अन्ना पार्टी : गांधी को शीर्षासन

दैनिक भास्कर, 8 अगस्त 2012: जन-आंदोलन की दो पटरियों में से एक पटरी बिल्कुल उखड़ गई है। एक बाबा रामदेव की पटरी और दूसरी थी अन्ना हजारे की पटरी। अन्ना हजारे को हमारे कुछ पत्रकार भाई गांधीवादी कहते नहीं थकते, लेकिन बेचारे अन्ना ने अपने ताजा फैसले से गांधी को शीर्षासन करवा दिया। आजादी के बाद गांधी कहते थे कि कांग्रेस पार्टी की जरूरत नहीं है। उसे भंग करो। लोक-सेवक संघ बनाओ। अन्ना ने जन-आंदोलन को भंग कर दिया और कहा कि पार्टी बनाओ।

अन्ना की इस अदा पर मैं फिदा हूं। वह कहते हैं कि इस पार्टी से मेरा कोई लेना-देना नहीं है। मैं इसमें नहीं हूं, लेकिन इसकी मदद पूरी करूंगा। गांव-गांव घूमूंगा। अच्छे उम्मीदवार चुनूंगा। चुनाव खुद नहीं लड़ूंगा, लेकिन उनको लड़वाऊंगा। वाह! क्या अद्भुत अदा है? लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं। फारसी की एक कहावत है, जिसका भारतीय लहजे में अनुवाद करें तो यूं होगा कि ‘फेरे मैं पड़ूंगा, लेकिन बच्चे तुम पैदा करो।’ इस दुविधा में से पैदा हुई पार्टी का भविष्य क्या होगा, इसका अनुमान एक बच्चा भी लगा सकता है।

पार्टी बनाना गलत नहीं है। वास्तव में बहुत अच्छा है, लेकिन आप गए तो थे रामभजन को और ओटने लगे कपास। अरे भई, पार्टी ही बनानी थी तो पिछले अगस्त में ही बना लेते। क्या मालूम कागज (अखबार) और परदे (टीवी) के शेर सचमुच असली शेरों में बदल जाते, लेकिन अब जब मुंबई और दिल्ली के अनशनों ने ‘शेरों’ को मिमियाती भेड़ों में बदल दिया तो आपको पार्टी बनाने की सूझी। पार्टी के नाम से प्रचार का कुछ न कुछ जुगाड़ तो बैठ जाएगा, लेकिन आपके अचानक अनशन तोडऩे ने जनता को जो धक्का पहुंचाया है, उसका आजाद भारत में कोई सानी नहीं है। इन अनशनों ने भारत की जनता को जिस तरह बेदार किया था, यदि वे उनकी तार्किक परिणति तक पहुंचाए जाते तो देश अपूर्व परिवर्तन को प्राप्त होता। लेकिन आपने अपनी सेंत-मेंत में मिली प्रतिष्ठा को भी खोया और उससे भी दुखद यह है कि अनशन की पवित्रता और प्रतिष्ठा को भी रसातल में पहुंचा दिया। उन बहादुराना भाषणों का क्या हुआ कि अब मरकर ही उठेंगे? अब मर तो गए ही, उठने का भी कुछ पता नहीं। आमरण अनशन का ऐसा मरण हमने कभी नहीं देखा। अनशन की अंत्येष्टि से निकली राजनीतिक पार्टी आपको कितना उठाएगी, किसे पता है। जिस पार्टी के मूल में ही धूल पड़ी हो, वह शुभंकर कैसे बन सकती है? यह पार्टी या तो गहरी कायरता या गहरी हताशा की संतान है। यह क्या तीर मारेगी?

भारत के लोग अब अखबारों और टीवी के परदों पर इस तथाकथित पार्टी की कलाबाजियों का रस लेंगे। वे देखेंगे कि नेताओं को गरियाने वाले लोग खुद नेता बनने चले हैं। जो कल तक कहते थे कि आंगन ही टेढ़ा है, अब वे भी उसी आंगन पर नाचने को उतारू हो गए हैं। वे टेढ़े आंगन को सीधा करते-करते खुद टेढ़े हो जाएंगे। क्या ज्यादातर नेता राजनीति में आने के पहले साफ-सुथरे और आदर्शवादी नहीं होते हैं? जरूर होते हैं, लेकिन यह काजल की कोठरी है, इसमें घुसोगे तो आप भी काले हुए बिना नहीं रहोगे। इसमें घुसकर इसे जयप्रकाश और लोहिया जैसे महापुरुष साफ नहीं कर पाए तो कुछ कागजी शेर क्या कर लेंगे? कागज के गुड्डों को गलतफहमी हो गई है कि वे शेर हैं। गांधी की टोपी लगाकर क्या कोई गांधी बन जाता है? भगत सिंह जैसी मूंछें रखने से ही क्या कोई भगत सिंह बन जाता है? इसमें शक नहीं कि टीम अन्ना के प्रयासों से भ्रष्टाचार-विरोधी जन-आक्रोश को वाणी मिली, लेकिन टीम को यह भ्रम हो गया कि यह आंदोलन है और उसने ही इस आंदोलन को पैदा किया है। वास्तव में वह आंदोलन था ही नहीं। वह तो एक स्वत:स्फूर्त जन-आक्रोश था। वह आंदोलन बन सकता था, लेकिन जन-आक्रोश के आगे झंडा लेकर खड़े होने वाले लोगों ने इस अपूर्व अवसर को धीरे-धीरे गंवा दिया। वे यह भूल गए कि उन्होंने ‘आंदोलन’ खड़ा नहीं किया, बल्कि ‘आंदोलन’ ने उन्हें खड़ा किया।

आंदोलन की विफलता से जन्मी इस पार्टी को यह भ्रम भी है कि यह जयप्रकाश की जनता पार्टी बन जाएगी। जनता पार्टी आपातकाल के सफल और सतत संघर्ष से जन्मी थी। वह अखबार और टीवी की संतान नहीं थी। इसके अलावा उसके पास जयप्रकाश, मोरारजी देसाई, चौधरी चरणसिंह, चंद्रशेखर, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे वटवृक्ष थे। इस पार्टी के पास ले-देकर एक अन्ना हैं, जो यह कहते नहीं थकते कि मैं चुनाव लडूं़ तो मेरी जमानत जब्त हो जाएगी। जो पल में माशा और पल में तोला हो जाते हैं। जो टोपी गांधी की लगाते हैं और भाषा दादाओं की बोलते हैं (बस एक ही चांटा?)। जो एक दिन नरेंद्र मोदी के भक्तिभाव में बह जाते हैं और दूसरे िन सेकुलरवादी बन जाते हैं। यानी वह सब कुछ हैं और कुछ भी नहीं। वह मूक प्रतीक यानी मिट्टी के माधव बने रहें और पुजारीगण अपनी दुकान चलाते रहें, वहां तक तो सब ठीक-ठाक है। लेकिन क्या ऐसे लोगों के सहारे कोई राष्ट्र राजनीति चलाने की बात सोच सकता है?

जहां कोई नेता नहीं, कोई संगठन नहीं, कोई व्यापक नीति नहीं, कार्यक्रम नहीं, संघर्ष की हिम्मत नहीं, पैसा नहीं, वहां पार्टी बनाने की बजाय यदि कोई सचमुच का आंदोलन खड़ा कर दिया जाता तो उसमें से कांग्रेस की तरह कोई बड़ी पार्टी निकलती, जो मरते-मरते भी जिंदा रहती और जिसका विकल्प अभी सवा सौ साल बाद भी कोई खड़ा नहीं कर पाया। भारत की राजनीतिक पार्टियां क्या हैं? वे सिर्फ चुनावी मशीन बनकर रह गई हैं।

आज भारत को ऐसी राजनीतिक पार्टी की जरूरत है, जिसके द्वार सबके लिए खुले हों। अब टीम अन्ना के बजाय ऐसी अन्ना पार्टी सामने आएगी, जिसने जन-संघर्ष के मुंह पर ताला ठोंक दिया है और देश के लगभग सभी राजनीतिक दलों और उनके कार्यकर्ताओं को अपना दुश्मन बना लिया है। जयप्रकाश ने कम से कम सत्ता को उलट दिया था, अब सत्ता-प्रेम ने अन्ना-आंदोलन को ही उलट दिया है।

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वोटों की फसल काटेंगे आडवाणी

Rashtriya Sahara, 13 Oct 2011 : लालकृष्ण आडवाणी की रथ-यात्रा को लेकर पता नहीं कौन-कौन परेशान हो रहा है? क्या कांग्रेस, क्या संघ-भाजपा, क्या कुछ मुस्लिम नेता और क्या कुछ क्षेत्रीय नेता ! सभी मिलकर 83 साल के इस चिर-युवा नेता की टांग-खिंचाई कर रहे हैं। इन परेशान होनेवाले महानुभावों से कोई पूछे कि भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान चलाने के लिए आपको किसने मना किया था? यदि आप भी ऐसी ही यात्रा घोषित कर देते तो क्या आपको कोई रोक सकता था? ऐसी यात्रा तो कोई कांग्रेसी नेता भी निकाल सकता था और दावा कर सकता था कि उसकी पार्टी भी भ्रष्टाचार की उतनी ही विरोधी है, जितनी कि कोई अन्य पार्टी है। यह काम राहुल गांधी बखूबी कर सकते थे, क्योंकि उनकी चादर अभी तक बिल्कुल बेदाग है। वे देश के साथ-साथ अपनी पार्टी के शुद्धिकरण का भी अभियान चला सकते थे लेकिन वे मौका चूक गए। वे ही नहीं चूके, अन्य सभी नेता भी चूक गए।

 नेता वहीं है, जो मौका दबोच ले। नरेंद्र मोदी ने उपवास किया और आडवाणी रथ-यात्रा कर रहे हैं। दोनों के बारे में विवाद चल पड़ा है कि इनमें से प्रधानमंत्री कौन बनेगा? अभी न जुलाहा है और न सूत लेकिन लठ्ठमलट्ठा चल पड़ा है। आम-चुनाव अभी ढाई-तीन साल दूर हैं। इतनी लंबी अवधि में पता नहीं क्या-क्या हो लेकिन मीडिया को चटखारे लेने में मजा आता है। आडवाणी से पत्रकार बार-बार पूछते हैं कि क्या आप प्रधानमंत्री की दौड़ में शामिल हैं? वे कहते हैं कि संघ और भाजपा ने मुझे अपने जीवन में प्रधानमंत्री पद से भी कहीं कुछ ज्यादा ही दे दिया है। इसके अलावा इस तरह के निर्णय तो पार्टी की संसदीय कमेटी ही करती है। उन्होंने नहले पर दहला मार दिया लेकिन उनका आशय स्पष्ट है। जी हॉं, वे प्रधानमंत्री की दौड़ में हैं और सबसे आगे हैं। कोई अन्य उनके आस-पास भी नहीं फटक सकता। इसीलिए रथ-यात्रा का समर्थन सभी को करना पड़ रहा है। भाजपा के दलाधारी नेताओं की बात जाने दीजिए, जनाधारी नरेंद्र मोदी भी गुजरात में पलक-पांवड़े बिछाएंगे। संघ की भी मजबूरी है। जिन्ना के नाम पर भड़क उठनेवाले संघ को मजबूर होकर आडवाणी को पिछले चुनाव में दुबारा सामने लाना पड़ा था। बढ़ती उम्र का तर्क बिल्कुल बोदा है। जर्मनी के कोनरेड एडनावर, हमारे मोरारजी देसाई और बांग्ला नेता मौलाना भाशाणी को आप भूल गए क्या? जो खम ठोक सके, वही जवान है।

 यह ठीक है कि आडवाणी की इस रथ यात्रा से न तो भ्रष्टाचार घटनेवाला है और न ही राजनीति का शुद्धिकरण होनेवाला है। ये तो कहने की बातें हैं। लेकिन जो असली काम है, वह होकर रहेगा। असली काम क्या है? वोटों की फसल! यह फसल काटने से आडवाणी को कौन रोक सकता है? जो फसल स्वामी रामदेव ने बोई और सींची, उसे अन्ना हजारे ने लहलहा दिया। अब आडवाणी उसे काटेंगे। रामदेव और अन्ना ने अभी तक अपने दल नहीं बनाए और न ही वे अपने उम्मीदवार खड़े कर रहे हैं तो बताइए वोट किधर जाएंगें? भ्रष्टाचार के मुद्दे पर गुस्साए लोग आखिर क्या करेंगे? वे किसे वोट देंगे? उन्हें पता है कि सभी पार्टियॉं और सभी सरकारें भ्रष्टाचार में लिप्त रही हैं लेकिन आडवाणी की छवि साफ-सुथरे नेता की है और उन्होंने यात्रा के आरंभ में यह भी कह दिया है कि वे उनकी पार्टी के भ्रष्ट लोगों का सफाया कर रहे हैं।

आडवाणी की इस यात्रा के विफल होने की भविष्यवाणी जमकर हो रही है। उसके कई कारण गिनाए जा रहे हैं। पहला तो यही कि इस समय रामजन्म भूमि जैसा कोई उत्तेजक मुद्दा नहीं है। यह तर्क देनेवाले भूल जाते हैं कि राम मंदिर के मुद्दे पर देश में बड़ा मतभेद था। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सारा देश एक है। यहां तक कि कांग्रसी भी भ्रष्टाचार का समर्थन नहीं कर सकते। वे कह रहे हैं कि वे आडवाणी की नौटंकी का विरोध करेंगे। कुछ मुस्लिम नेताओं ने भी यही कहा है। सचमुच आडवाणी किस्मत के सिकंदर हैं। उनका विरोध इस रथ-यात्रा में चार चांद लगा देगा। आडवाणी मीडिया में छाए रहेंगे। मीडिया तो अभी से इस यात्रा पर लपक पड़ा है। नीतिश ने हरी झंडी देकर इस यात्रा के सर्वसमावेशी चरित्र को उभार दिया है। जयप्रकाशजी का जन्म-दिन, उनका जन्म-स्थल और चंपारणवाला बिहार-इस यात्रा को नया रूप-रंग दे रहा है। यह यात्रा स्वयं आडवाणी के रंग-रूप को भी काफी निखार देगी। उनके इस नए रंग-रूप से संघ भी परहेज नहीं कर पाएगा। जैसे अटलबिहारी वाजपेयी, अनेक संकोचों के बावजूद, संघ की मजबूरी बन गए थे, ‘जिन्नावाले आडवाणी’ भी बन जाएंगे। यह यात्रा उन्हें संघ और भाजपा में रहते हुए उनके बाहर भी लोकप्रियता और वैधता बटोरने का मौका देगी। तीन साल बाद या उसके पहले आडवाणी प्रधानमंत्री बनेंगे या नहीं यह प्रष्न भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है लेकिन जो तथ्य अभी उजागर हुआ है वह यह है कि इस समय भारतीय राजनीति के आकाष में सबसे ज्यादा चमकनेवाले सितारे का नाम हैं लालकृष्ण आडवाणी। आडवाणी जैसा कोई और नेता इस समय न तो भाजपा में है और न ही कांग्रेस में।

 आडवाणी की रथ-यात्रा का विरोध कोई भी नहीं कर पाएगा। तथाकथित जन-आंदोलनकारी भी नहीं। आडवाणी ने काले धन की वापसी को बड़ा मुद्दा बनाया है। वे स्वामी रामदेव के मिशन को ही आगे बढ़ा रहे हैं। अन्ना हजारे के लोकपाल का पूर्ण समर्थन आडवाणी नहीं कर रहे हैं लेकिन यह भी सत्य है कि कोई अन्य नेता भी नहीं कर रहा है। ऐसे में अगर अन्ना-टीम आडवाणी का विरोधी करेगी तो वह अपने पांव पर ही कुल्हाड़ी मारेगी। संघ और भाजपा ने अब तक उसका जो स्वतः समर्थन किया है, वह भी छिन जाएगा। आडवाणी की यह भ्रष्टाचार-विरोधी यात्रा कांग्रेस के गले का सॉंप जरूर बन जाएगी। कांग्रेस में इतना दम नहीं कि वह जवाबी-यात्रा निकाल सके लेकिन उसे कई दिखावटी कदम तुरंत उठाने पड़ेंगे। कालेधन की वापसी, लोकपाल, चुनाव सुधार, भूमि-अधिग्रहण आदि ज्वलंत मुद्दों पर वह कानूनी उधेड़-बुन में मशगूल दिखाई पड़ेगी। इससे देश का कुछ न कुछ तो भला होगा ही।

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अन्ना-आंदोलन कोरा गुब्बारा तो नहीं

Dainik Bhaskar, 12 Oct 2011: अन्ना टीम के लोगों ने जब से हिसार पर मुंह खोलना शुरू किया है, कई तात्कालिक और मूलभूत सवाल उठ खड़े हुए हैं। जैसे यह कि हिसार के उप-चुनावी दंगल में सीधे कूदकर क्या उन्होंने ठीक किया और यह मूलभूत प्रश्न भी कि क्या यह आंदोलन सिर्फ कागजी पुलाव बनकर रह जाएगा? क्या इसका हश्र जे पी आंदोलन से भी बुरा होगा?

