क्या हिंदुत्व भारतीयता है ?
नवभारत टाइम्स, 3 जनवरी 2003 : भारत का प्रधानमंत्री क्या करे ? वह अपना पिण्ड कैसे छुड़ाए ? हिंदुत्व को भारतीयता और भारतीयता को हिंदुत्व बता देना सबसे सरल रास्ता है लेकिन सरल रास्ते पर भी संघ और विहिप ने काँटे बिछा दिए हैं| वे अटलजी को उनकी पुरानी कविताओं की याद दिला रहे हैं| हिन्दू तन, हिन्दू मन, हिन्दू जीवन ! आखिर वे सिद्घ क्या करना चाहते हैं ? वे वही सिद्घ करना चाहते हैं, जो अटलजी ने कहा है याने हिंदुत्व और भारतीयता एक-दूसरे के पर्याय हैं| फिर मतभेद कहाँ है ? मतभेद केवल यहाँ है कि हमारे हिन्दुत्व को संकीर्ण क्यों बताया जा रहा है ? सवाल यह है कि प्रधानमंत्री ने यह सवाल क्यों पूछा ? अर्थात्र बहस का असली मुद्दा हिन्दुत्व और भारतीयता नहीं है बल्कि ‘कृतघ्नता’ है| जिस हिन्दुत्व की सीढ़ी पर चढ़कर आप प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँचे, अब आप उसी हिन्दुत्व को लात लगा रहे हैं| हिन्दुत्व अब भी वैसा ही है, जैसा कि वह तब था जबकि आप साधारण कार्यकर्ता की तरह इस धारा में बह रहे थे| सावरकर और गोलवलकर के ‘हिन्दुत्व तथा सुदर्शन और अशोक सिंहल के हिन्दुत्व में क्या अंतर है ? हिन्दुत्व की अवधारणा में तो कोई परिवर्तन नहीं हुआ है तो क्या श्री अटलबिहारी वाजपेयी में कोई परिवर्तन हो रहा है ?
यह समझना सबसे बड़ी भूल होगी| न हिन्दुत्व की अवधारणा में कोई परिवर्तन हुआ है और न ही अटलजी में| ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री पद मिल जाने के कारण अटलजी अपने विचारों को बदल रहे हैं| वे प्रारंभ से ही हिन्दुत्व और भारतीयता को एक-दूसरे का पर्याय समझते रहे हैं| इस मामले में वे कभी दुविधा में नहीं रहे बल्कि सदा सुविधा में रहे| हिन्दुत्व उनके लिए रबड़ का छल्ला बना रहा| जब जरूरत पड़ी, उसे खींचकर भारतीयता बना दिया और जरूरत नहीं रही तो वह अपने आप सिकुड़कर हिन्दुत्व बन गया| इस रबरछन्द के उद्रगाता का ही दूसरा नाम है, अटलबिहारी वाजपेयी ! अटलजी जनसंघ और भाजपा के लिए अपरिहार्य क्यों बने रहे ? उनके बिना हिन्दुत्ववादियों की गाड़ी आगे क्यों नहीं बढ़ती ? हिन्दुत्व का रथ तो आडवाणीजी ने मुकाम पर पहुँचाया लेकिन उस पर अभिषेक अटलजी का हुआ ? क्यों हुआ ? इसीलिए कि हिन्दुत्व के सवाल पर भ्रम बनाए रखने की कला में अटलजी निष्णात हैं| बहस है, सावरकर और गोलवलकर के हिन्दुत्व पर और अटलजी ने पर्दा टांग रखा है, अरविन्द और विवेकानंद के हिन्दुत्व का ! वे जान-बूझकर भ्रम बनाते हैं या स्वयं ही भ्रमित हैं, यह कहना कठिन है| ज्यादा संभावना यह है कि जिसे हम भ्रम कहते हैं, उसे ही वह सत्य समझते हों| यह अटलजी का सत्य है कि हिन्दुत्व ही भारतीयता है और भारतीयता ही हिन्दुत्व !
