गोली का अंत बोली से ही

राष्ट्रीय सहारा, 27 जुलाई 2011 : अगर आपसे कोई पूछे कि आज विश्व की सबसे गंभीर समस्या क्या है तो आपका जवाब क्या होगा ? शायद यही कि आतंकवाद से ज्यादा खतरनाक कोई और समस्या नहीं है| यों तो समस्याऍं कई हैं| जैसे अमेरिका और यूरोप का आर्थिक संकट, भारत और चीन जैसे देशों में आर्थिक विषमता, गरीबी, पर्यावरण आदि लेकिन ये सब समस्याएँ आतंकवाद के मुकाबले दूरगामी और दीर्घकालीन मालूम पड़ती हैं जबकि आतंकवाद ऐसे भूत की तरह है, जो आपके सिर पर सवार हो जाता है और उसके सामने आते ही शेष सारे काम ठप्प हो जाते हैं| न्यूयार्क का ट्रेड टॉवर हो, मुंबई का ताज होटल हो या लंदन की मेट्रो, कहीं भी आतंकवाद यदि सिर उठाता है तो सारे संसार में सनसनी फैल जाती है|

आतंकवादियों ने अभी तक रेलों, जहाजों, होटलों और संसदों पर ही हमले किए हैं| यदि वे किसी परमाणु-संयंत्र् पर कब्जा कर सके तो हम सोच भी नहीं सकते कि दुनिया में कैसे तबाही मच सकती है| हर परमाणु-शक्ति संपन्न राष्ट्र के पास इतने परमाणु बम है कि हमारी दुनिया एक बार नहीं, कई बार नष्ट की जा सकती है| यह खतरा काल्पनिक नहीं है| सगुण-साकार है| पाकिस्तान के मेहरान सैन्य अड्रडे पर यदि आतंकवादी कब्जा कर सकते हैं तो वे उसके परमाणु-संयंत्रें पर क्यों नहीं कर सकते ? इस्राइल के परमाणु संयंत्र् भी खतरे से बाहर नहीं है|

आतंकवादी चाहें तो दो राष्ट्रों या दो जन-समुदायों के बीच भयंकर युद्घ की स्थिति भी पैदा कर सकते हैं| किसी देश के परमाणु-परिसरों पर अपहत जहाज को गिराकर वे युद्घ का ऐसा माहौल खड़ा कर सकते हैं कि कोई भी राष्ट्र अपने प्रतिद्वंदी राष्ट्र पर तत्काल हमला बोल दे| जिन राष्ट्रों में आतंकवादियों को किसी खास मज़हब या जाति से जोड़कर देखा जाता है, उनके विरूद्घ आक्रोश के बादल कभी भी फट सकते हैं|

आतंकवाद पर यदि काबू नहीं पाया गया तो राष्ट्रों की सारी समृद्घि, सारी सुरक्षा और सारी खुशहाली पर पलक झपकते ही पानी फिर सकता है| दशकों के परिणाम से निर्मित सभ्यता का विनाश कुछ ही क्षणों में हो सकता है| इसीलिए आतंकवाद विश्व की सबसे खतरनाक समस्या बन गई है|

इस समस्या का मुकाबला करने के लिए दुनिया के शक्तिशाली और कमजोर राष्ट्रों ने क्या-क्या कदम नहीं उठाए| अमेरिका और बि्रटेन जैसे राष्ट्रों ने अपने-अपने देश को एक मजबूत किला बना दिया है| अब वहॉं पंछी भी पर नहीं मार सकते| राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए उन्होंने अरबों रू0 के नए प्रावधान किए| अपने जहाजों, रेलों, भवनों और बस्तियों पर जबर्दस्त पहरेदारी कायम कर दी| देश के करोड़ों लोगों पर चौबीसों घंटों की निगरानी लागू कर दी| विशेष कानून बनाकर सरकारों को ऐसे छूट दे दी कि वे आतंकवाद को सिर उठाने के पहले ही कुचल सकें| इस मुस्तैदी का असर दिखाई भी पड़ रहा है| इन देशों में पिछले कई वर्षों से कोई आतंकवादी घटना नहीं घटी| कुछ संभावित आतंकवादियों को उन्होंने पहले ही पकड़ लिया|

लेकिन भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे राष्ट्रों का हाल कुछ और ही है| अभी एक घटना से बहा खून सूख भी नहीं पाता कि दूसरी घटना खून के नए फव्वारे छुटा देती है| इसकी वजह क्या है ?