जहॉं तक हिसार के उप-चुनाव का प्रश्न है, अन्ना खुद हिसार नहीं गए, यह उन्होंने ठीक किया। वे जाते तो उनका वजन काफी घट जाता। लेकिन उन्होंने अपील जारी कर दी। कांग्रेस को हटाओ। उनकी टीम के लोग भी धुआंधार प्रचार में लगे हुए हैं। आम आदमी यह नहीं समझ पा रहा कि अन्ना ने इस वक्त कांग्रेस हटाओ का नारा क्यों दे दिया? यह अभियान शुरू करने के पहले उन्होंने कांग्रेस को दो दिन की मोहलत दी थी और कहा था कि यदि कांग्रेस दो दिन के अंदर यह वचन नहीं देगी कि संसद के शीतकालीन सत्र में वह जन-लोकपाल बिल पास कर देगी तो वे कांग्रेस-हटाओ अभियान शुरू कर देंगे। जाहिर है कि कांग्रेस ने कोई वचन नहीं दिया।

यहॉं प्रश्न यह है कि क्या कांग्रेस या सरकार से ऐसा वचन मांगना अपने आप में उचित था? वास्तव में अन्ना-आंदोलन एक के बाद एक इतनी ठोकरें खा चुका है कि उसे कांग्रेस विश्वासघाती लगने लगे, यह स्वाभाविक है। इसमें कांग्रेस का दोष क्या है? सभी सत्तारूढ़ दलों और सरकारों का रवैया लगभग एक-जैसा ही होता है। वे जन-आंदोलनों को फुस्स करने की पूरी कोशिश करती हैं। साम, दाम, दंड, भेद। यह नेतृत्व और दृष्टि का अभाव ही था कि इतने अपूर्व जन-समर्थन के बावजूद अन्ना और उनकी टीम हर मोर्चे पर गच्चा खा गई। पहले मंत्रियों के साथ साझा बिल बनाने पर और फिर अनशन तोड़ने पर! अनशन तोड़ते वक्त अन्ना की टीम के वकीलों ने सरकारी चिट्ठी की भाषा को ही नहीं समझा। देश के ये जाने-माने वकील अंग्रेजी ठीक से नहीं समझते, यह भी मैं नहीं कह सकता। जिस दिन अन्ना अनशन तोड़ रहे थे, उस पूरे दिन मैं ‘स्टार टी वी चैनल’ के स्टूडियो से बार-बार समझा रहा था कि सरकारी आश्वासन शुद्ध धोखे की ठट्ठी है लेकिन अन्ना टीम के लोग सिर्फ इसी बात से गद्गद् थे कि वाह! हमने सरकार के घुटने टिकवा दिए। सच है! सरकार ने घुटने जरूर टेके लेकिन घुटने टेककर उसने आपको ऐसी टंगड़ी मारी कि आप चारों खाने चित हो गए। उसने आपको रामलीला मैदान से खाली हाथ चलता कर दिया। उसने रामदेवजी के साथ तो दुष्टता की लेकिन अन्नाजी के साथ धूर्तता की।

अन्ना-टीम ने अपनी सबसे प्रमुख तीनों मांगों को ताक पर रख दिया। प्रधानमंत्री, जजों और सांसदों की लोकपाल के दायरे में लाने की। तीन अन्य मांगों को शर्त बना लिया। सरकार ने उन तीन मांगों को भी माना नहीं। उन्हें सिर्फ संसद की स्थायी समिति के पास भेजने की सिफारिश को संसद से पारित करवा दिया। इसका अर्थ क्या हुआ? कुछ भी नहीं। खोदा पहाड़ और चुहिया भी नहीं निकली। न तो जन-लोकपाल बिल के पास होने का कोई ठोस आश्वासन मिला और न कोई समय-सीमा तय हुई।  अब एक-डेढ़ माह का समय बीतने पर अन्ना-टीम को लगा होगा कि हम तो बेवकूफ बन गए। पूर्व-अफसरों और वकीलों पर नेता भारी पड़ गए। ऐसे नेता, जिनकी प्रतिष्ठा पैंदे में बैठ चुकी है। तो क्या ऐसी हालत में अन्ना-टीम को गुस्सा नहीं आएगा? यह गुस्सा बिल्कुल स्वाभाविक है।

हिसार में यही गुस्सा प्रकट हो रहा है लेकिन यह निरर्थक है, क्योंकि हिसार में कांग्रेसी उम्मीदवार के हारने की बात तो पहले से ही लगभग तय है। अन्ना के आह्वान की परीक्षा तो तब होती, जबकि हिसार में कांग्रेस की पक्की सीट होती और वहां अन्ना-टीम कांग्रेस की जमानत जब्त करवा देती। अब यदि कांग्रेसी उम्मीदवार किसी वजह से जीत गया या उसके वोट बढ़ गए तो अन्ना-टीम की कितनी किरकिरी हो जाएगी? क्या वह पांच राज्यों के अगले चुनाव में जाने लायक रह जाएगी?

इसके अलावा अकेली कांग्रेस को क्यों हराओ? क्या अकेली कांग्रेस कोई बिल पास कर सकती है? कांग्रेस गठबंधन के साथी दलों को भी क्यों नहीं हराओ? और विपक्षी दल? कौन सा ऐसा विपक्षी दल है, जिसने जन-लोकपाल बिल का पूरा समर्थन किया है? सभी दलों को कुछ न कुछ आपत्ति है, कुछ न कुछ संकोच है, कुछ न कुछ विरोध है। स्वयं अन्ना टीम भी अपने बिल से पूर्ण सहमत नहीं है। वह उसमें खुद भी दर्जनों संशोधन कर चुकी है। ऐसे पल-पल में बदलनेवाले बिल को कसौटी बना लेना और उसके आधार पर संसद को चुनौती देने का औचित्य क्या है? अन्ना को संसद से भी बड़ा बताना हताशा का सूचक है। इस मामले में अन्नाजी काफी समझदार हैं। अन्ना को पता है कि वे न तो कोई नेता हैं, न कोई बुद्धिजीवी, न कोई महान संगठक! वे तो एक प्रतीक भर हैं। भ्रष्टाचार के विरूद्ध उबल रहे जन-आक्रोश के प्रतीक!

इन सीधे-सच्चे प्रतीक को हिलाने-डुलानेवाले लोग दूसरे ही हैं। ये दूसरे लोग भी अच्छे ही हैं लेकिन वे अन्ना की तरह यथार्थवादी बने रहें, यह जरूरी है। वे ये न भूलें कि रामलीला मैदान के अनशन के वक्त जो जन-आक्रोश उमड़ा था, वे उसके निमित्त-मात्र थे। वे उसके कारण नहीं थे, सिर्फ कारक थे। वह आक्रोश उनकी वजह से नहीं उमड़ा था। वह पहले से ही था। उनकी वजह से वह ऊपर उभर आया। इस आक्रोश को उसके मुकाम तक तभी पहुंचाया जा सकता है जबकि उसके पास दूरंदेश नेतृत्व हो, उसकी कुछ विचारधारा हो, संगठन हो, कार्यक्रम हो और रणनीति हो। हिसार के दंगल में कूदना उक्त सभी बातों का नकार है। लोकपाल तो उत्तम किंतु लघु उपाय है। भ्रष्टाचार के दैत्य का दलन तो अनेक गहरे और कठोर उपायों के बिना नहीं हो सकता। एक पार्टी के मुकाबले दूसरी पार्टियों को बेहतर मानने का मतलब क्या हुआ? यही न, कि जो भ्रष्टाचारी आपसे सहमत है, वह भ्रष्टाचारी नहीं है और जो आपसे सहमत नहीं है, वह भ्रष्टाचारी है। वास्तव में सारे मौसेरे भाई हैं। उनमें से आप सिर्फ एक के विरूद्ध हैं, बाकी सबको आप गले लगा रहे हैं।

जयप्रकाश-आंदोलन ने तो समस्त प्रमुख विरोधी दलों को एकजुट कर लिया था। क्या अन्ना-टीम में यह क्षमता है? बिल्कुल नहीं। तो फिर वह दलीय राजनीति में क्यों कूद रही है? क्या पता कांग्रेस के बाद जो दल आएगा, वह उससे भी कहीं ज्यादा भ्रष्ट न हो? क्या अन्ना-आंदोलन दलों के दायरे से बाहर निकल सकता है? क्या वह सत्ता-परितर्वन की बजाय व्यवस्था-परिवर्तन पर जोर दे सकता है? डर यह है कि दलीय और चुनावी राजनीति के दलदल में फंसकर अन्ना-आंदोलन कहीं सिर्फ अखबारों और टीवी चैनलों का गुब्बारा न बनकर रह जाए! इससे अधिक दुखद क्या होगा?

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भाजपा को उस तीली की तलाश

Naya India, 04 Oct 2011 : भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में से क्या निकला, यह बताना भाजपा के नेताओं के लिए भी मुश्किल है। देश को आशा थी कि यह दिल्ली बैठक बड़ी जानदार सिद्ध होगी लेकिन वह होती, उसके पहले ही उसका दम निकल गया। बैठक के आरंभ से अंत तक नरेंद्र मोदी उस पर छाये रहे। मोदी आएंगें कि नहीं, नहीं आ रहे हैं तो क्यों नही आ रहे हैं, उनके नहीं आने का क्या असर होगा और जब आए ही नहीं तो उसका परिणाम क्या हो रहा है, ये ही सवाल मीडिया पर छाये रहे। आजकल जो मीडिया करता है, वही राजनीति है। मीडिया सत्य है, राजनीति मिथ्या है। अन्ना हजारे का फुगावा इसका ठोस प्रमाण है।

मीडिया ने भाजपा के अन्य नेताओं के भाषण थोड़े-बहुत छापे और चेनलों पर भी दिखाए लेकिन उसकी रूचि मुख्यतः विषयांतर करने में ही रही। कांग्रेस सरकार ने अपने लिए भ्रष्टाचार की जो बारूद खुद बिछाई है, उसमें तीली लगाने के बजाय भाजपा अपने घाव सहलाती हुई दिखाई पड़ी। वह कांग्रेस से लड़ती हुई जितनी दिखाई पड़ी, उससे ज्यादा खुद से लड़ती हुई दिखाई दी। अगला प्रधानमंत्री कौन, यही यक्ष-प्रश्न बन गया। अगला प्रधानमंत्री कौन, यह प्रश्न क्या रथ-यात्रा से तय होगा ? उसे तो वह तीली तय करेगी जो कांग्रेस द्वारा बिछाई गई भ्रष्टाचार की बारूद को उड़ा देगी।

भ्रष्टाचार के विरूद्ध जो रथ-यात्रा निकाल रहे हैं, वे लालकृष्ण आडवाणी या गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी या भाजपा अध्यक्ष नितीन गडकरी या संसदीय नेताद्वय सुषमा स्वराज और अरूण जेटली- इनमें से प्रधानमंत्री कौन बनेगा, यही प्रश्न हवा में तैरा दिया गया। मोदी के उपवास ने उसे तगड़ी हवा दी। आडवाणी की रथ-यात्रा ने भी उसे उछाला था लेकिन नागपुर जाकर उन्हें कहना पड़ा कि भाजपा उन्हें प्रधानमंत्री पद से कहीं कुछ ज्यादा ही दे चुकी है। इसमें शक नहीं कि भाजपा में आधा दर्जन से ज्यादा नेता ऐसे हैं, जो प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हो सकते हैं। दर्जन के हिसाब से खरीदने पर चीजें प्रायः सस्ती मिलती हैं। यों भी जब से प्रधानमंत्री पद राजीव गांधी के हाथ आया, वह काफी सस्ता हो गया है। भाजपा के किसी नेता ने अभी तक इस महान पद को पाने की कामना व्यक्त नहीं की है। तो फिर यह सवाल बार-बार उठ ही क्यों रहा है?

इसलिए उठ रहा है कि कांग्रेस की नैया रोज़ इंच-ब-इंच डूब रही है। उसके कुछ नेताओं के बयान इतने आक्रामक होते हैं कि हर बयान दस-बीस लाख वोटों का कबाड़ा कर जाता है। इसके अलावा धांधलों की झड़ी लगी हुई है। एक धांधले की स्याही सूखती नहीं कि दूसरे की कालिख मुंह पर पुत जाती है। मंत्री एक-दूसरे पर वार कर रहे हैं। मालकिन की डॉट पड़ने पर वे युद्ध-विराम का अभिनय करने लगते हैं लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि अब शक की सुई बड़े बाबू की तरफ घूमने लगी है। पूरा मंत्रिमंडल ही मसखरों का टोला मालूम पड़ने लगा है। सरकार अंदर से खोखली हो गई है। सर्वोच्च न्यायालय का कोई एक फैसला या कोई एक तीखी टिप्पणी ही उसे ढेर करने के लिए काफी है। ऐसे में भाजपा सत्ता के सपने नहीं देखेगी तो क्या करेगी?

भाजपा ही प्रतिपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है। उसका विकल्प क्या है? जन-आंदोलनों में से कोई विकल्प उभरता नहीं दिखाई पड़ रहा है। जो आक्रोश अभी तक उभरा है, वह हवाई है, वायव्य है, निर्गुण-निराकार है। कोरे शब्द और रोचक दृश्य हैं। उसे ठोस जामा पहनाने की राजनीतिक कोशिश का ही दूसरा नाम आडवाणी की रथ-यात्रा है। यह रथ-यात्रा भी कोरे शब्दों और दृश्यों की ही यात्रा होगी लेकिन इसमें से वोट पैदा होने की संभावना सदा बनी रहेगी। भाजपा की इस बैठक में इस रथ-यात्रा का जो प्रभामंडल बनना चाहिए था, वह भी नहीं बन सका। उस पर भी नरेंद्र मोदी का भूत मंडराता रहा। माना गया कि नरेंद्र मोदी ने उसका विरोध किया इसीलिए वह अब गुजरात से नहीं, बिहार से शुरू होगी। मोदी का कहना है कि यदि जयप्रकाषजी के जन्मदिन पर ही शुरू करना है तो इस यात्रा को उनके गांव सिताबदियारा से ही शुरू क्यों न किया जाए, जो कि बिहार में है। यदि यह यात्रा सरदार पटेल के जन्मदिन (31 अक्तूबर) पर शुरू होती तो गुजरात से हो सकती थी। न तो यह बात खुलकर कही गई और न ही यह भी बताया गया कि गुजरात की भाजपा इन दिनों अपने स्थानीय चुनावों की तैयारी में लगी रहेगी। सारे मामले को मीडिया ने प्रधानमंत्री पद की प्रतिस्पर्धा से जोड़ दिया।

भाजपा के प्रधानमंत्री पद को इस तरह से उछाला जा रहा है, मानो यह कल ही उसकी झोली में गिरनेवाला है। अभी तो ढाई साल बाकी है। इस सरकार की खाल गेंडे से भी अधिक मोटी है। सर्वोच्च न्यायायल की कोई कटु टिप्पणी आ गई तो यह उसे भी हजम कर सकती है। इसके अलावा कौन जानता है कि देश और भाजपा की राजनीति किस वक्त क्या करवट ले लगी। किसे पता था कि मनमोहन सिंह इस देश के प्रधानमंत्री बन जाएंगें? और फिर भाजपा में तो भावी प्रधानमंत्रियों की पूरी कतार लगी हुई है। असली सवाल यह है कि अगले दो-ढाई साल में क्या भाजपा इतना जन-समर्थन जुटा पाएगी कि वह प्रधानमंत्री पद की दावेदारी कर सके ?

जब भाजपा के पास अटलबिहारी वाजपेयी जैसे उत्तम वक्ता और लोकप्रिय नेता थे, तब भी वह बहुमत नहीं जुटा पाई तो अब कैसे जुटा पाएगी? उसके पास आडवाणी अब भी हैं लेकिन न राम-मंदिर जैसा मुद्दा है न महारथी की वह महिमा है। भ्रष्टाचार के विरूद्ध आज कोई भी राजनीतिक दल मुंह खोलने लायक नहीं रह गया है। जनता का किसी भी नेता पर भरोसा नहीं है। यदि भाजपा का कोई नेता आज खुद को गांधी, गोलवलकर, जयप्रकाश या लोहिया के सांचे में ढाल सके या उतना भी नहीं तो कम से कम नक़ल की नक़ल कर सके याने अन्ना हजारे जैसा दिखने लगे तो शायद लोग उसकी बात सुनने लगें।

भारत के राजनीतिक दलों के लिए व्यावहारिक यही होगा कि वे भ्रष्टाचार के बारे में अपना मुंह ही न खोलें। वे मुंह खोलेंगे तो लोग उसमें मिट्टी भर देंगे। उनके लिए फिलहाल जरूरी यही है कि वे आर्थिक और सामाजिक विक्ल्प सुझाएॅं, और उनसे जनता को रिझाएॅं। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आज सीएजी और मीडिया की साख किसी भी नेता से कहीं ज्यादा है। यदि कोई व्यक्ति सचमुच इस देश का नेता बनना चाहता है तो उसके पास सुनहरा अवसर है। वह भ्रष्टाचार के विरूद्ध किसी सरकार, अदालत या लोकपाल की शरण में जाने के बजाय ‘सीधी कार्रवाई’ का सहारा ले। ‘सीधी कार्रवाई’ ही सच्चा जन-आंदोलन है। इसी में से नई सरकार और नई व्यवस्था का जन्म होगा। क्या भाजपा इसके लिए तैयार है ?

