है| कज्ज़ाफी की कोशिश है कि अमेरिका और यूरोप में दरार डाल दी जाए लेकिन यह संभव नहीं दीखता| इस हमले के विरूद्घ कज्जाफी जबर्दस्त तर्क-तीर चला रहे हैं लेकिन इस समय दुनिया में उनकी सुननेवाला कोई नही|

यदि स.रा. हस्तक्षेप नहीं करता तो लीब्या में या तो लड़ाई लंबी चलती या कज्ज़ाफी अपने विरोधियों को बुरी तरह कुचल डालते लेकिन अब कज्ज़ाफी क्या करेंगे ? उनके पास भागने के अलावा कोई चारा नहीं रह गया है| पश्चिमी हमलों से बेकसूर नागरिक भी मारे जा रहे हैं| लेकिन इसे बहाना बनाकर कज्ज़ाफी अपनी खाल नहीं बचा सकते| यदि सचमुच वे लीब्या और अपनी जनता को प्यार करते हैं तो उन्हें शीघ्रातिशीघ्र आत्म-समर्पण कर देना चाहिए| उनके हटे बिना लीब्या में शांति नहीं हो सकती|

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