हिन्दुत्व और भारतीयता को एक-दूसरे का पर्याय अब से लगभग 80 साल पहले वि.दा. सावरकर ने माना था| उन्होंने अपनी प्रसिद्घ पुस्तक ‘हिन्दुत्व’ में कहा था कि जिसके पितृभू और पूण्यूभू, दोनों ही भारत में हों, वह हिन्दू है याने जिनके पुरखे भारतीय हों और जिनके पूजा-आस्था स्थल भी भारत में ही हों, केवल वे ही हिन्दू हैं| इस परिभाषा के आधार पर मुसलमान, सिख, ईसाई, यहूदी आदि अहिन्दू सिद्घ हुए| भारत हिन्दू राष्ट्र है, इसीलिए जो अहिन्दू है, वह अराष्ट्रीय है| यह बहस सावरकर ने जब चलाई, तब भारत में मुस्लिम लीग जोर पकड़ रही थी, खिलाफत का आंदोलन चल रहा था, यूरोप में मुसोलिनी और हिटलर का उदय हो रहा था| वही 80 साल पुरानी बहस अब भी जारी है| हिन्दुत्व और भारतीयता, दोनों के स्वरूप में अब जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है| यदि इस अंतर को ठीक से समझ लिया जाए तो हिन्दुत्व के सवाल पर भ्रम फैलने या फैलाने की गुंजाइश ही नहीं रह जाएगी|
मूल प्रश्न यह है कि क्या प्रत्येक हिन्दू भारतीय है और प्रत्येक भारतीय हिन्दू है ? ये दोनों ही मान्यताएँ गलत हैं| हिन्दू केवल भारत में ही नहीं हंै| वे अब दुनिया के लगभग 50 देशों में हजारों की संख्या में रहते हैं| नेपाल, मोरिशस, त्र्िानिदाद, गयाना, फीजी, श्रीलंका, इण्डोनेशिया और अमेरिका जैसे देशों में उनकी संख्या लाखों में है| कुछ देशों में वे डेढ़-दो सौ साल से हैं और कुछ में वे शताब्दियों से हैं| वे पक्के हिन्दू हैं लेकिन वे भारतीय नहीं हैं| वे भारत के नागरिक नहीं हैं| उन्हें भारतीय मानना अन्तरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है| इसी प्रकार अनेक अमेरिकी, यूरोपीय और अफ्रीकी नागरिक पिछले कुछ वर्षों में हिन्दू बने हैं लेकिन वे भारत के नागरिक नहीं बने हैं| उनका पुण्यभ्ाू भारत अवश्य है लेकिन पितृभू तो उनका अपना देश है| इसीलिए यह जरूरी नहीं कि जो हिन्दू होगा, वह भारतीय भी होगा|
इसी प्रकार प्रत्येक भारतीय को हिन्दू नहीं कहा जा सकता| यह ठीक है कि ‘सिन्धु’ से ‘हिन्दू’ बना है और सिन्धु-प्रदेश में रहनेवाले हर व्यक्ति को कभी हिन्दू ही कहा जाता था, चाहे उसका मज़हब या जाति कुछ भी हो लेकिन वह सिन्धु नदी और वह सिन्धु-प्रदेश अब तो पाकिस्तान में हैं| क्या अब हर पाकिस्तानी को आप हिन्दू कहेंगे ? जहां तक भारतीयों का सवाल है, आप किसी को भी जबर्दस्ती हिन्दू कैसे कह सकते हैं ? यह ठीक है कि हिन्दुत्व शब्द बहुत लचीला है| उसकी कोई सुनिश्चित परिभाषा नहीं| उसे जीवन-पद्घति या संस्कृति भी कह सकते हैं लेकिन क्या कोई मुसलमान और ईसाई या यहूदी स्वयं को हिन्दू कहने के लिए तैयार होगा ? ‘मुहम्मदी हिन्दू’ और ‘मसीही हिन्दू’ सिर्फ कहने की बातें हैं| केवल कल्पना है| क्या कोई मुहम्मदी हिन्दू राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सर संघचालक बन सकता है ? ज़ाकिर हुसैन और अब्दुल कलाम भारत गणराज्य के सर्वोच्च