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फलस्तीन: आशा की नई किरण

Naya India, 29 sept 2011 : फलस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने कबूतरों के पिंजरे में बिल्ली छोड़ दी है। उन्होंने वह काम कर दिखाया है, जो यासर अराफात जैसे चमत्कारी नेता भी नहीं कर सके। अब्बास ने संयुक्तराष्ट्र महासचिव बान-की-मून को एक औपचारिक अर्जी दे दी है और फलस्तीन को पूर्ण सदस्य बनाने का अनुरोध कर दिया है। पूर्ण सदस्य बनने का अर्थ है, पूर्ण संप्रभु राज्य की तरह मान्य हो जाना। अभी फलस्तीन के पास भूमि है, जनता है, सरकार है लेकिन संप्रभुता नहीं है। वह देश के अंदर और बाहर सर्वोच्च नहीं है। उसकी स्थिति किसी कामचलाऊ राज्य की तरह है। 1948 में इस्राइल बना, तब से अब तक इस फलस्तीनी क्षेत्र की स्थिति लगातार बदतर ही होती गई है। 1967 के अरब-इस्राइल युद्ध के दौरान फलस्तीन के एक बड़े हिस्से पर भी इस्राइल ने कब्जा कर लिया था।

इस्राइल बिल्कुल नहीं चाहता कि फलस्तीन बकायदा एक राज्य की तरह उसके पड़ौस में स्थापित हो जाए। उसे डर है कि वह इस्राइल को खत्म करने की हरचंद कोशिश करेगा। इस्राइल को यह डर इसलिए है कि उसे फलस्तीनी जमीन पर ही बसा दिया गया था। फलस्तीन के लोगों ने अभी तक इस्राइल को मान्यता नहीं दी है। फलस्तीन के गाजा क्षेत्र में राज करनेवाली फलस्तीनियों की पार्टी ‘हमास’ तो खुले-आम कहती है कि वह इस्राइल का समूलोच्छेद करना चाहती है। उसकी ओर से इस्राइल पर लगातार छुट-पुट हमले भी होते रहते हैं। इस्राइल के पक्ष में अमेरिका ने कई बार वीटो प्रयोग किया है और वह ही उसे हर तरह से प्राणवायु प्रदान करता रहता है। अमेरिका में यहूदियों का प्रभाव इतना ज्यादा है कि कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति इस्राइल को आंखें नहीं दिखा सकता।

इस पृष्ठभूमि में अब्बास की पहल एक अजूबा-सी बन गई है। अब्बास को नरम और पश्चिमपरस्त नेता माना जाता है। उनका ‘फलस्तीनी प्राधिकरण’ पश्चिमी पैसे के दम पर जिंदा है। कोई सोच भी नहीं सकता था कि अब्बास फलस्तीन को इस्राइल के मुकाबले इस तरह खड़ा कर देंगे। जाहिर है कि अमेरिका अब्बास के इस प्रस्ताव का विरोध करेगा। ओबामा ने इसका स्पष्ट संकेत दे दिया है। किसी भी राष्ट्र को नया सदस्य बनाने के लिए यह जरूरी है कि सुरक्षा परिषद में उसके विरूद्ध वीटो न हो। अमेरिका वीटो करेगा। यदि शेष सभी राष्ट्र भी उसका समर्थन कर दें तो भी वह सदस्य नहीं बन सकता। इस समय इस्राइल का कानूनी दर्जा ‘पर्यवेक्षक इकाई’ का है। अब ज्यादा से ज्यादा यही हो सकता है कि महासचिव सारे मामले को संयुक्तराष्ट्र महासभा को भेज दें। उसे अधिकार है कि वह फलस्तीन को ‘पर्यवेक्षक राज्य’ का दर्जा दे दे। यह दर्जा वहीं होगा, जो ‘वेटिकन’ का है।

इस दर्जे को भी शुभारंभ ही माना जाएगा। इससे पूर्ण सदस्यता का रास्ता खुलेगा और संयुक्तराष्ट्र के कई उपसंगठनों में भी फलस्तीन को स्थान मिलेगा। पहले कलाई पकड़ें, फिर हाथ तो अपने आप ही हाथ आ जाएगा। जाहिर है कि ‘महासभा’ के 193 सदस्यों पर अमेरिका का जादू चलनेवाला नहीं है। उसके दो-तिहाई सदस्य फलस्तीन का समर्थन करने में देर नहीं लगाएंगें। यहां तक कि फ्रांस और ब्रिटेन को भी अमेरिका नहीं रोक पाएगा। यूरोपीय संघ के लगभग सभी देश फलस्तीन का साथ देंगे। मिस्र और सउदी अरब जैसे देश जो सदा अमेरिका की हॉं में हॉं मिलाते नहीं थकते थे, वे अब फलस्तीन का समर्थन कर रहे हैं। तुर्की को पिछले दिनों इस्राइल ने इतना नाराज़ कर दिया है कि नाटो का सक्रिय सदस्य होने के बावजूद वह फलस्तीन का समर्थन करेगा। भारत, रूस और चीन जैसे देश तो फलस्तीन के साथ हैं ही।

अब्बास की यह पहल पूरी तरह सफल न हो तो भी अमेरिकी प्रतिष्ठा को काफी धक्का लगेगा। सारी दुनिया के सामने यह तथ्य उजागर हो जाएगा कि अमेरिका ईमानदार मध्यस्थ नहीं है। ओबामा प्रशासन ने फलस्तीन के भविष्य के बारे में लंबे-चौड़े वायदे किए थे लेकिन उसकी तराजू आखिरकार इस्राइल के पक्ष में ही झुकती नज़र आ रही है। वह इस्राइल को पटरी पर लाने में असमर्थ रहा है। दूसरी बात, जो अमेरिका की छवि को ठेस पहुंचाएगी, वह यह है कि वह एक ओर तो ट्यूनीसिया, मिस्र, सीरिया और लीब्या के जन-आंदोलनों का पुरोधा बन रहा है और दूसरी ओर वह फलस्तीन पर हो रहे इस्राइली अत्याचारों पर चुप्पी लगाए बैठा है। इसके अलावा वह पश्चिम एशिया तथा अन्य क्षेत्रों में भी अपने समर्थकों की नजरों में गिरता चला जा रहा है।

इस मामले में अमेरिकी और इस्राइली दृष्टिकोण को भी समझने की जरूरत है। इन दोनों देशों में ऐसे अनेक प्रमुख लोग हैं, जो यह तो चाहते हैं कि फलस्तीनियों का एक स्वतंत्र राज्य बन जाए लेकिन उनकी मान्यता यह है कि यदि ऐसा राज्य इस्राइल की सहमति के बिना बनेगा तो वह वास्तव में बन ही नहीं पाएगा। मानो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और महासभा ने फलस्तीन राज्य के पक्ष में प्रस्ताव पारित कर दिया तो क्या हो जाएगा? क्या संयुक्तराष्ट्र के पास जादू की कोई ऐसी छड़ी है, जिसके घुमाने से फलस्तीनियों को जमीन के वे बड़े-बड़े टुकड़े वापस मिल जाएंगें, जो 1967 के युद्ध में इस्राइल ने हड़प लिये थे ? क्या लाखों फलस्तीनी शरणार्थी वापस लौट पाएंगें ? क्या फलस्तीनी ज़मीनों पर बनी नई-नई यहूदी बस्तियों के तोड़ने के लिए इस्राइल तैयार हो जाएगा? क्या यरूशलम को सांझी राजधानी बनाने के लिए दोनों तैयार हो जाएंगें? क्या दोनों एक-दूसरे को सुरक्षा की गारंटी देंगे? क्या इस्राइल में बचे हुए अरबों को अभय-वचन मिलेगा ? ये सारे काम संयुक्तराष्ट्र के प्रस्ताव भर से संपन्न नहीं होंगे। वह प्रस्ताव तो कागज़ का टुकड़ा बनकर रह जाएगा। यदि प्रस्ताव से ही राज्य का निर्माण हो सकता होता तो वह 1947 में ही हो जाता जबकि संयुक्तराष्ट्र ने फलस्तीनी ज़मीन पर दो-राष्ट्रों को स्थापित करने का प्रस्ताव पारित किया था। 1974 में पारित प्रस्ताव (3236) में फलस्तीन की ‘राष्ट्रीय स्वतंत्रता और संप्रभुता’ को मान्यता दी गई थी लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ।

अमेरिका और इस्राइल कहते हैं कि पहले इस्राइल और फलस्तीन में समझौता हो और फिर संयुक्तराष्ट्र का प्रस्ताव हो याने विवाद यही है कि पहले मुर्गी हो या पहले अंडा? इस्राइल कहता है कि हम तब तक बात नहीं करेंगे जब तक नरम और गरम (हमास), दोनों फलस्तीनी हमें मान्यता न दें और अब्बास और हमास कहते हैं कि पहले इस्राइल हमारी जमीन खाली करे, यहूदी बस्तियॉं हटाएं और मान्यता दे, तभी हम बात करेंगे। यदि संयुक्तराष्ट्र ने इस साल फलस्तीन को ‘पर्यवेक्षक राज्य’ का दर्जा दे दिया तो दोनों पक्षों के थोड़ा-थोड़ा नरम पड़ने की आशा है। उसके बाद फलस्तीनियों का आत्मविश्वास जरा तेजी से बढ़ेगा, और उग्रवादी हमास के मुकाबले अब्बास की वैधता मजबूत होगी। उधर इस्राइल को भी पता चलेगा कि फिजूल अकड़ना ठीक नहीं है। आखिर अकेला अमेरिका उसका साथ कब तक देगा? ऐसी स्थिति में आज बेहतर यही होगा कि संयुक्तराष्ट्र-प्रक्रिया के पूरे होते ही दोनों पक्ष आपसी बातचीत शुरू करें। प्रस्ताव बातचीत को आगे बढ़ाए और बातचीत प्रस्ताव को आगे बढ़ाए!

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सबक सिखाने का मौका

Naya India, 30 Sept 2011 : अमेरिका और पाकिस्तान का एक-दूसरे से जैसा मोह-भंग आजकल हुआ है, पहले कभी नहीं हुआ। सीटो और सेन्टो नामक सैन्य-गुटों में शामिल होने के बाद दोनों देशों के संबंधों में कई बार छोटे-मोटे उतार-चढ़ाव तो आए लेकिन इस बार झटका इतना तगड़ा है कि दोनों का गठबंधन टूट सकता है। इतना ही नहीं, अमेरिका को पाकिस्तान के विरूद्ध कई कठोर कदम भी उठाने पड़ सकते हैं।

 अमेरिका के साथ पाकिस्तान की इतनी ठन गई है कि उसके प्रधानमंत्री युसुफ रज़ा गिलानी इस बार न्यूयार्क भी नहीं गए। उन्हें न्यूयार्क में संयुक्तराष्ट्र के अधिवेशन में भाग लेना था लेकिन जब उन्हें पता चला कि ओबामा उन्हें ‘दर्शन’ नहीं दे पाएंगें तो उन्होंने अपनी अमेरिका-यात्रा ही टाल दी। अब विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार को भी अधबीच में से ही वापस बुला लिया गया है। घुमा-फिराकर अमेरिका को बताया जा रहा है कि पाकिस्तान उससे सख्त नाराज़ है। इस नाराज़ी का कारण क्या है?

कारण बड़ा गहरा है। पाकिस्तान के हुक्मरानों को यह अंदेशा हो गया है कि उसामा बिन लादेन-कांड दुबारा होने जा रहा है। जैसे अमेरिकियों ने उसामा को उसके घर में घुसकर मार गिराया, वैसे ही अब वे जलालुद्दीन हक्कानी के गिरोह का भी सफाया कर देंगे। उसामा के सफाए ने पाकिस्तानी फौज और गुप्तचर एजेंसी की इज्जत को पैंदे में बिठा दिया है। जिन दो संगठनों को पाकिस्तान का असली रक्षक बताया जा रहा था, वे दोनों इतने बौने साबित होंगे, यह जानकर पाकिस्तान की जनता को गहरा सदमा लगा है। पाकिस्तान की सरकार को डर है कि यदि अमेरिका ने उत्तरी वजीरिस्तान में सीधा हमला बोल दिया तो न सिर्फ सैकड़ों-हजारों लोग मारे जा सकते हैं बल्कि अफगानिस्तान में चला आ रहा उसका दबदबा हमेशा के लिए खत्म हो सकता है। उसमा के मुकाबले हक्कानी गिरोह का खात्मा पाकिस्तान के लिए कहीं ज्यादा खतरनाक सिद्ध होगा।

पाकिस्तान को हक्कानी-गिरोह पर हमले का शक क्यों हो गया है? क्योंकि अमेरिका ने दो टूक शब्दों में पाकिस्तान के हुक्मरानों को बता दिया है कि हक्कानी-गिरोह और आईएसआई में सीधा संबंध है। अमेरिका के सेनापति माइक मुलेन ने सप्रमाण यह सिद्ध किया है कि 13 सितंबर को काबुल के अमेरिकी दूतावास पर जो हमला हुआ था, वह इसी सांठ-गांठ का परिणाम है। उन्होंने पाकिस्तानी हुक्मरानों को दो-टूक शब्दों में धमकी दी है कि अगर वे हक्कानी-गिरोह को काबू नहीं करेंगे तो अमेरिका आगे बढ़कर उसे तहस-नहस कर देगा। पाकिस्तानी शासक इसे कोरी गीदड़भभकी मानकर नहीं चल सकते। उसामा-कांड ने पहले से ही उनकी नींद उड़ा रखी है। पाकिस्तान के सेनापति जनरल अशफाक परवेज कयानी अपने साथियों के साथ बैठकर घंटों सिर खपा रहे हैं और कोई बीच का रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे हैं।

वैसे बीच का रास्ता ज्यादा मुष्किल नहीं है। इस कला में पाकिस्तानी नीति-निर्माता नितांत निष्णात हैं। जैसे ही तालिबान के सफाए की नौबत आई, जनरल मुशर्रफ ने शीर्षासन कर दिया। उन्होंने अमेरिकियों से हाथ मिला लिया। अब हक्कानी के जदरान पश्तून कबीले से लड़ने का मौका आया है। जनरल कयानी भी एकदम शीर्षासन की मुद्रा धारण कर सकते हैं। मरता, क्या न करता ! पाकिस्तान की हालत आज जितनी खराब है, पहले कभी नहीं थी। मंहगाई आसमान छू रही है, भुखमरी और बेकारी बढ़ती चली जा रही है। राज्य लगभग दिवालिया हो गया है। सरकारी अफसरों को तनखा देने के लिए सरकार के पास पैसे नहीं हैं। कानून और व्यवस्था लगभग लड़खड़ा गई है। आतंकवाद का सर्वत्र बोलबाला है। भारत से ज्यादा आतंकी घटनाएं पाकिस्तान में हो रही हैं। अराजकता, अपराध और आपसी दंगों से थर्राए लोग पाकिस्तान छोड़कर विदेशों में भाग जाना चाहते हैं। यदि आज अमेरिका अपना हाथ खींच ले तो पाकिस्तान का दम घुट सकता है।

इसके बावजूद पाकिस्तान इतना दम क्यों मार रहा है, कैसे मार रहा है? वह अमेरिका की बात क्यों नहीं मान रहा है? इसके कई कारण हैं। पहला, पाकिस्तान अपने अंदरूनी आतंकवाद से तंग जरूर है लेकिन वह यह मानता है कि हक्कानी-गिरोह जैसे संगठन उसकी विदेश नीति के अभिन्न अंग हैं। यदि इस तरह के आतंकवादी संगठन खत्म हो गए तो अफगानिस्तान और भारत-जैसे पड़ौसी देशों को अपनी उंगलियों पर नचाने की उसकी क्षमता नदारद हो जाएगी। जो काम पाकिस्तानी फौज नहीं कर सकती, वह काम ये गिरोह कर सकते हैं। काम भी हो जाता है और नाम भी बदनाम नहीं होता। इन गिरोहों की जैसी भर्त्सना अन्य सरकारें करती हैं, वैसी ही पाकिस्तानी सरकार भी कर देती है। इन गिरोहों को पाकिस्तान हर कीमत पर जिंदा रखना चाहता है।

दूसरा, पाकिस्तान को पता है कि अमेरिका बहुत घबराया हुआ देश है। अफगानिस्तान को वह भगवान भरोसे छोड़कर नहीं जा सकता। वह यह भी जानता है कि अफगानिस्तान को शांत और सुरक्षित रखने के लिए पाकिस्तान को पटाए रखना बेहद जरूरी है। अफगानिस्तान के अंदर जमी हुई पश्चिमी फौज को रसद और हथियार पहुंचाने के सारे रास्ते पाकिस्तान होकर जाते हैं। पाकिस्तान जब चाहें अमेरिका का टेंटुआ कस सकता है। ईरान, उजबेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के रास्तों से भी अफगानिस्तान पहुंचा जा सकता है लेकिन वे काफी लंबे और खर्चीले हैं। इन्हीं रास्तों की मजबूरी के कारण अमेरिका पाकिस्तानी ब्लेकमेल के आगे घुटने टेकता रहता है। अब भी वह घुटने टेक दे तो आश्चर्य नहीं होगा।

लेकिन इस समय अमेरिकी जनता और सीनेट इतनी क्रोधित है कि यदि इस बार पाकिस्तान को सबक नहीं सिखाया गया तो ओबामा निष्चय ही 2014 का चुनाव हार जाएंगे। ओबामा ने उसामा को मारकर जैसे अपने नाम को चमकाया है, वैसे ही वे हक्कानी-गिरोह का सफाया करके ‘हीरो’ क्यों नहीं बनना चाहेंगे? उन्हें जरूर बनना चाहिए। उन्हें चाहिए कि वे ईरान से संबंध-सुधारें, शांघाई-समूह के रूस और उजबेकिस्तान-जैसे राष्ट्रों को अफगानिस्तान में पहल करने दें और भारत को अग्रगण्य भूमिका लेने दें। देखें कि पाकिस्तान ब्लेकमेल कैसे करेगा ? या तो पाकिस्तान किसी सभ्य और शिष्ट राष्ट्र की तरह बर्ताव करेगा या फिर वह अंतरराष्ट्रीय अछूत घोषित होने के लिए तैयार रहेगा। पाकिस्तान को पता है कि उसका अपराध सद्दाम हुसैन और तालिबान से कहीं अधिक संगीन है। वह विश्व-राजनीति का खलनायक बनने से जरूर बाज आएगा। यदि वह अपनी करतूतों से बाज़ नहीं आए तो उसे सबक सिखाने का इससे बढ़िया मौका अमेरिका के हाथ कब आएगा?