हम यह न भूलें कि संसार भर के आतंकवाद की जड़ यहीं है| पाकिस्तान में है| पाकिस्तान से प्रभावित अफगान इलाकों में है| इन्हीं इलाकों के आतंकवादियों ने अमेरिका से लेकर इंडोनेशिया तक अपना आतंक का साम्राज्य फैला लिया है| पश्चिम के शक्तिशाली देशों ने अपने भूभागों को किसी तरह सुरक्षित कर लिए हैं लेकिन आतंकवाद की असली जड़ें तो आज भी हरी हैं| आतंकवाद के विरूद्घ शुरू किया गया उनका विश्व-अभियान अभी तक कहीं नहीं पहुंचा है| हर रोज़ वे करोड़ों डॉलर पानी की तरह बहा रहे हैं और हर रोज़ उनके दर्जनों जवान मारे जा रहे हैं लेकिन वे अभी तक आतंकवाद की पूंछ भी नहीं पकड़ पाए हैं| वे अपना-सा मुंह लेकर जल्दी से जल्दी अपने घर लौट जाना चाहते हैं|

आतंकवाद से उनका पिंड छूट जाएगा| यह असंभव है| आतंकवादियों को जब अपने खेल के लिए खुला मैदान मिलेगा तो उनकी पहुंच अमेरिका तक बहुत आसानी से हो जाएगी| अपनी तकनीक और शास्त्रें के दम पर पश्चिमी राष्ट्र आतंकवाद का मुकाबला नहीं कर पाएंगें| आतंकवादी अपने इरादों को अंजाम देने में सफल क्यों होंगे ? ऐसा क्या है, जो उनमें इतनी प्राणशक्ति भर देता है ?

वह है, बेकसूर लोगों पर हुआ अत्याचार | अमेरिका इस अत्याचार का प्रथम अपराधी ळै| आदिम दोषी है| सद्दाम हुसैन की हत्या उसने क्यों की ? एराक़ पर उसने कब्जा क्यों किया ? इस्राइल को उसने अरबों की छाती पर भाले की तरह क्यों गाड़ रखा है ? अफगानिस्तान को वह अपने पांवों पर क्यों खड़े नहीं होने दे रहा है ? मुअम्मर कज्जाफी पर वह बिना बात ही बम क्यों बरसा रहा है ? उसने ईरान के गले में फंदा क्यों डाल रखा है? उसने फौज को पाकिस्तान की नकेल क्यों थमा रखी है ? वह सउदी अरब जैसे भ्रष्ट शासकों के देश के साथ सांठ-गांठ क्यों किए हुए है ? वह इस्लाम की जड़ों में मट्रठा क्यों डाल रहा है ? आतंकवादियों के ये तर्क अतिरंजित जरूर हैं लेकिन ये बिल्कुल बेबुनियाद नहीं हैं|