पद पर पहुँच सकते हैं लेकिन उन्हें क्या संघ या विहिप के सर्वोच्च पद पर विभूषित किया जा सकता है ? नहीं, क्योंकि हिन्दुत्ववादी उन्हें कभी हिन्दू मानने को तैयार नहीं होंगे| इसीलिए हिन्दुत्व और भारतीयता को एक-दूसरे का पर्याय बताना कहाँ तक तर्कसंगत है ? स्वयं ‘हिन्दू’ शब्द भारतीय नहीं है| यह शब्द हमारी पहचान के लिए विदेशियों ने गढ़ा था| किसी वेद, उपनिषद्र, गीता, रामायण या महाभारत में हिन्दू शब्द कहीं नहीं आता है| सावरकरजी जिसे ‘पितृभूमि’ कहते हैं, वह शब्द भी हमारे किसी शास्त्र में नहीं आता| हमारा शब्द मातृभूमि है| जर्मनों का पितृभूमि| यह विचित्र है कि अभारतीयों द्वारा दिए गए इन शब्दों को हम भारतीयता का पर्याय बता रहे हैं| चार-पाँच सौ साल पहले प्रचलित किए गए इस विदेशी शब्द में हजारों वर्ष पुराने भारत को कैसे कैद किया जा सकता ? यों धर्म और संस्कृति के तौर पर ‘हिन्दुत्व’ की ध्वजा उठाए रखने में कोई बुराई नहीं है| उसकी उदारता, व्यापकता और आध्यात्मिकता सारे विश्व के लिए कल्याणकारी है लेकिन हिन्दुत्व को राष्ट्रवाद का आधार कैसे बनाया जा सकता है ? मज़हब के आधार पर राष्ट्र की बात को भारत 1947 में ही रद्द कर चुका है| अब हिन्दू राष्ट्र की बात करके क्या हम मुस्लिम राष्ट्र के पुराने नारे को उचित नहीं ठहराएँगे ? क्या हम भारत के एक और विभाजन की नींव पक्की नहीं कर रहे हैं ? क्या गोलवलकरवादी वही राह पकडेंगें, जो 55 साल पहले जिन्नावादियों ने पकड़ी थी ?
इसमें संदेह नहीं कि तथाकथित हिन्दुत्व के बिना भारत की कल्पना नहीं की जा सकती और भारत के बिना हिन्दुत्व भी अकल्पनीय है लेकिन भारतीयता और हिन्दुत्व एक ही हैं, यह बात न तो तर्क की कसौटी पर खरी उतरती है और न ही भारत को बलवान बनाती है| भारत राष्ट्र को आप ज्यों ही हिन्दू राष्ट्र कहते हैं, सेक्यूलरवादी तुरंत साझा संस्कृति (कम्पोजि़ट कल्चर) की बात करने लगते हैं याने जैसे कि भारत की अपनी कोई संस्कृति ही न हो और इधर-उधर से आई हुई कई संस्कृतियाँ मिलकर भारत को साझेदारी में चला रही हों| यह भारत की अस्मिता, शाश्वत धारावाहिकता और राष्ट्रीयता पर सीधी चोट है| अनेक अभारतीय धाराएँ भारत में आई हैं और आत्मसात हो गई हैं| अब उन्हें अहिन्दू या अल्पसंख्यक आदि का नाम देकर जिन्दा रखना भारत की एकता को खतरा पहुँचाना है लेकिन जब तक बहुसंख्यक रहेगा, अल्पसंख्यक भी रहेगा और जब तक हिन्दू रहेगा, अहिन्दू भी रहेगा| यदि भारतीय राष्ट्रवाद का आधार ‘हिन्दुत्व’ होगा तो ‘हम’ और ‘वे’ का अंतर सदा बना रहेगा| इसीलिए यह कहीं बेहतर है कि हिन्दू राष्ट्रवाद की बजाय भारतीय राष्ट्रवाद की बात की जाए| भारत में अभारतीय को दोयम दर्जा दिया जा सकता है लेकिन अहिन्दू को दोयम दर्जा देंगे तो क्या संविधान का उल्लंघन नहीं होगा ? हर अहिन्दू भी उतना ही भारतीय है, जितना कि कोई हिन्दू| इसीलिए भारतीयता और हिन्दुत्व एक-दूसरे के पर्याय नहीं है, प्रधानमंत्रीजी !