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यह गरीब नहीं, ढोर होने का पैमाना है

नया इंडिया, 25 Sept 2011 : अगर किसी की गरीबी तय करने का पैमाना सिर्फ यही है कि वह रोज़ाना कितना खर्च करता है तो हमारे देश में सबसे ज्यादा गरीब तो नेता लोग ही होंगे, क्योंकि उन्हें तो कुछ खर्च करना ही नहीं पड़ता है। माले-मुफ्त और दिले-बेरहम! उन्हें हर चीज़ लगभग मुफ्त मिलती है। हर चीज़ उन्हें इतने रियायती दाम पर मिलती है कि उसी दाम पर वे चीजे़ अगर सबको मिलने लगें तो देश की गरीबी ही दूर हो जाए। क्या घी-दूध, क्या खाना, क्या मकान, क्या रेल और क्या हवाई यात्राएं और क्या-क्या भत्ते? कपड़े-लत्ते और जेवर तो लोग रोज़ भेंट चढ़ा ही जाते हैं। लाखों रू. में मिलनेवाला वेतन बैंकों में ज्यों का त्यों जमा होता रहता है। कोई भी विधायक, सांसद और मंत्री बाद में बनता है, उसका खर्च घटना पहले से ही शुरू हो जाता है। उनके यहॉं तो आमदनी ही आमदनी है। वहॉं खर्च का क्या काम?

खर्च तो बेचारे आम नागरिक करते हैं। खर्च का बोझ कर्ज लेने को मजबूर करता है और कर्ज आत्महत्या करने को मजबूर करता है। हजारों किसान अब तक मौत के घाट उतर चुके हैं। हमारी सरकार बड़ी दयालु है। वह किसी को भी मरने देना नहीं चाहती। इसीलिए आजकल वह देश में गरीबों की तलाश में जुटी हुई है। हमारा योजना आयोग उच्चतम न्यायालय को बता रहा है कि इस देश में शहरी गरीब वह है, जो ज्यादा से ज्यादा 32 रू. रोज़ और ग्रामीण गरीब वह है, जो 26 रू. रोज़ खर्च करता है।

पता नहीं सरकार किसे खोज रही है? कोई इन्सान तो 32 रू रोज में गुजारा नहीं कर सकता। इतने कम पैसों में तो जानवर का गुजारा भी मुश्किल है। वह देश में गरीब खोज रही है या जानवर खोज रही है? वह देश के लगभग 80 करोड़ लोगों को क्या मालदार कहना चाह रही है? जो 33 रू. रोज खर्च कर सकता है, क्या वह गरीब नहीं है? अर्जुन सेनगुप्ता ने अभी कुछ साल पहले ही अपनी रपट में लिखा था कि लगभग 80 करोड़ लोग 20 रू. रोज पर गुजारा कर रहे हैं। यदि वे आज 35 रू रोज पर भी गुजारा कर रहे हो तो क्या हम उन्हें गरीब नहीं मानेंगें ? क्या उन्हें वे सुविधाएं नहीं मिलेंगी, जो किसी भी गरीब को मिलनी चाहिए? इस देश में करोड़ों लोगों को न्यूनतम रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और चिकित्सा उपलब्ध नहीं है। वे जानवरों का जीवन जी रहे हैं। उन्हें गरीब मानना गरीबी का मज़ाक है। जिसे गरीबी का पैमाना बताया जा रहा है, वह वास्तव में ढोर होने का पैमाना है। इस देश को हमारी सरकार ढोरों का देश बनाने पर तुली हुई है।

इस मुद्दे पर हमारे नेताओं को कोई शर्म नहीं आती, क्योंकि उनका खर्च तो इन ‘ढोरों’ से भी कम है लेकिन कई नेता ज़रा एक हफ्ते के लिए 32 रू0 रोज में जीकर दिखाएं? सच्चाई तो यह है कि इस देश में सरकारों के कान खींचनेवाले नेता अब हैं ही नहीं। ज़रा याद कीजिए, तीन आनेवाली बहस! लोहिया ने कहा था कि करोड़ों लोग तीन आने रोज पर गुजारा करते हैं, जबकि प्रधानमंत्री पर 25000 रू. रोज़ खर्च होता है। आज आम आदमी पर 30 रू. रोज खर्च होता है तो प्रधानमंत्री और मंत्रियों पर तीन लाख रू. रोज़ से ज्यादा खर्च होता हैं। लेकिन यह सवाल कौन उठाएगा, क्योंकि सारे कुएं में ही भांग पड़ी हुई है। सारे नेता एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। मौसेरे भाइयों ने लूट मचा रखी है।

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भारत के बड़े दोस्त थे रब्बानी

Naya India, 23 Sept 2003 : अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति प्रो. बुरहानुद्दीन रब्बानी की हत्या से अफगानिस्तान में चल रहे शांति-प्रयासों को गहरा धक्का लगेगा| वे अफगानिस्तान के सबसे बड़े नेताओं में से एक थे| वे सिर्फ राष्ट्रपति ही नहीं रहे, उन्होंने लगभग 20 साल तक मुजाहिदीन-संघर्ष का भी नेतृत्व किया था| वे पठान नहीं थे| वे ताजि़क थे, फारसीभाषी थे और उनका जन्म बदख्शान में हुआ था, जो पामीर पहाड़ों का घर है| उसे दुनिया की छत भी कहा जाता है|

     इस समय वे अफगानिस्तान की उच्च शांति समिति के अध्यक्ष थे| उनके नेतृत्व में ही अफगानिस्तान की सबसे कठिन समस्या का समाधान खोजा जा रहा था| यह रब्बानी साहब के शानदार व्यक्तित्व का ही कमाल था कि उनके नाम पर अफगानिस्तान के सभी नेता और अमेरिका, पाकिस्तान व ईरान आदि सभी देश सहमत थे| तालिबान से बात करने के लिए सबसे उपयुक्त नेता वही थे| उनकी हत्या इसीलिए हुई है कि बड़े-बड़े तालिबान नेताओं की दुकानें रब्बानी साहब की वजह से बंद होने लगी थीं|

     प्रो. रब्बानी ताजि़क थे और तालिबान गिलजई पठान हैं, फिर भी उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारी इसीलिए सौंपी गई थी कि वे स्वभाव से विनम्र, मृदुभाषी और अच्छे मुसलमान थे| उनके नेतृत्व की सफलता का प्रमाण यही है कि उनकी शांति समिति में अनेक पूर्व तालिबान नेता सहर्ष शामिल हो गए थे, जिनमें अब्दुल हकीम मुजाहिद प्रमुख हैं| मुजाहिद वाशिंगटन में तालिबान के अनौपचारिक लेकिन वास्तविक राजदूत हुआ करते थे|

     प्रो. रब्बानी का व्यक्तित्व इतना सर्वस्वीकार्य था कि सत्ता में न रहते हुए भी वे काबुल में सत्ता के समानांतर केंद्र बने हुए थे| यों तो वे जमीयते-इस्लामी नामक पार्टी के अध्यक्ष थे लेकिन पिछले कई वर्षों से अफगानिस्तान के लगभग सभी प्रमुख दलों के संगठन ‘राष्ट्रीय मोर्चा’ (जब्हे-मिल्ली) के भी वे ही अध्यक्ष थे| अफगानिस्तान में बाकायदा राजनीतिक दल नहीं हैं, भारत की तरह| लेकिन अनेक संगठन दलों की तरह काम करते हैं| इन संगठनों के नेताओं में अनेक मुजाहिदीन कमांडर, कई पश्तो, ताजिक, उजबेक और हजारा नेता और कई पुराने कम्युनिस्ट नेता भी शामिल हैं| वजीर अकबर खान नामक मशहूर बस्ती में बने प्रो. रब्बानी के मकान में इन नेताओं के साथ बातचीत करने और उन्हें संबोधित करने के अवसर मुझे भी कई बार मिले हैं| राष्ट्रपति हामिद करजई से असंतुष्ट रहनेवाले सभी नेता प्रो. रब्बानी की शरण में पहुंच जाते थे लेकिन उन्होंने करजई के लिए कभी कोई सीधा खतरा खड़ा नहीं किया|

     प्रो. रब्बानी के इतने अहिंसक व्यक्तित्व के बावजूद तालिबान के प्रति सहानुभूति रखनेवाले पठान यह मानते थे कि अगर तालिबान को मुख्यधारा में जोड़ने में रब्बानी सफल हो गए तो अफगानिस्तान की राजगद्दी एक बार फिर पठानों के हाथ से खिसक जाएगी| रब्बानी साहब जैसा कोई ताजिक दुबारा राष्ट्रपति बन जाएगा| इस अर्थ में इस समय जो हत्या हुई है, वह एक पूर्व राष्ट्रपति की तो है ही, वह अफगानिस्तान के भावी राष्ट्रपति की भी है| मेरी यह व्याख्या इसलिए भी तर्क संगत है कि हामिद करजई ने अगला चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा कर दी है|

     रब्बानी की हत्या इतनी गंभीर घटना है कि करज़ई को संयुक्तराष्ट्र का अपना कार्यक्रम स्थगित करके काबुल आना पड़ा है| रब्बानी और करज़ई के आपसी संबंध काफी गरिमापूर्ण रहे हैं, यह दोनों ने ही मुझे कई खास मौकों पर कहकर और करके बताया है| रब्बानी के बेटे सलाहुद्दीन को भी अभी कुछ माह पहले ही करजई ने तुर्की में राजदूत नियुक्त किया है| इसके बावजूद काबुल के अनेक लोग रब्बानी की हत्या का दोष करजई के माथे मढ़ने की फूहड़ कोशिश करेंगे| इस सारी घटना को वे जातीय चश्मे से देखनें और दिखाने की कोशिश करेंगे| इन प्रयासों का परिणाम भयंकर हो सकता है| पठानों और ताजि़कों में दूरियॉं बढ़ सकती हैं| इसका लाभ तालिबान को मिलेगा| पाकिस्तान के उग्रवादी तबके भी खुश होंगे| पाकिस्तानी सरकार ने गहरा शोक व्यक्त किया है लेकिन कौन नहीं जानता कि पगड़ी में बम रखकर रब्बानी की जान लेनेवाला व्यक्ति ब्लूचिस्तान स्थित ‘क्वेटा-शुरा’ का सदस्य था| पाकिस्तान सरकार की अनदेखी के बिना क्या क्वेटा-शूरा या हक्कानी बि्रगेड एक दिन भी जिन्दा रह सकते हैं?

     अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के लिए यह कह देना आसान है कि रब्बानी की हत्या के बावजूद तालिबान से बात जारी रहेगी लेकिन ओबामा को अफगानिस्तान के आंतरिक हालात की कितनी समझ है? ओबामा के लिए यह समझना आसान नहीं है कि रब्बानी की हत्या का असर अहमदशाह मसूद की हत्या से भी अधिक गंभीर होगा| मसूद की हत्या तो विदेशियों ने की थी लेकिन रब्बानी की हत्या को देश के एक बड़े वर्ग के साथ जोड़कर देखा जाएगा| सच्ची बात तो यह है कि रब्बानी की हत्या अमेरिका के लिए अब एक नया सिरदर्द खड़ा कर देगी|

     प्रो. रब्बानी ने मुजाहिद्दीन नेता के तौर पर लगभग 20 साल पेशावर में बिताए लेकिन पाकिस्तान उन्हें अपना मोहरा नहीं बना सका| मैं उन्हें 1969 से ही जानता था| वे काबुल विश्वविद्यालय में नए-नए लेक्चरर लगे थे| इस्लामी कानून पढ़ाते थे और मैं अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अनुसंधान कर रहा था| जब 1983 में पेशावर में मैं उनसे मिला तो उन्होंने मुझे पहचान लिया और उन्होंने अपने तंबू में मेरी बड़ी आवभगत की| मैं लगभग सभी विश्व-विख्यात मुजाहिदीन नेताओं से मिला और अब तक लगातार मिलता रहता हूं लेकिन प्रो. रब्बानी के साथ एक खास तरह की आत्मीयता बन गई| 1983 और 1988 में रब्बानी साहब मेरी इस पहल के लिए तैयार हो गए कि काबुल के प्रधानमंत्रियों से बात की जाए, खून-खराबा बंद किया जाए और शांतिपूर्ण समाधान निकाला जाए| पाकिस्तान के घनघोर विरोध के बावजूद इस दिशा में कदम बढ़ानेवाले वे अकेले बड़े मुजाहिदीन नेता थे| मेरा मानना था कि जब तक मुजाहिदीन के सभी नौ संगठनों में एकता नहीं हो जाती, काबुल से बातचीत सफल नहीं होगी| प्रो. रब्बानी ने आगे होकर गुलबदीन हिकमतयार से बात की| अन्य नेताओं से भी| उन्होंने मेरे निवेदन को माना और सभी मुजाहिद्दीन नेताओं से व्यक्तिगत अपील की कि वे इंदिरा गांधी और बाद में राजीव गांधी को गालियॉं देना बंद करें| उसका असर भी हुआ|

     कई बार में सोचता हूं कि रब्बानी साहब ताजिक नहीं होते और पठान होते तथा बदख्शान में नहीं, कुणार या कंधार में पैदा हुए होते तो क्या अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच अराजकता का दौर इतना लंबा चलता? किसी तगड़े पठान बादशाह की तरह वे सख्ती से काम लेते तो क्या तालिबान उनका तख्ता उलट पाते? क्या पाकिस्तान उनके खिलाफ सफल हो पाता ?

     यों तो प्रो. रब्बानी के मुजाहिद साथियों में से अभी सिबगतुल्लाह मुजद्ददी, पीर गैलानी और सय्याफ जिंदा हैं और काबुल में उनका सम्मान भी काफी है लेकिन रब्बानी का विकल्प खोजना आसान नहीं है| जुलाई में प्रो0 रब्बानी जब दिल्ली आए थे तो 16 जुलाई को वे और मैं पूरे दिन साथ रहे| यह उनकी दूसरी भारत-यात्र थी लेकिन इसके पहले भी एक बार उन्होंने भारत की गुप्त-यात्रा की थी| वे भारत के अभिन्न मित्रें में से थे| पाकिस्तान समर्थित तालिबान से लड़ने के लिए रब्बानी साहब ने जो ‘नार्दन एलायंस’ बनाया था, उसे हमारा पूरा समर्थन था| पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के लोगों को गुमराह करने के लिए यह झूठ फैला दिया था कि अफगानिस्तान के सारे पठान पाकिस्तान के साथ हैं और रब्बानी के नेतृत्व में सारे गैर-पठान ईरान और भारत के साथ हैं| भारत ने अफगानिस्तान की एकता को सदा सर्वोपरि माना है| उसने प्रो. रब्बानी जैसे ताजिक को अपना मित्र् माना तो करजई जैसे पठान को अत्यंत विशिष्ट महत्व दिया है|

     अफगानिस्तान की इस राष्ट्रीय शोक की घड़ी में भारत उसके साथ है|

              (लेखक, अफगान मामले के प्रख्यात विशेषज्ञ हैं| प्रो. रब्बानी और लेखक अब से 42 साल पहले काबुल विश्वविद्यालय में एक साथ काम करते थे)

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मोदी बनाम राहुल : पटेल चले गांधी की राह

नया इंडिया, 17 सितंबर 2011 : नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी, दोनों को अमेरिकी विशेषज्ञ एक ही डंडे से हांक रहे हैं| दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है| दोनों को वे अभी से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर रहे हैं| मानो कि जैसे यह चुनाव अमेरिका के राष्ट्रपति का हो, न कि भारत के प्रधानमंत्री का| वे भूल तो नहीं गए कि भारत में प्रधानमंत्री का प्राय: चुनाव नहीं होता, नामजदगी होती है| संसद के चुनाव में जीती हुई पार्टी अपने नेता के नाम की घोषणा कर देती है| राष्ट्रपति उसे ही प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला देता है|

प्रधानमंत्र्ी का चुनाव होता है लेकिन कभी-कभी, जैसा कि इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई के बीच हुआ था या विश्वनाथप्रताप सिंह और चंद्रशेखर के बीच होना था| वह भी पार्टी का अंदरूनी मामला होता है| अटलबिहारी वाजपेयी या मनमोहन सिंह के खिलाफ उनकी संसदीय पार्टी में क्या कोई उम्मीदवार खड़ा हुआ था? जाहिर है कि कांग्रेस पार्टी में आज राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ने की हिम्मत किसी में नहीं है| किसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में चेयरमेन या उसके बेटे के खिलाफ मुंह खोलने की इज़ाजत किसी को होती है क्या? अभी आम चुनाव तो बहुत दूर हैं, यदि राहुल कल प्रधानमंत्री बनना चाहें तो उन्हें कौन रोक सकता है?

कांग्रेस-जैसी लौह-अनुशासनवाली पार्टी दुनिया में कोई नहीं है| उसके पास विनम्र और आज्ञाकारी नेताओं और कार्यकर्त्ताओं की जैसी फौज है, वैसी तो हिटलर और मुसोलिनी के पास भी नहीं थी| आज्ञापालन और समर्पण में कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता सोवियत संघ और चीन को भी मात करते हैं| इन दोनों देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों में भी सत्तारूढ़ गिरोहों के विरूद्घ समय-समय पर प्रश्न-चिन्ह लगते रहे और बगावतें होती रहीं लेकिन कांग्रेस में ऐसा तभी होता है, जब नेता धराशायी हो जाए, जैसे कि 1977 में हुआ था| इटली, जर्मनी, सोवियत और चीन की इन पार्टियों में तानाशाही जरूर चली लेकिन मुसोलिनी, हिटलर, स्तालिन और माओ की ऐसी हिम्मत कभी नहीं हुई कि वे अपनी पत्नी, बेटी या बेटे को पार्टी पर थोप दें| इसीलिए यह प्रश्न निरर्थक है कि कांग्रेस का प्रधानमंत्र्ी का अगला उम्मीदवार कौन होगा ? कौन होगा, यह सबको पता है| हॉं, यह प्रश्न जरूर सार्थक है कि संसद के अगले चुनाव में कांग्रेस पार्टी जीत पाएगी या नहीं?