अमेरिका के पास इन तर्कों का कोई जवाब नहीं है| वह बोली का जवाब गोली से देता है| वह अपनी गलती मानने को तैयार नहीं है| ओबामा ने राष्ट्रपति बनते ही काहिरा विश्वविद्यालय से इस्लामी जगत के बारे में जो भाषण दिया था, वह काफी अच्छा था लेकिन वह जबानी जमा-खर्च से बेहतर सिद्घ नहीं हुआ| आज तक अमेरिका ने न तो फलस्तीनियों को न्याय दिलाने के लिए कोई ठोस पहल की, न सद्दाम की हत्या का प्रायश्चित किया और न ही अफगानिस्तान के तालिबान के साथ कोई सार्थक बात चलाई| विश्व-शक्ति के अहंकार में चूर होकर अब तक उसने जो जुल्म किए, उनके लिए उसने सच्चे दिल से आज तक किसी से माफी नहीं मांगी| अमेरिका का यह रवैया जब तक जारी रहेगा, दुनिया में उसके खिलाफ आतंकवाद भी किसी न किसी रूप में जिंदा रहेगा| जिन पर जुल्म हुए हैं, वे आखिरकार इंसान ही हैं| पशु भी बदला लेते हैं तो इंसान चुप कैसे बैठ जाएंगें ?

जहां तक भारत-जैसे देशों में आतंकवाद के जारी रहने का सवाल है, इसके कई कारण हैं| पहला तो यही है कि इनकी शासन-व्यवस्था लचर-पचर है| इनके गुप्तचर, पुलिसकर्मी, अफसर और नेता सभी गफलत में जीते हैं| आम जनता में भी आवश्यक सर्तकता नहीं है| दूसरा, भारत को पाकिस्तान-जैसा पड़ौसी देश मिला हुआ है| आतंकवाद का निर्यात उसका राष्ट्रधर्म है| यदि अमेरिका के साथ केनाडा वही करता, जो पाकिस्तान भारत के साथ करता रहता है तो अब तक अमेरिका के होश फाख्ता हो जाते| तीसरा, भारत की जनता विविधरूपा है| इस्लाम के नाम पर झूठा जिहाद छेड़नेवाले आतंकवादियों को छिपने और हमला करने के लिए सुरक्षित शरण मिल जाताी है| बेकसूर लोग उनके जाल में फंस जाते हैं| अमेरिका में ऐसे लोगों की संख्या नगण्य है| सरकार उन सब पर कड़ी निगरानी रखती ळै| भारत में यह असंभव है| चौथा, अमेरिका में तकनीक इतनी विकसित है कि आतंकवादियों पर नज़र रखना और उन्हें पकड़ लेना कहीं अधिक आसान है| पांचवॉं, भारत में आतंकवाद के पनपने के पीछे कश्मीर और गुजरात की घटनाऍं प्रमुख हैं| कश्मीर और गुजरात में क्या ज्यादतियॉं नहीं हुई हैं ? निहत्थे और बेकसूर लोगों पर जब सामूहिक हमले होंगे तो क्या उनमें से कुछ लोग बदला लेने के लिए अपनी कमर नहीं कसेंगे ? क्या आज तक किसी ने सच्चे दिल से उनसे माफी मांगी ? क्या उन्हें शांति से बैठकर समझाने की कोशिश की ?

जो स्थिति भारत में है, उससे भी बदतर पाकिस्तान में है| फौजी शासन ने पाकिस्तान के नेताओं और जनता को अपना गुलाम बना रखा है| वह खुद अमेरिका की कठपुतली बना हुआ है| पाकिस्तानी आतंकवाद आयतित नहीं है| वह उस दमघोंटू व्यवस्था की ही संतान है| अफगान आतंकवाद उसी का विस्तार है| इन सभी आतंकवादों से इन व्यवस्थाओं का कोई सीधा संवाद नहीं है| ये समझती हैं कि हम लाठी-गोली से काबू पा लेंगे| यह गलतफहमी है| हिंसा का अंत हिंसा से कैसे होगा ? संसदीय लोकतंत्र् का यह तकाज़ा है कि एक जबर्दस्त संवादतंत्र् कायम किया जाए| संवाद ही लोकतंत्र् का ब्रह्मास्त्र् है| यह ब्रह्मास्त्र् जंग क्यों खा रहा है ? गोली का मुकाबला गोली से जरूर करें लेकिन गोली का अंत बोली से ही होगा, यह न भूलें|

 

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