कांग्रेस की जो हालत आज है, यदि अगले दो-ढाई वर्ष वही बनी रही तो राहुल की उम्मीदवारी अपने आप खटाई में पड़ सकती है| पिछले छह माह में भारतीयों के दिलों पर राज करने के अनंत अवसर आए लेकिन राहुल ने एक के बाद एक सभी गवां दिए| अण्णा के अनशन तोड़ने के दिन राहुल ने संसद में जो लिखा हुआ भाषण पढ़ा, उसने उनकी रही-सही छवि को भी शीर्षासन करवा दिया| लोग समझ गए है कि राहुल नेता नहीं, सिर्फ अभिनेता हैं, वह भी कच्चे-पक्के! अब तक वे जो लोक-लुभावन करतब दिखाते रहे, वे दूसरों के इशारे पर की गई नौटंकियां भर थी| यह देश इतना बुद्घू नहीं है कि वह ऐसे लोगों के हाथ में अपनी लगाम थमा दे|  कांग्रेस और देश इस समय सचमुच एक प्रधानमंत्री की तलाश में हैं लेकिन राहुल ने अपने आचरण से सिद्घ कर दिया कि कांग्रेस और देश दोनों को ही फिलहाल मनमोहनसिंह को बर्दाश्त करना पड़ेगा| राहुल के उम्मीदवार बनने का सवाल तो तब उठेगा, जब कांग्रेस जीतेगी| जीती तो वह पिछले चुनाव में भी नहीं थी| केवल सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी| इस बार इस संभावना पर भी लगातार बादल छाते जा रहे हैं|

जहॉं तक नरेंद्र मोदी का सवाल है, वे किस्मत के धनी हैं| 2002 के गुजरात के रक्त-स्नान के बावजूद कोई मुख्यमंत्री इतने प्रचंड बहुमत से जीत सकता है, इसकी कल्पना स्वयं नरेंद्र मोदी को भी नहीं रही होगी| जिस गुजरात पर राजधर्म के उल्लंघन का आरोप स्वयं प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी लगा रहे हों ओर सारे देश के सेक्युलर तत्व मोदी की जान पर आए हुए हों, उस गुजरात ने बता दिया कि उसकी खिचड़ी अलग पकेगी| मोदी-विरोधी अभियान को गुजरात की जनता ने अभी तक छुआ भी नहीं है| गुजरात के मुसलमान भी अब इस अभियान में ज्यादा मुखर नहीं हैं, सकि्रय नहीं हैं| वे लगभग उसी लकीर पर चल रहे हैं, जिसके कारण मौलाना गुलाम मुहम्मद वस्तानवी को देवबंद से इस्तीफा देना पड़ा था| सिर्फ हिंदू सेक्यूलरवादी गड़े मुर्दे उखाड़ने पर तुले हुए हैं| कई बार उनकी भी पोल खुल चुकी है लेकिन ऐसा लगता है कि भारत के मीडिया में अभी भी उनका कुछ असर बाकी है|

यदि गुजरात की जनता पर उनका कुछ असर होता तो वह दूसरी बार मोदी को नहीं चुनती लेकिन 2002 के बाद मोदी ने कुछ अजूबा ही किया| मुसलमानों के नर-संहार के कारण मोदी के विरूद्घ जो लकीर गुजरात में खिंच गई थी, मोदी ने उस लकीर के मुकाबले एक इतनी बड़ी लकीर खींच दी कि वह सारे भारत में चमचमाने लगी| जो काम एक अर्थशास्त्री, पीएचडी प्रधानमंत्री नहीं कर सका, वह काम संघ के एक साधारण स्वयंसेवक ने कर दिखाया| वाम-दक्ष करनेवाले चड्डी-टोपी के स्वयंसेवक से क्या आशा की जा सकती थी? प्रधानमंत्री 9-10 प्रतिशत आर्थिक उन्नति के सपने देखते रहे और इस मुख्यमंत्री ने गुजरात को 11 प्रतिशत से भी आगे बढ़ा दिया| अब तक मोदी की ईमानदारी और निजी चरित्र् के बारे में वैसी ही प्रमाणिकता है, जैसे मनमोहन सिंह की है| यदि मोदी की लकीर सचमुच मनमोहनसिंह से ज्यादा लंबी नहीं होती तो अमिताभ बच्चन, मुकेश अंबानी, टाटा और दुनिया की कई प्रसिद्घ कंपनियों के कर्ता-धर्ता अहमदाबाद को अपना गंतव्य क्यों बनाते?

उच्चतम न्यायालय के निर्णय ने मोदी को बरी नहीं किया है लेकिन उनकी उस लंबी लकीर पर कई नए दीप-स्तंभ खड़े कर दिए हैं| निचली अदालत मोदी के बारे में क्या फैसला करेगी, कुछ पता नहीं लेकिन कोई भी फैसला मोदी की लकीर को अब छोटा नहीं कर पाएगी, क्योंकि लोकतंत्र् में अंतिम फैसला तो जनता ही करती है| राज्यपाल कमला बेनीवाल ने मोदी पर लोकायुक्त थोपकर अपनी और लोकायुक्त, दोनों की छवि गिराई| मोदी का कद बढ़ाया| मोदी ने तीन दिन के उपवास की घोषणा क्या की, वे अब सीधे जनता के अखाड़े में पहुंच गए हैं मोदी के इस काम से भाजपा के सजावटी नेताओं में तो हड़कंप मचेगा ही, बेचारे सेक्यूलरवादी भी पसोपेश में पड़ जाएंगें| वे इसे प्रायश्चित-उपवास बता रहे हैं| लेकिन सरदार पटेल बने मोदी को अब गांधी बनने की राह पर चलने से कौन रोक सकता है?

इसका अर्थ यह नहीं कि वे भाजपा के राहुल गांधी बन जाएंगें| भाजपा अभी भी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी नहीं बनी है| भाजपा में प्रधानमंत्र्ी पद के लगभग आधा दर्जन उम्मीदवार हैं| वे एक दम हतोत्साहित होनेवाले नहीं हैं| वे चाहेंगे कि गुजरात का जिन्न गुजरात की बोतल में ही बंद रहे लेकिन यह उपवास उस बोतल के ढक्कन को उड़ा देगा| सारे देश का ध्यान इस उपवास पर जाएगा| यह अगर प्रायश्चित भी समझा गया तो इसका फायदा नरेंद्र मोदी को ही मिलेगा| मोदी के उपवास के मुकाबले अब शंकरसिंह वाघेला उपवास करेंगे याने उपवास का उपहास करेंगे| ऐसा करके वे खुद को और कांग्रेस को भी उपहास का पात्र् बना लेंगे|

नरेंद्र मोदी हर अवसर का लाभ उठा रहे हैं और राहुल गांधी हर अवसर खोते जा रहे हैं| दोनों की तुलना कैसे हो सकती है? यदि मोदी गैर-भाजपा नेताओं को स्वीकार्य नहीं हैं याने गुजरात के बाहर वोटखेंचू नहीं हैं तो राहुल गांधी या सोनिया गांधी कौनसे वोटखेंचू हैं? एक विश्लेषक ने आंकड़ों के आधार पर सिद्घ किया था कि पिछले चुनाव में मॉं-बेटे जहां-जहां गए, वहां-वहां उद्वार कम, बंटाधार ज्यादा हुआ| इसके अलावा 10 साल की हुकूमत के अनुभव और नौटंकियों में क्या कोई अंतर नहीं है? प्रधानमंत्री के उम्मीदवार तो दोनों बन सकते हैं लेकिन असली सवाल यह है कि वास्तव में बनेगा कौन और जो बनेगा, वह उस पद के योग्य भी होगा या नहीं ?


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संयुक्तराष्ट्र में हिंदी का हक

14 Sept 2011 : संयुक्तराष्ट्र संघ में अगर अब भी हिंदी नहीं आएगी तो कब आएगी ? हिंदी का समय तो आ चुका है लेकिन अभी उसे एक हल्के-से धक्के की जरूरत है| भारत सरकार को कोई लंबा चौड़ा खर्च नहीं करना है, उसे किसी विश्व अदालत में हिंदी का मुकदमा नहीं लड़ना है, कोई प्रदर्शन और जुलूस आयोजित नहीं करने हैं| उसे केवल डेढ़ करोड़ डॉलर प्रतिवर्ष खर्च करने होंगे, संयुक्तराष्ट्र के आधे से अधिक सदस्यों (96) की सहमति लेनी होगी और उसकी काम-काज नियमावली की धारा 51 में संशोधन करवाकर हिंदी का नाम जुड़वाना होगा| इस मुद्दे पर देश के सभी राजनीतिक दल भी सहमत हैं| सूरिनाम में संपन्न हुए पिछले विश्व हिंदी सम्मेलन में मैंने इस प्रस्ताव पर जब हस्ताक्षर करवाए तो सभी दलों के सांसद मित्रों ने सहर्ष उपकृत कर दिया|

कौन भारतीय है, जो अपने राष्ट्र की भाषा को विश्व-मंच पर दमकते हुए देखना नहीं चाहेगा| जिन भारतीयों को अपने प्रांतों में हिंदी के बढ़ते हुए वर्चस्व पर कुछ आपित्त है, वे भी संयुक्तराष्ट्र में हिंदी लाने का विरोध नहीं करेंगे, क्योंकि वे जानते हैं कि विश्व मंच पर 22 bhartiya भाषाएँ भारत का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकतीं| वे यह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि विश्व-मंच पर भारत गूँगा बनकर बैठा रहे| उनका उत्कट राष्ट्रप्रेम उन्हें प्रेरित करेगा कि हिंदी विश्व-मंच पर भारत की पहचान बनकर उभरे| उन्हें भारत की बढ़ती हुई शक्ति और संपन्नता पर उतना ही गर्व है, जितना किसी भी हिंदीभाषी को है| वे जानते हैं कि जिस राष्ट्र के मुँह में अपनी जुबान नहीं, वह महाशक्ति कैसे बन सकता है? उसे सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता कैसे मिल सकती है? स्थायी सदस्यता तो बहुत बाद की बात है| पहले कम से कम सदस्यता के द्वार पर भारत दस्तक तो दे| संयुक्तराष्ट्र में हिंदी ही यह दस्तक है|

अगर हमने संयुक्तराष्ट्र में पहले हिंदी बिठा दी तो हमें सुरक्षा परिषद् में बैठना अधिक आसान हो जाएगा| 1945 में संयुक्तराष्ट्र की आधिकारिक भाषाएँ केवल चार थीं| अंग्रेजी, रूसी, फ्रांसीसी, और चीनी| सिर्फ ये चार ही क्यों? सिर्फ ये चार इसलिए कि ये चारों भाषाएँ पाँच विजेता महाशक्तियों की भाषा थीं| अमेरिका और बि्रटेन, दोनों की अंग्रेजी, रूस की रूसी, फ्रांस की फ्रांसीसी और चीन की चीनी! इन भाषाओं के मुकाबले इतालवी, जर्मन,जापानी आदि भाषाएँ किसी तरह कमतर नहीं थीं लेकिन वे विजित राष्ट्रों की भाषाएँ थी| याने जिस भाषा के हाथ में तलवार थी, ताकत थी, विजय-पताका थी, वही सिंहासन पर जा बैठी| क्या अब  65 साल बाद भी यही ताकत का तर्क चलेगा? जो ढाँचा द्वितीय महायुद्घ के बाद बना था, उसका लोकतंत्रीकरण होगा या नहीं? यदि होगा| तो संयुक्तराष्ट्र के सिंहासन पर विराजमान होने का सबसे पहला हक हिंदी का होगा| यदि 1945 में भारत आजाद होता तो उसकी भाषा हिंदी को संयुक्तराष्ट में अपने आप ही मान्यता मिल जाती|

1945 में जो चार भाषाएँ संयुक्तराष्ट्र की अधिकृत भाषाएँ बनीं, उनमें 1973 में दो भाषाएँ और जुडीं| हिस्पानी और अरबी! इन दोनों भाषाओं को बोलने वाले लगभग दो-दो दर्जन राष्ट्रों में से एक भी ऐसा नहीं था, जिसे महाशक्ति कह सकें या विकसित राष्ट्र मान लें| ये राष्ट्र आपस में मिलकर भी किसी महाशक्ति-मंडल की छवि प्रस्तुत नहीं करते| कई राष्ट्र एक ही भाषा जरूर बोलते हैं लेकिन वे गरीब हैं, पिछड़े हैं, छोटे हैं, पर-निर्भर हैं और अगर वे सशक्त और बड़े हैं तो आपस में झगड़ते हैं, संयुक्तराष्ट्र में एक-दूसरे के विरूद्घ मतदान करते हैं| दूसरे शब्दों में उनकी भाषाओं को संयुक्तराष्ट्र में शक्तिबल के कारण नहीं, संख्याबल के कारण मान्यता मिली|

हिंदी को तो पता नहीं, किन-किन बलों के कारण मान्यता मिलनी चाहिए| सबसे पहला कारण तो यह है कि हिंदी को मान्यता देकर संयुक्तराष्ट्र अपनी ही मान्यता का विस्तार करेगा| उसके लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया का यह शुभारम्भ माना जाएगा| 65 साल से विजेता और विजित के खाँचे में फँसी हुई संयुक्तराष्ट्र की छवि का परिष्कार होगा| दूसरा, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र्, दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश और दुनिया के चौथे सबसे मालदार देश की भाषा को मान्यता देकर संयुक्तराष्ट्र अपना गौरव खुद बढ़ाएगा| तीसरा, हिंदी को मान्यता देनेका अर्थ है – तीसरी दुनिया और गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों को सम्मान देना| भारत इन राष्ट्रों का नेतृत्व करता रहा है| चौथा, हिंदी विश्व की सबसे अधिक समझी और बोली जानेवाली भाषा है| संयुक्तराष्ट्र की पाँच भाषाओं से हिंदी की तुलना करना बेकार है| वह उनसे कहीं आगे है| हाँ, चीनी से तुलना हो सकती है| चीन की अधिकृत भाषा ‘मेंडारिन’ है| इस भाषा को बोलने-समझनेवालों की संख्या विभिन्न भाषाई-विश्वकोषों में लगभग 85 करोड़ बताई जाती है| उसे 100 करोड़ भी बताया जा सकता है| लेकिन असलियत क्या है? असलियत के बारे में बहुत-से मतभेद हैं| चीन में दर्जनों स्थानीय भाषाएँ हैं| उन्हें लोग दुभाषियों के बिना समझ ही नहीं पाते| मैं स्वयं 8-10 बार चीन घूम चुका हूँ| एक-एक माह वहाँ रहा हूँ| मुझे कई बार दो-दो तरह के दुभाषिए एक साथ रखने पड़ते थे| अगर यह मान लें कि दुनिया में चीनी भाषियों की संख्या एक अरब है तो भी इससे हिंदी पिछड़ नहीं जाती| आज हिंदीभाषियों की संख्या एक अरब से भी ज्यादा है| सिनेमा और टीवी चैनलों की कृपा से अब लगभग सारे भारत के लोग हिंदी समझ लेते हैं और जरूरत पड़ने पर बोल भी लेते हैं| अगर मान लें कि दक्षिण भारत के 10-15 करोड़ लोगों को हिंदी के व्यवहार में अब भी कठिनाई है तो उसकी भरपाई दक्षेस के अन्य सात राष्ट्रों में बसे लगभग 35 करोड़ लोग कर देते हैं| उनमें से ज्यादातर हिंदी समझते हैं| उनके अलावा विदेशों में बसे दो करोड़ से ज्यादा भारतीय भी हिंदी का प्रयोग सगर्व करते हैं| अत: संख्याबल के कोण से देखा जाए तो संयुक्तराष्ट्र में हिंदी  को प्रतिष्ठित करना दुनिया के लगभग डेढ़ अरब लोगों को प्रतिनिधित्व देना है|

पाँचवाँ, हिंदी जितने राष्ट्रों की बहुसंख्यक जनता द्वारा बोली-समझी जाती है, संयुक्तराष्ट्र की पहली चार भाषाएँ नहीं बोली-समझी जाती हैं| याद रहे बहुसंख्यक जतना द्वारा! यह ठीक है कि अंग्रेजी, फ्रांसीसी और रूसी ऐसी भाषाएँ हैं, जिन्हें बि्रटेन, फ्रांस और रूस के दर्जनों उपनिवेशों में बोला जाता रहा है| लेकिन ये भाषाएँ उन उपनिवेशों के दो-चार प्रतिशत से ज्यादा लोग आज भी नहीं बोलते जबकि हिंदी भारत ही नहीं, पाकिस्तान, नेपाल, मोरिशस, टि्रनिडाड,सूरिनाम,फीजी,गयाना,बांग्लादेश आदि देशों की बहुसंख्यक जनता द्वारा बोली और समझी जाती है| जब इस बहुराष्ट्रीय भाषा में संयुक्तराष्ट्र की गतिविधियाँ टी.वी. पर सुनाई देंगी तो कल्पना कीजिए कि कितने लोगों और कितने राष्ट्रों का संयुक्तराष्ट्र के प्रति जुड़ाव बढ़ता चला जाएगा|

छठा, यदि हिंदी संयुक्तराष्ट्र में प्रतिष्ठित होगी तो दुनिया की अन्य सैकड़ों भाषाओं के लिए शब्दों का नया खजाना खुल पड़ेगा| हिंदी संस्कृत की बेटी हैं| संस्कृत की एक-एक धातु से कई-कई हजार शब्द बनते हैं| एशियाई और अफ्रीकी ही नहीं, यूरोपीय और अमेरिकी भाषाओं में भी आजकल शब्दों का टोटा पड़ा रहता है| अन्तराष्ट्रीय विज्ञान और व्यापार के कारण रोज़ नए शब्दों की जरूरत पड़ती है| इस कमी को हिंदी पूरा करेगी| सातवाँ, इसके अलावा हिंदी के संयुक्तराष्ट्र में पहुँचते ही दुनिया की दर्जनों भाषाओं को लिबास मिलेगा| वे निवर्सन हैं| उनकी अपनी कोई लिपि नहीं है| तुर्की, इंडोनेशियाई, मंगोल, उज़बेक, स्वाहिली, गोरानी आदि अनेक भाषाएँ हैं, जो विदेशी लिपियों में लिखी जाती हैं| मजबूरी है| हिंदी इस मजबूरी को विश्व-स्तर पर दूर करेगी| वह रोमन,रूसी और चित्र्-लिपियों का शानदार विकल्प बनेगी| उसकी लिपि सरल और वैज्ञानिक है| जो बोलो सो लिखो और जो लिखो, सो बोलो| संयुक्तराष्ट्र में बैठी हिंदी विश्व के भाषाई मानचित्र् को बदल देगी|

यदि हिंदी संयुक्तराष्ट्र में दनदनाने लगी तो उसके चार ठोस परिणाम एक दम सामने आएँगे| पहला, भारतीय नौकरशाही और नेताशाही को मानसिक गुलामी से मुक्ति मिलेगी| भारत के राज-काज में हिंदी को उचित स्थान मिलेगा| दूसरा, भारतीय भाषाओं की जन्मजात एकता में वृद्घि होगी| तीसरा, दक्षेस राष्ट्रों में संगच्छध्वं संवदध्वं का भाव फैलेगा| जनता से जनता का जुड़ाव बढ़ेगा| तीसरा, वैश्वीकरण की प्रक्रिया में अंग्रेजी का सशक्त विकल्प तैयार होगा| चौथा, स्वभाषाओं के जरिए होनेवाले शिक्षण, प्रशिक्षण और अुनसंधान की गति तीव्र होगी| उसके कारण भारत दिन-दूनी रात चौगुनी उन्नति करेगा| सचमुच वह विश्व-शक्ति और विश्व-गुरू बनेगा|

 

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गुजरात के असली हत्यारे कब तक पकड़े जाएंगे

नया इंडिया, 14 सितंबर 2011 : एहसान जाफरी के मामले में उच्चतम न्यायालय ने जो निर्णय किया है, उस पर कांग्रेस और भाजपा दोनों की प्रतिकि्रया सही मालूम पड़ती हैं| कांग्रेस का यह कहना सही है कि उच्चतम न्यायालय ने नरेन्द्र मोदी और उनके साथियों को दोषमुक्त घोषित नहीं किया है| अब सारे मामले पर अहमदाबाद की निचली अदालत विचार करेगी| वह यह तय करेगी कि अभी तक जितनी जॉंच रपटें आई हैं, उनमें कुछ दम भी है या नहीं?

जाहिर है कि अहमदाबाद की अदालत यह फैसला भी कर सकती है कि 2002 में गुलबर्ग सोसायटी में जो हत्याकांड हुआ, उसकी सारी और आखिरी जिम्मेदारी मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके साथी मंत्रियों की है| यदि ऐसा होता है तो कांग्रेस की तो लॉटरी ही खुल जाएगी| इसी आशा में कांग्रेस यदि उच्चतम न्यायालय का फैसला सुनकर संज्ञाहीन नहीं हुई तो इसमें आश्चर्य क्या है?

लेकिन स्व. एहसन जाफरी की पत्नी और बेटे के बयानों को पढ़ें तो किसी भी कांग्रेसी का दिल बैठ जाएगा| उन्हें जबर्दस्त धक्का लगा है| वे जाफरी के मामले को अहमदाबाद से उठाकर दिल्ली आखिर क्यों लाए थे? इसीलिए न कि उन्हें न तो अहमदबाद की अदालत पर भरोसा था और न मोदी सरकार की जांच पर! उच्चतम न्यायालय ने अपनी देखरेख में विशेष जॉंच बिठा दी थी| अब अदालत ने सारी जॉंच बंद कर दी है| इतना ही नहीं, सारा मामला अहमदाबाद लौटा दिया है| और यह भी कह दिया है कि वह निचली अदालत जॉंच रपटों को देखने के बाद यदि मामले को बंद करना चाहे तो स्व. जाफरी की पत्नी जकिया जाफरी को एक बार अपनी बात कहने का मौका जरूर दे|

इसका अर्थ क्या हुआ ? क्या यह नहीं कि गुजराती अदालत पर अविश्वास करने का मामला चारों खाने चित हो गया? प्रकारांतर से मोदी-प्रशासन की निष्पक्षता पर खिंची तलवार चुपचाप फिर से म्यान में चली गई| उच्चतम न्यायालय ने निचली अदालत को यह स्पष्ट निर्देश भी दे दिया कि वह ठीक समझे तो इस मामले को बंद कर दे याने खारिज कर दे| इसके अलावा यह मामला निचली अदालत में अब कितना लंबा खिंचेगा, इसका भी किसी को पता नहीं| तब तक मोदी तीसरी बार मुख्यमंत्री बन जाएंगें और शायद ज्यादा वोटों से बन जाएं| इसीलिए भाजपा गदगद् है|

भाजपा इसलिए भी गदगद् है कि मोदी के विरूद्घ चले अभियान के कारण उसे बिहार, ओडि़सा और आंध्र जैसे राज्यों में पसोपेश का सामना करना पड़ा है| अब वह इस जलालत से मुक्त होने की पूर्ण संभावना देख रही है| यदि अहमदाबाद की अदालत मोदी को सर्वथा निर्दोष घोषित कर देगी तो वे अपने आप अगले प्रधानमंत्री पद के दावेदार बन जाएंगें| भाजपा के आंतरिक द्वंद्व का भी समाधान हो जाएगा| अखिल भारतीय राजनीति को भी नई दिशा मिलेगी|

उच्चतम न्यायालय के इस फैसले से भारत के राजनीतिक दलों को जो लाभ-हानि हो, असली बात दरकिनार नहीं होनी चाहिए| वह है, गुलबर्ग सोसायटी के हत्यारों को उचित सजा का मिलना| इस नृशंस हत्याकांड के दोषी अगर बच निकले तो यह भारत की न्याय और शासन-प्रणाली का कलंक होगा| यदि गुजरात के नरमेध का राजनीतिकरण नहीं किया गया होता तो अभी तक कुछ न कुछ हत्यारे जरूर पकड़े जाते| दलगत राजनीति की खींचातानी ही वह वजह है, जिसके चलते आज तक न तो कार-सेवकों के हत्यारे पकड़े गए और न ही बेकसूर मुसलमानों के| वे उसी तरह छुट्टे घूम रहे हैं, जैसे 1984 के सिखों के हत्यारे ! हमारे सेक्यूलरवादियों और मानव अधिकार-योद्घाओं ने इस न्याय-प्रकि्रया को इतना पेचीदा और संदिग्ध बना दिया है कि दोनों तरफ के सांप्रदायिक, अपराधी और मूढ़ तत्व निरापद हो गए हैं| राजनेता अपनी गोटियॉं चलते रहेंगे और गुजरात के असली हत्यारे निरंतर अपनी खैर मनाते रहेंगे|

 

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भाषा की प्रतिष्ठा पर ताकत का तर्क क्यों ?

Dainik Bhaskar, 14 Sept. 2011 :   संयुक्तराष्ट्र संघ में अगर अब भी हिंदी नहीं आएगी तो कब आएगी ? हिंदी का समय तो आ चुका है लेकिन अभी उसे एक हल्के-से धक्के की जरूरत है| भारत सरकार को कोई लंबा चौड़ा खर्च नहीं करना है, उसे किसी विश्व अदालत में हिंदी का मुकदमा नहीं लड़ना है, कोई प्रदर्शन और जुलूस आयोजित नहीं करने हैं| उसे केवल डेढ़ करोड़ डॉलर प्रतिवर्ष खर्च करने होंगे, संयुक्तराष्ट्र के आधे से अधिक सदस्यों (96) की सहमति लेनी होगी और उसकी काम-काज नियमावली की धारा 51 में संशोधन करवाकर हिंदी का नाम जुड़वाना होगा| इस मुद्दे पर देश के सभी राजनीतिक दल भी सहमत हैं| सूरिनाम में संपन्न हुए पिछले विश्व हिंदी सम्मेलन में मैंने इस प्रस्ताव पर जब हस्ताक्षर करवाए तो सभी दलों के सांसद मित्रों ने सहर्ष उपकृत कर दिया|

कौन भारतीय है, जो अपने राष्ट्र की भाषा को विश्व-मंच पर दमकते हुए देखना नहीं चाहेगा| जिन भारतीयों को अपने प्रांतों में हिंदी के बढ़ते हुए वर्चस्व पर कुछ आपित्त है, वे भी संयुक्तराष्ट्र में हिंदी लाने का विरोध नहीं करेंगे, क्योंकि वे जानते हैं कि विश्व मंच पर 22 भारतीय भाषाएँ भारत का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकतीं| वे यह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि विश्व-मंच पर भारत गूँगा बनकर बैठा रहे| उनका उत्कट राष्ट्रप्रेम उन्हें प्रेरित करेगा कि हिंदी विश्व-मंच पर भारत की पहचान बनकर उभरे| उन्हें भारत की बढ़ती हुई शक्ति और संपन्नता पर उतना ही गर्व है, जितना किसी भी हिंदीभाषी को है| वे जानते हैं कि जिस राष्ट्र के मुँह में अपनी जुबान नहीं, वह महाशक्ति कैसे बन सकता है? उसे सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता कैसे मिल सकती है? स्थायी सदस्यता तो बहुत बाद की बात है| पहले कम से कम सदस्यता के द्वार पर भारत दस्तक तो दे| संयुक्तराष्ट्र में हिंदी ही यह दस्तक है|

अगर हमने संयुक्तराष्ट्र में पहले हिंदी बिठा दी तो हमें सुरक्षा परिषद् में बैठना अधिक आसान हो जाएगा| 1945 में संयुक्तराष्ट्र की आधिकारिक भाषाएँ केवल चार थीं| अंग्रेजी, रूसी, फ्रांसीसी, और चीनी| सिर्फ ये चार ही क्यों? सिर्फ ये चार इसलिए कि ये चारों भाषाएँ पाँच विजेता महाशक्तियों की भाषा थीं| अमेरिका और बि्रटेन, दोनों की अंग्रेजी, रूस की रूसी, फ्रांस की फ्रांसीसी और चीन की चीनी! इन भाषाओं के मुकाबले इतालवी, जर्मन,जापानी आदि भाषाएँ किसी तरह कमतर नहीं थीं लेकिन वे विजित राष्ट्रों की भाषाएँ थी| याने जिस भाषा के हाथ में तलवार थी, ताकत थी, विजय-पताका थी, वही सिंहासन पर जा बैठी| क्या अब  65 साल बाद भी यही ताकत का तर्क चलेगा? जो ढाँचा द्वितीय महायुद्घ के बाद बना था, उसका लोकतंत्रीकरण होगा या नहीं? यदि होगा| तो संयुक्तराष्ट्र के सिंहासन पर विराजमान होने का सबसे पहला हक हिंदी का होगा| यदि 1945 में भारत आजाद होता तो उसकी भाषा हिंदी को संयुक्तराष्ट में अपने आप ही मान्यता मिल जाती|

1945 में जो चार भाषाएँ संयुक्तराष्ट्र की अधिकृत भाषाएँ बनीं, उनमें 1973 में दो भाषाएँ और जुडीं| हिस्पानी और अरबी! इन दोनों भाषाओं को बोलने वाले लगभग दो-दो दर्जन राष्ट्रों में से एक भी ऐसा नहीं था, जिसे महाशक्ति कह सकें या विकसित राष्ट्र मान लें| ये राष्ट्र आपस में मिलकर भी किसी महाशक्ति-मंडल की छवि प्रस्तुत नहीं करते| कई राष्ट्र एक ही भाषा जरूर बोलते हैं लेकिन वे गरीब हैं, पिछड़े हैं, छोटे हैं, पर-निर्भर हैं और अगर वे सशक्त और बड़े हैं तो आपस में झगड़ते हैं, संयुक्तराष्ट्र में एक-दूसरे के विरूद्घ मतदान करते हैं| दूसरे शब्दों में उनकी भाषाओं को संयुक्तराष्ट्र में शक्तिबल के कारण नहीं, संख्याबल के कारण मान्यता मिली|

हिंदी को तो पता नहीं, किन-किन बलों के कारण मान्यता मिलनी चाहिए| सबसे पहला कारण तो यह है कि हिंदी को मान्यता देकर संयुक्तराष्ट्र अपनी ही मान्यता का विस्तार करेगा| उसके लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया का यह शुभारम्भ माना जाएगा| 65 साल से विजेता और विजित के खाँचे में फँसी हुई संयुक्तराष्ट्र की छवि का परिष्कार होगा| दूसरा, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र्, दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश और दुनिया के चौथे सबसे मालदार देश की भाषा को मान्यता देकर संयुक्तराष्ट्र अपना गौरव खुद बढ़ाएगा| तीसरा, हिंदी को मान्यता देनेका अर्थ है – तीसरी दुनिया और गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों को सम्मान देना| भारत इन राष्ट्रों का नेतृत्व करता रहा है| चौथा, हिंदी विश्व की सबसे अधिक समझी और बोली जानेवाली भाषा है| संयुक्तराष्ट्र की पाँच भाषाओं से हिंदी की तुलना करना बेकार है| वह उनसे कहीं आगे है| हाँ, चीनी से तुलना हो सकती है| चीन की अधिकृत भाषा ‘मेंडारिन’ है| इस भाषा को बोलने-समझनेवालों की संख्या विभिन्न भाषाई-विश्वकोषों में लगभग 85 करोड़ बताई जाती है| उसे 100 करोड़ भी बताया जा सकता है| लेकिन असलियत क्या है? असलियत के बारे में बहुत-से मतभेद हैं| चीन में दर्जनों स्थानीय भाषाएँ हैं| उन्हें लोग दुभाषियों के बिना समझ ही नहीं पाते| मैं स्वयं 8-10 बार चीन घूम चुका हूँ| एक-एक माह वहाँ रहा हूँ| मुझे कई बार दो-दो तरह के दुभाषिए एक साथ रखने पड़ते थे| अगर यह मान लें कि दुनिया में चीनी भाषियों की संख्या एक अरब है तो भी इससे हिंदी पिछड़ नहीं जाती| आज हिंदीभाषियों की संख्या एक अरब से भी ज्यादा है| सिनेमा और टीवी चैनलों की कृपा से अब लगभग सारे भारत के लोग हिंदी समझ लेते हैं और जरूरत पड़ने पर बोल भी लेते हैं| अगर मान लें कि दक्षिण भारत के 10-15 करोड़ लोगों को हिंदी के व्यवहार में अब भी कठिनाई है तो उसकी भरपाई दक्षेस के अन्य सात राष्ट्रों में बसे लगभग 35 करोड़ लोग कर देते हैं| उनमें से ज्यादातर हिंदी समझते हैं| उनके अलावा विदेशों में बसे दो करोड़ से ज्यादा भारतीय भी हिंदी का प्रयोग सगर्व करते हैं| अत: संख्याबल के कोण से देखा जाए तो संयुक्तराष्ट्र में हिंदी  को प्रतिष्ठित करना दुनिया के लगभग डेढ़ अरब लोगों को प्रतिनिधित्व देना है|

पाँचवाँ, हिंदी जितने राष्ट्रों की बहुसंख्यक जनता द्वारा बोली-समझी जाती है, संयुक्तराष्ट्र की पहली चार भाषाएँ नहीं बोली-समझी जाती हैं| याद रहे बहुसंख्यक जतना द्वारा! यह ठीक है कि अंग्रेजी, फ्रांसीसी और रूसी ऐसी भाषाएँ हैं, जिन्हें बि्रटेन, फ्रांस और रूस के दर्जनों उपनिवेशों में बोला जाता रहा है| लेकिन ये भाषाएँ उन उपनिवेशों के दो-चार प्रतिशत से ज्यादा लोग आज भी नहीं बोलते जबकि हिंदी भारत ही नहीं, पाकिस्तान, नेपाल, मोरिशस, टि्रनिडाड,सूरिनाम,फीजी,गयाना,बांग्लादेश आदि देशों की बहुसंख्यक जनता द्वारा बोली और समझी जाती है| जब इस बहुराष्ट्रीय भाषा में संयुक्तराष्ट्र की गतिविधियाँ टी.वी. पर सुनाई देंगी तो कल्पना कीजिए कि कितने लोगों और कितने राष्ट्रों का संयुक्तराष्ट्र के प्रति जुड़ाव बढ़ता चला जाएगा|

छठा, यदि हिंदी संयुक्तराष्ट्र में प्रतिष्ठित होगी तो दुनिया की अन्य सैकड़ों भाषाओं के लिए शब्दों का नया खजाना खुल पड़ेगा| हिंदी संस्कृत की बेटी हैं| संस्कृत की एक-एक धातु से कई-कई हजार शब्द बनते हैं| एशियाई और अफ्रीकी ही नहीं, यूरोपीय और अमेरिकी भाषाओं में भी आजकल शब्दों का टोटा पड़ा रहता है| अन्तराष्ट्रीय विज्ञान और व्यापार के कारण रोज़ नए शब्दों की जरूरत पड़ती है| इस कमी को हिंदी पूरा करेगी| सातवाँ, इसके अलावा हिंदी के संयुक्तराष्ट्र में पहुँचते ही दुनिया की दर्जनों भाषाओं को लिबास मिलेगा| वे निवर्सन हैं| उनकी अपनी कोई लिपि नहीं है| तुर्की, इंडोनेशियाई, मंगोल, उज़बेक, स्वाहिली, गोरानी आदि अनेक भाषाएँ हैं, जो विदेशी लिपियों में लिखी जाती हैं| मजबूरी है| हिंदी इस मजबूरी को विश्व-स्तर पर दूर करेगी| वह रोमन,रूसी और चित्र्-लिपियों का शानदार विकल्प बनेगी| उसकी लिपि सरल और वैज्ञानिक है| जो बोलो सो लिखो और जो लिखो, सो बोलो| संयुक्तराष्ट्र में बैठी हिंदी विश्व के भाषाई मानचित्र् को बदल देगी|

यदि हिंदी संयुक्तराष्ट्र में दनदनाने लगी तो उसके चार ठोस परिणाम एक दम सामने आएँगे| पहला, भारतीय नौकरशाही और नेताशाही को मानसिक गुलामी से मुक्ति मिलेगी| भारत के राज-काज में हिंदी को उचित स्थान मिलेगा| दूसरा, भारतीय भाषाओं की जन्मजात एकता में वृद्घि होगी| तीसरा, दक्षेस राष्ट्रों में संगच्छध्वं संवदध्वं का भाव फैलेगा| जनता से जनता का जुड़ाव बढ़ेगा| तीसरा, वैश्वीकरण की प्रक्रिया में अंग्रेजी का सशक्त विकल्प तैयार होगा| चौथा, स्वभाषाओं के जरिए होनेवाले शिक्षण, प्रशिक्षण और अुनसंधान की गति तीव्र होगी| उसके कारण भारत दिन-दूनी रात चौगुनी उन्नति करेगा| सचमुच वह विश्व-शक्ति और विश्व-गुरू बनेगा|

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आतंक के दो मसीहाओं का द्वंन्द्व

10 सितंबर 2011 : 11 सितंबर एक तारीख है लेकिन यह दुनिया में वैसे ही प्रसिद्घ हो गई है, जैसे 25 दिसंबर या 1 जनवरी! 11 सितंबर का मतलब वह दिन है, जब न्यूयार्क के ट्रेड टॉवर और वाशिंगटन के पेन्टेगॉन-भवन पर हवाई हमला हुआ था| इस हमले को हुए दस साल हो गए| इन दस वर्षों में अमेरिका और दुनिया ने क्या खोया और क्या पाया, इसका लेखा-जोखा जरूरी है|

इस हमले ने यह सिद्घ किया कि राज्य-जैसी शक्तिशाली संस्था को भी दंडित किया जा सकता है| जिन लोगों ने अमेरिकी जहाजों का अपहरण किया था और उन्हें न्यूयार्क, वाशिंगटन और फिलाडेल्फिया में गिराया था, वे किसी दुश्मन-राष्ट्र के फौजी नहीं थे| वह कार्रवाई दो राष्ट्रों के बीच लड़े जा रहे युद्घ की कार्रवाई नहीं थी| वह कुछ व्यक्तियों द्वारा की गई कार्रवाई थी| ये व्यक्ति अल-कायदा नामक संगठन से जुड़े हुए थे|

राज्य के मुकाबले कुछ व्यक्तियों का संगठन| लेकिन इस संगठन की कार्रवाई इतनी भयानक थी कि वह दो राज्यों के युद्घ से भी अधिक गंभीर सिद्घ हुई| अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने आतंकवाद के विरूद्घ विश्व-युद्घ की घोषणा कर दी| इस युद्घ में अब तक चार-पांच खरब (टि्रलियन) डॉलर खर्च हो चुके हैं और छह हजार से ज्यादा अमेरिकी सैनिक मारे जा चुके हैं| आतंकवाद की लड़ाई में अमेरिका ने इतना पैसा बहा दिया है कि उतने पैसे में कई देश अपना सौ-दो सौ साल का पूरा खर्च चला सकते हैं| छह हजार अमेरिकी सैनिकों का मारा जाना भी बहुत बड़ी घटना है, क्योंकि अमेरिकी सैनिक भारतीय सैनिकों की तरह प्राय: जमीनी लड़ाई नहीं लड़ते हैं| उनकी लड़ाई हवाई होती हैं| वे जहाजों में बैठकर बम बरसाते हैं|

11 सितंबर से जन्मी इस लड़ाई ने अमेरिका को खोखला कर दिया है| उसे गहरे आर्थिक संकट में फंसा दिया है| हालांकि अमेरिका ने जबर्दस्त मुस्तैदी दिखाई| उसने अपने यहां दुबारा 11 सितंबर नहीं होने दिया और उसामा बिन लादेन को उसकी मांद में घुसकर मार दिया लेकिन इस तथ्य को कैसे नकारा जा सकता है कि अमेरिका आज भी जो सजा भुगत रहा है, उसका निमंत्र्ण उसने स्वयं दिया था| अल-क़ायदा के जन्मदाता उसामा बिन लादेन को सूडान और सउदी अरब से लाकर-अफगानिस्तान में किसने जमाया? बबरक कारमल और नजीबुल्लाह की सरकारों को गिराने के हिंसक प्रयत्नों को परवान किसने चढ़ाया? अमेरिका ने! पाक अफगान सीमांत के ‘इलाका-ए-शैर’  को अन्तरराष्ट्रीय आतंकवाद, अफीम की तस्करी और अराजक हिंसा का क्षेत्र् किसने बनाया? अमेरिका ने! सोविय संघ को पराजित करने की धुन में अमेरिका ने विश्व-आतंक के बीज बो दिए| काबुल में मुजाहिद्रदीन सरकार के गिरने के बाद उसने तालिबान से हाथ मिलाने में भी कोई संकोच नहीं किया| उसने तालिबान के पोषक और संरक्षक जनरल मुशरर्फ को दक्षिण एशिया में अपना सिपहसालार घोषित किया| उसने आतंकवाद से पीडि़त भारत को अपना भागीदार नहीं चुना| पाकिस्तान को चुना, उस पाकिस्तान को, जो विश्व-आतंकवाद का सबसे बड़ा अड्रडा था और जो लगातार अमेरिका से डॉलर निचोड़ता रहा और उसे धोखा देता रहा| इस दस वर्ष की अवधि की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि अब पाकिस्तान की पोल खुल गई है| लेकिन पता नहीं कि अब भी अमेरिका की आंख खुली है या नहीं?

अमेरिका की आंख बंद होने का अर्थ क्या है? उसका सीधा-सादा अर्थ यही है कि वह अपने आतंकवाद को पहचाने! अपनी आंखें खोले और यह जाने कि वह दुनिया को सबसे बड़ा और सबसे खतरनाक आतंकवादी है| जितने लोग 11 सितंबर 2001 को आतंकवादियों ने न्यूयार्क में मारे (3000), उनसे पता नहीं कितने गुना बेकसूर लोग अमेरिका ने अफगानिस्तान, एराक, लातीनी अमेरिका, अफ्रीका और वियतनाम में मार गिराए है| अमेरिकी फौज और सीआईए क्यूबा, निकारागुआ, हैती, पनामा, लेबनान आदि देशों में बाकायदा आतंकवादियों को प्रशिक्षित करके भेजते रहे हैं| अमेरिका के शासकीय और राजकीय आतंकवाद का इतिहास बहुत लंबा रहा है| ‘रेड इंडियंस’ पर यदि गोरे यूरोपीय आतंक नहीं जमाते तो संयुक्त राज्य अमेरिका की स्थापना कैसी होती?  इसी आंतरिक आतंक का विस्तार उसने सारे विश्व में किया है|

अपना वर्चस्व कायम करने के लिए उसने क्या-क्या दुष्कर्म नहीं किए? दुनिया के हर तानाशाह के साथ सांठ-गांठ की| मानव अधिकारों के उल्लंघन की अनदेखी की| तेल और अन्य खजिनों पर उसकी लार इतनी टपकती रही कि उसने लोकतांत्र्िक मूल्यों को भी धता बता दी| एराक और अफगानिस्तान में वह क्यों घुसा? आतंकवाद का खात्मा तो एक बहाना था| असली आकर्षण तेल और गैस का था| इसा्रइल को वह क्यों पले हुए है? ताकि पश्चिम के तेलोत्पादक राष्ट्र अपनी रक्षा के लिए उस पर निर्भर रहें| आतंकवादी लोग आंतक फैलाकर अपने लिए कुछ नहीं चाहते लेकिन अमेरिका अपने लिए सब कुछ चाहता हैं| इसलिए आतंक फैलाता है|

राजकीय आतंकवाद ओर साधारण आतंकवाद में यही फर्क है| राजकीय आतंकवाद अपनी क़ीमत वसूलन में कभी नहीं चूकता| वैसे दोनों का दर्शन, सिद्घांत और नीति लगभग एक-जैसी होती है| आप जरा-जरा जॉर्ज बुश और उसामा बिन लादेन की भाषा की तुलना करें| दोनों भगवान का नाम लेते हैं| एक ‘गॉड’ की ‘ओथ’ लेता है और दूसरी अल्लाह की कसम खाता है| अगर पहला कहता है कि दुनिया से अन्याय और अत्याचार खत्म करना मेरा धर्म है तो दूसरी भी इन्हीं शब्दों को दोहराता है| यदि पहला दूसरे को हिंसक और अनैतिक कहता है तो दूसरा भी पहले पर यही आरोप लगाता है| दोनों का अंदाज मसीहाई होता है| 11 सितंबर की खूबी यही थी कि कमजोर मसीहा बलवान मसीहा की छाती पर चढ़ बैठा| बुश और उसामा में फर्क क्या है? दोनों मौसेरे भाई हैं|

 

इस समय बलवान मसीहा-जीतता हुआ दिखाई पड़ रहा है-श्रीलंका में, फलस्तीन में, एराक में, अफगानिस्तान में भी लेकिन यह जीत आंख मिचौनी भी सिद्घ हो सकती है| जीत के घमंड में वह यह न भूल जाए कि अभी आतंक के सिर्फ फूल-पत्ते टूटे हैं| उसकी जड़े अभी भी हरी हैं| आतंक की शुरूआत पहले मसीहा ने ही की है| पहला आतंकवादी वही है| दूसरा मसीहा तो प्रतिकि्रयावादी है| वह जवाबी आतंकवादी है| यह ठीक है कि दूसरा मसीहा खाली-खट है| उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है| यही उसकी ताकत भी है| इस ताकत का मुकाबला वह मसीहा कैसे करेगा, जिसके पास खोने के लिए बहुत कुछ है| सब कुछ है| दस वर्ष के इस दौर की सीख यही है कि पहला मसीहा ताकत का दुरूपयोग बंद करे और छोटे आतंक को बढ़े आतंक से खत्म करने को अंतिम समाधान न माने! दूसरे मसीहा को रास्ते पर लाने के लिए एक दूसरा रास्ता भी खोजे|

 

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भारत-बांग्ला : अभी कुछ कदम और बाकी

नया इंडिया, 9 सितंबर 2011 : अंतरराष्ट्रीय राजनीति के इतिहास में भारत और बांग्लादेश के संबंध एकदम अनूठे रहे हैं| दुनिया में ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं जबकि कोई राष्ट्र अपने पड़ौस में एक नए राष्ट्र को जन्म दे दे और उस पर कोई अहसान नहीं जताए या उसके साथ दादागीरी न करे| बांग्लादेश के कई तत्वों ने समय-समय पर भारत को तरह-तरह से चोट पहुंचाने की कोशिश जरूर की, इसके बावजूद 40 साल में भारत की यही कोशिश रही कि बांग्लादेश के साथ उसके संबंध गहन मैत्रीपूर्ण बन जाएं|

इस दृष्टि से प्रधानमंत्र्ी डॉ. मनमोहन सिंह की ढाका-यात्र का महत्व एतिहासिक है| 1999 में प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ढाका गए थे| इस अंतराल में दिल्ली-ढाका संबंधों में कई छोटे-मोटे उतार-चढ़ाव आए| लेकिन इन दिनों ढाका में शेख हसीना वाजिद का प्रधानमंत्री होना भारत के लिए काफी अनुकूल रहा| 12 वर्ष बाद हुई प्रधानमंत्री की इस ढाका-यात्र के दौरान यदि तीस्ता और फेनी नदी के पानी का समझौता भी हो जाता तो दो पड़ौसियों का यह संबंध संपूर्ण दक्षिण एशिया के लिए अनुकरणीय आदर्श बन जाता| वह यूरोपीय समुदाय-जैसे किसी नए बहुराष्ट्रीय ढांचे की शुरूआत की नींव बन जाता| बांग्लादेश को पानी मिलता और भारत को रास्ते मिलते| भूटान, नेपाल, सिक्किम और असम पहुंचने के वे रास्ते खुल जाते जो 1965 और 1971 के युद्घों के समय से बंद पड़े हैं| ये वे रास्ते हैं, जो सदियों से खुले हुए थे| भारत के समय और पैसे की बचत होती और बांग्लादेश के लिए मोटी आमदनी का जुगाड़ भी बनता|

पं. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एन वक्त पर मुकर गई| उन्हें लगा कि तीस्ता का कुछ ज्यादा पानी बांग्लादेश को चला गया तो मार्क्सवादी पार्टी उन पर जबर्दस्त हमला कर देगी| उत्तरी बंगाल में उनका वोट बैंक दरक जाएगा| आखिरकार उन्हें चुनाव तो लड़ना ही है| माना यह भी जा रह है कि सिर्फ तीस्ता के पानी का ही सवाल नहीं है, बांग्लादेश के सामान को भारत में बेचने के लिए करमुक्त करने का फैसला भी उनके लिए खतरे की घंटी था| पं. बंगाल के कपड़ा उद्योग में खलबली मच गई थी| ममता की मजबूरियों को भारत सरकार ने भी समझ लिया और बांग्लादेश की सरकार ने भी! इसीलिए ज्यादा हल्ला नहीं मचा| लेकिन बांग्लादेश के विपक्षी दलों ने इस घटना-चक्र से लाभ उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ी| उन्होंने भारत की दादागीरी और खुदगर्जी का स्थायी राग जमकर अलापा| वे भूल गए कि भारत-विरोधी माने जानेवाली खालिदा जिया के जमाने में प्रधानमंत्री हरदनहल्ली देवगौडा ने फरक्का-समझौता किया था| उस समय सारा ढाका देवगौड़ामय हो गया था| तीस्ता और फेनी नदी के पानी का सवाल तो फरक्का से कम उलझनभरा है| आशा है कि इस मुद्रदे पर भी शीघ्र ही बांग्ला-भावुकता के दुबारा दर्शन होंगे|

उक्त समझौता संपन्न न हो सका, इसके बावजूद प्रधानमंत्री की ढाका-यात्रi काफी सफल रही| 1974 से अधर में लटका हुआ सीमांकन का समझौता अब परवान चढ़ा| इंदिरा गांधी और शेख मुजीब ने दोनों देशों के बीच 4096 कि.मी. की सीमा पर सहमति करके नक्शों का आदान-प्रदान कर लिया था लेकिन 6.5 किमी में फैले एक-दूसरे के प्रकोष्ठों पर सहमति नहीं हो पाई थी| बांग्लादेश में भारत के 111 प्रकोष्ठ हैं, जिनमें डेढ़ लाख लोग रहते हैं और वे 17158 एकड़ में बंटे हुए हैं| जबकि भारत की सीमा में बांग्लादेश के 51 प्रकोष्ठ हैं, जिनमें 50 हजार लोग रहते हैं और वे 7110 एकड़ में बंटे हुए हैं| इसी प्रकार भारतीय ज़मीन के 38 टुकड़े बांग्लादेश के 3000 एकड़ में फैले हुए है और बांग्लादेश के 50 टुकड़े भारत के 3345 एकड़ में फैले हुए हैं| इस भौगोलिक और राजनीतिक विचित्र्ता की जड़ें 18वीं सदी में उगी थीं| कूच बिहार और रंगपुर के राजाओं ने एक-दूसरे के क्षेत्रें में जो घुसपैंठ की थी, वह अभी तक चली आ रही थी| इसके कारण दोनों देशों में कई बार भारी तनाव पैदा होता रहा है| अब दोनों देशों ने पहली बार इन प्रकोष्ठों की अदला-बदली का स्पष्ट समझौता कर लिया है| इसके कारण दो लाख भारतीय और बांग्लादेशी नागरिकों को काफी राहत मिलेगी| पहले उन्हें अपने प्रकोष्ठ से बाहर निकलने के लिए भी विदेशयात्र जैसी तैयारी करनी पड़ती थी| अब वे अपना सहज जीवन जी सकेंगे| 2001 में हमारे 15 गार्डों की हत्या कर दी गई थी और उनके शवों को पशुओं की तरह बांसों पर टांगकर घुमाया गया था| आशा है, इस तरह की उत्तेजक घटनाएं अब नहीं दोहराई जाएंगी|

बांग्लादेश को शिकायत थी कि भारत के साथ उसके व्यापार में भारी असंतुलन हैं| यदि बांग्लादेश को भारत एक रू0 का माल बेचता है तो भारत उसे नौ रू0 का माल बेचता है| 900 प्रतिशत का यह असंतुलन किसी भी देश के लिए काफी चिंता का विषय हो सकता है| बांग्लादेश कई वर्षों से आग्रह कर रहा है कि भारत उसके माल को कर मुक्त करे ताकि भारत के बाजारों में वह ‘सस्ता और बढि़या’ होकर बिके| बांग्लादेश का कपड़ा सारी दुनिया में बहुत लोकपि्रय है लेकिन भारत में वह इसीलिए कम बिकता है कि उस पर कर ज्यादा लगता है| बांग्लादेश के कुल निर्यात में कपड़े का हिस्सा 75 प्रतिशत से भी ज्यादा है| अब भारत ने उसकी 61 चीजों को कर मुक्त कर दिया है, जिनमें से 46 कपड़ों से संबंधित हैं| इस कदम का बांग्लादेश में तो भरपूर स्वागत हुआ हैं लेकिन भारत के वस्त्र् उद्योग में थोड़ी बेचैनी जरूरी फैलेगी| आशा है कि बांग्लादेश के 50 करोड़ डॉलर के निर्यात और भारत के साढ़े चार सौ करोड़ के निर्यात में अब कुछ संतुलन बनेगा|

यद्यपि दोनों देशें ने अपनी संयुक्त विज्ञप्ति में आतंकवाद से लड़ने के अपने संकल्प को देाहराया हैं लेकिन दोनों के बीच इस बार प्रत्यर्पण-संधि संपन्न नहीं हो सकी है| कुछ अन्य समझौते जरूर हुए हैं, जिनसे सांस्कृतिक और शैक्षणिक सहयोग बढ़ेगा| इसमें शक नहीं कि प्रधानमंत्र्ी की इस ढाका-यात्र ने भारत-बांग्ला संबंधों को नए धरातल पर पहुंचाया है लेकिन हम यह न भूलें कि बांग्लादेश में भारत-विरोधी तत्वों का अब भी काफी प्रभाव है| वे भारत पर वार करने में कभी नहीं चूकेंगे| ये तत्व पाकिस्तान से प्रेरणा लेते हैं| नौकरशाही और प्रतिपक्ष में डटे हुए इन तत्वों की हरचंद कोशिश यही होती है कि बांग्लादेश पाकिस्तान और चीन की तरफ ज्यादा झुकता चला जाए| भारत ने बांग्लादेश को लगभग साढ़े चार हजार करोड़ रू. की सहायता दी हैं लेकिन इसके बावजूद जब भी म्यांमार से गैस लाने के लिए पाइपलाइन बिछाने की बात होती है या बांग्लादेश के रास्तों को इस्तेमाल करने की बात होती हैं, ढाका की सरकारें आनाकानी करने लगती है| आशा है कि शेख हसीना के इसी कार्यकाल में सिर्फ तीस्ता और फेनी ही नहीं शेष 51 नदियों के पानी के भी मसलों को हल कर लिया जाएगा ताकि जैसे बांग्लादेशियों के लिए व्यावहारिक तौर पर भारत की सीमाएं खुली ही हुई हैं, वैसे ही भारतीयों केलिए भी बांग्ला-सीमाएं खुल जाएं| बांग्लादेश के लाखों लोग जैसे पासपोर्ट और वीज़ा के बिना भारत में मुक्त विहार करते है, क्या किसी दिन यही स्थिति दक्षिण एशिया के सभी देशों के बीच हमें देखने को मिलेगी? इस विशाल भारतीय परिवार के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए शायद भारत और बांग्लादेश ही ऐसे दो राष्ट्र है जिन्हें कुछ कदम और आगे बढ़ाने होंगे|

 

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खूनी हमले और बेबस सरकार

दिल्ली उच्च न्यायालय के पास हुए विस्फोट ने एक बार फिर भारत की दुखती रग पर उंगली रख दी है| संसद या उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय कोई साधारण बाजार या भीड़भरे रेल्वे स्टेशन नहीं हैं| ये भारतीय राष्ट्र-राज्य के स्नायु-केंद्र हैं| अगर इन स्थानों की रक्षा करने में भी हम असमर्थ हैं तो भारत मे राज्य और सरकार के होने का ही क्या अर्थ रह जाता है ?

लाखों पुलिसवालों और फौजियों का आखिर उपयोग क्या है? इन संगठनों पर रोज़ खर्च होनेवाले करोड़ों रूपयों का औचित्य यह सरकार कैसे सिद्घ करेगी ? सरकार का गुप्तचर विभाग अक्सर सोते हुए क्यों पकड़ा जाता है ? क्या हम अमेरिका और इस्राइल-जैसे राष्ट्रों से कोई सबक लेंगे? दस साल होने को आए अमेरिका में आतंकवाद की कोई दुर्घटना दुबारा नहीं घटी| आतंकवादियों ने कोई कसर नहीं उठा रखी थी लेकिन वे पहले ही पकड़े गए| पिछले दस वर्षों में अमेरिका पर कोई परिंदा भी पर नहीं मार सका| अमेरिका कोई छोटा-मोटा देश नहीं है| आकार में वह भारत से तीन गुणा बड़ा है और उसकी जनसंख्या 30 करोड़ से भी ज्यादा है| ऐसा भी नहीं है कि अमेरिका के सभी लोग यूरोपीय मूल के गोरे लोग हैं| वहां अफ्रीकी, एशियाई और लातीनी मूल के भी करोड़ों लोग रहते हैं| उन देशों के भी लाखों लोग वहां रहते हैं, जो आतंकवाद के जनक और पोषक हैं| इसके बावजूद अमेरिका ने अपने यहां से आतंकवाद को लगभग उखाड़ फेंका है|

क्या वजह है कि अपने आप को क्षेत्रीय महाशक्ति कहनेवाले भारत को दो-दो कौड़ी के आतंकवादियों के सामने आए दिन घुटने टेकने पड़ते हैं ? इसका मूल कारण तो यह है कि हमारी सरकारें सबसे पहले अपनी सुरक्षा पर ध्यान देती हैं| आम जनता उनकी प्राथमिकता नहीं है| दिल्ली-जैसी राजधानियों में पुलिस और गुप्तचर विभाग का मुख्य काम ‘अति महत्वपूर्ण लोगों’ की रक्षा ही है| आम आदमी जिए या मरे, इसकी उन्हें कोई चिंता नहीं है| कुछ भी हो जाए, आम आदमी उनका क्या बिगाड़ लेगा? सरकार को तो कोई छू भी नहीं सकता| मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे हुए लोग इस्तीफा तक नहीं देते| उन्हें सजा मिलना तो बहुत दूर की बात है| उन्हें सजा कौन दिलवा सकता है? कानून में वैसा कोई प्रावधान नहीं है और विपक्ष की कुर्सियों पर लदे नेतागण उनके मौसरे भाई हैं| जब वे सत्ता में होते हैं तो उनका बर्ताव भी वैसा ही होता है| किसी भी हत्याकांड के बाद निंदा-अभियान चलाकर विपक्ष भी छुट्टी पा लेता है| परनाला फिर वहीं बहने लगता है| अस्पताल पहुंचनेवाले नेताओं को आम जनता ने जिस बुरी तरह धिक्कारा है, उससे क्या वे कोई सबक लेंगे?

दिल्ली उच्च न्यायालय में यह पहला विस्फोट नहीं हुआ है| मई में भी हो चुका है| इसके पहले भी पुणे, मुंबई, दिल्ली आदि कई स्थानों पर खून की होलियाँ खेली गई हैं| लेकिन हमारा गुप्तचर-विभाग अभी तक एक भी सुराग नहीं खोज सका है| क्यों ? क्योंकि उसकी अपनी और उसके ‘स्वामियों’ की नौकरियॉं सुरक्षित हैं| यदि हर विस्फोट के बाद कुछ नौकरियॉं भी उड़ जाएं तो शायद विस्फोटों की साजिशों पर से कुछ पर्दा उठने लगे| अपराध की तह तक पहुंचना और अपराधियों को पकड़ना तो बहुत दूर की कौड़ी है, अपराधों की रोक-थाम के लिए जो न्यूनतम प्रबंध किया जाना चाहिए, उस पर भी कोई ध्यान नहीं देता| दिल्ली उच्चतम न्यायालय के परिसर में न तो ‘मेटल डिटेक्टर’ काम कर रहा था ओर न ही ‘सीसीटीवी’! महा-तकनीक के इस युग में अंतरिक्ष में बैठकर किसी बुढि़या के बालों को भी गिना जा सकता है लेकिन चार किलो के बमवाले सूटकेस को पकड़ना भी हमारी सरकार के लिए आसान नहीं है| गृहमंत्री कहते हैं कि उन्हें जुलाई में इस घटना का संकेत मिल गया था तो पिछले 40-50 दिन हमारे गुप्तचर और पुलिसवाले क्या कर रहे थे ? यदि इस लापरवाही के कारण 15-20 लोगों के प्राणों की बलि चढ़ सकती है तो क्या 10-15 अफसरों और स्वयं गृहमंत्री को भारमुक्त नहीं किया जा सकता? अफजल गुरू और कसाब को दामाद की तरह छाती पर बिठाकर रखनेवाली इस सरकार का अब जनता में इकबाल क्या रह गया है? क्या आतंकवाद से लड़ने का कोई सच्चा संकल्प कहीं दिखाई पड़ता है?

यदि हमारा राष्ट्र-राज्य उक्त संकल्प का धनी हो तो वह आतंकवाद पर भी काबू पा सकता है| जो खुद से सख्ती करेगा, वह दूसरों से क्यों नहीं करेगा? आतंकवादियों को अगर यह अंदेशा हो जाए कि भारत सरकार उन्हें किसी भी हालत में बख्शेगी नहीं और हर उस आदमी का पीछा करेगी, जिसने उनकी ज़रा भी मदद की होगी तो वे आतंकी हरकत करने के पहले हजार बार सोचेंगे| अगर उन्हें यह भी पता चल जाए कि वे ही नहीं पिसेगे  बल्कि गेहूं के साथ घुन भी पिसेगी तो उनके होश फाख्ता हो जाएंगें| अगर हमारे जहाज को कंधार ले जानेवालों को यह पता होता कि भारतीय फौजें कंधार का हवाई अड्डा उड़ा सकती हैं तो वे क्या उस जहाज का अपहरण करने की हिमाकत करते| अगर कसाब को यह पता होता कि ताज होटल पर उसने हमला किया तो उसके किसी आका का नामो-निशान भी नहीं बचेगा तो क्या वह मुंबई आने की जुर्रत करता? जो ओसामा बिन लादेन की गति हुई, वही उनकी भी होगी तो क्या मुंबई आने के पहले उसकी हडि्रडयों में कंपकंपी नहीं चढ़ जाती ? ये वे सबक हैं, जो अमेरिका और इस्राइल ने अपने संभावित आतंकवादियों को सिखाए हैं| अमेरिका और इस्राइल की विदेश नीतियॉं कितनी ही आक्रामक और निदंनीय हों, उन्होंने आतंकवादियों के हौंसले पस्त करके दिखाए हैं|

इन देशों की जनता ने भी अद्भुत मुस्तैदी दिखाई है| अपने राष्ट्र की सुरक्षा की खातिर इन देशों के लोगों ने हर असुविधा और हर परेशानी को सहर्ष बर्दाश्त किया| क्या हम लोग, जो आतंकवादी करतूतों के शिकार नहीं हुए, अपने मृत और घायल भाई-बहनों के लिए इतनी कुर्बानी करने को तैयार हैं ?

 

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बुरे फंसे गुजरात में

Dainik Bhaskar, 07 Sept. 2011 : इधर रामलीला मैदान में अन्ना हजारे का अनशन अंतिम दौर में था, उधर कांग्रेस पार्टी ने गुजरात में नहले पर दहला मारने की कोशिश की। उसने वहां नए लोकायुक्त की नियुक्ति करवा दी।

अन्ना हजारे को उसने संदेश दिया कि तुम तो सिर्फ बात करते हो, लोकपाल और लोकायुक्त की! लो, हमने तो लोकायुक्त नियुक्तकरके दिखा दिया। एक वार से दो शिकार! भाजपा को भी मजा चखाया। भाजपा के लौहपुरुष नरेंद्र मोदी को हमने शिकंजे में कस दिया। अब देखना कि गुजरात भी कर्नाटक बनता है या नहीं!

गुजरात को कर्नाटक बनाने का यह नाटक अब उल्टे कांग्रेस के गले पड़ गया है। संसद का कामकाज तो ठप्प हो ही गया है, कांग्रेस के अंदर भी बहस छिड़ गई है। कांग्रेसी नेता एक-दूसरे से पूछ रहे हैं कि बर्र के छत्ते में हाथ डालने का यह निर्णय आखिर किसने लिया है।

कांग्रेस में कोई राजनीतिक बुद्धि बची भी है या नहीं? सोनियाजी अपना इलाज कराने विदेश क्या गईं, पूरी कांग्रेस की ही सेहत चिंतनीय हो गई है। अन्ना और रामदेव पर हाथ डालकर कांग्रेस पहले ही इतनी कमजोर हो गई है कि इस नाजुक दशा में उसे यह नया सिरदर्द मोल लेने की जरूरत क्या थी? यदि राज्यपाल कमला बेनीवाल की इस कार्रवाई को तकनीकी तौर पर सही मान लिया जाए तो भी उसके लिए क्या यही सही मौका था? यह मौका तो और भी बुरा सिद्ध हो रहा है।

कमला बेनीवाल की इस कार्रवाई को टीम अन्ना और बाबा रामदेव के विरुद्ध की जा रही बदले की कार्रवाइयों से जोड़कर देखा जा रहा है। जैसे कांग्रेस अन्ना और रामदेव का मुकाबला राजनीतिक ढंग से नहीं कर पाई, वैसे ही वह अब तक नरेंद्र मोदी को किसी भी जाल में नहीं फंसा पाई।

यदि गुजरात में लोकायुक्तकी नियुक्ति इन आंदोलनों के पहले या बाद में होती तो आम लोग सारे मुद्दे पर शायद जरा तटस्थतापूर्वक विचार करते। लेकिन अब जस्टिस आरए महेता को लोकायुक्त बनाने के विरोध में तो सभी विपक्षी दल एकजुट हो गए हैं, राज्यपाल की वापसी की मांग भी जोर पकड़ने लगी है।

राज्यपाल का पद पहले ही काफी विवादास्पद हो चुका है। लोकायुक्त के इस विवाद ने राज्यपाल के पद की गरिमा पर नए प्रश्नचिह्न् लगा दिए हैं। अन्ना के आंदोलन के दौरान इस मुद्दे पर जमकर बहस चली है कि लोकपाल या लोकायुक्तकी नियुक्ति कैसे होनी चाहिए? उसके नियोक्ता कौन-कौन होने चाहिए।

यह मामला इतना गंभीर और पेचीदा है कि इस पर टीम अन्ना और मंत्री टीम दोनों ने अपनी-अपनी राय में कई फेरबदल किए हैं। सबकी मंशा यही है कि जो भी लोकपाल या लोकायुक्त नियुक्त हो, वह प्रामाणिक, निष्पक्ष, निर्भय और सर्वस्वीकार्य व्यक्तिहो। कमला बेनीवाल के निर्णय ने क्या इन मापदंडों का ध्यान रखा है?

दूसरे शब्दों में, उन्होंने अपने इस अकस्मात निर्णय से उस लोक-लहर की अनदेखी कर दी, जिसने इस सरकार की हड्डियों में कंपकंपी दौड़ा दी थी। कमलाजी कोई भूतपूर्व सरकारी अफसर या सेवानिवृत्त फौजी अफसर नहीं हैं। उनका राजनीतिक जीवन काफी लंबा रहा है।

यदि वे जनभावना को नहीं समझ सकतीं तो फिर कौन समझ सकता है? लेकिन अक्सर राज्यपालों को केंद्र के इशारों पर ही काम करना होता है। केंद्र ने पहले रामदेव और अन्ना के मामलों मंे अपने कुछ उदीयमान नेताओं की बलि चढ़ा दी और अब उसने राज्यपाल पद की इज्जत भी दांव पर लगा दी है।

गुजरात के लोकायुक्तकानून की मूल धारा को पढ़ें तो उसमें यही लिखा है कि राज्यपाल को चाहिए कि लोकायुक्त की नियुक्तिकरने के पहले वह राज्य के मुख्य न्यायाधीश से सलाह ले। गुजरात मंे लोकायुक्त का पद आठ साल से खाली पड़ा था।

राज्यपाल कमलाजी ने मुख्य न्यायाधीश से सलाह की और पटाक से आरए महेता की नियुक्ति कर दी। उनके हिसाब से उन्होंने कानून का पेट भर दिया, लेकिन क्या कोई भी राज्यपाल या राष्ट्रपति अपने मंत्रिमंडल की सलाह के बिना ऐसी नियुक्ति कर सकता है? बिल्कुल नहीं कर सकता।

यह भारतीय संविधान और भारतीय संसदीय परंपरा का सरासर उल्लंघन है। यह इसी से सिद्ध होता है कि इसी गुजरात में स्वयं कमलाजी इसी मुख्यमंत्री से लोकायुक्त के बारे में कई बार नामांकन मांग चुकी हैं। गुजरात के लोकायुक्तकानून में प्रतिपक्ष के नेता से भी परामर्श करने का प्रावधान है।

क्या यह संभव है कि किसी राज्य का राज्यपाल किसी बड़ी नियुक्ति के लिए प्रतिपक्ष के नेता से तो सलाह ले, लेकिन सत्ता पक्ष के नेता की उपेक्षा कर दे? सत्ता पक्ष की सहमति के बिना राज्यपाल पत्ता भी नहीं हिला सकता, यह सर्वमान्य तथ्य है, लेकिन कमला बेनीवाल ने राज्यपालों की अब तक की सारी परंपराओं को तोड़कर अपने नाम से वारंट जारी करके लोकायुक्त की नियुक्ति कर दी। जाहिर है कि ऐसा दुस्साहस केंद्र सरकार के इशारे के बिना नहीं हो सकता।

यह ठीक है कि राज्य का इतना महत्वपूर्ण पद सात-आठ साल से खाली पड़ा हो तो राज्यपाल को कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा, लेकिन जिस तरह से गुजरात में यह नियुक्ति हुई है, उसके कारण पहले ग्रास में ही मक्खी पड़ गई। जस्टिस महेता मोदी सरकार के विरोधी के तौर पर पहले से ही जाने जाते हैं।

अब तो उनकी खुली आलोचना हो रही है। इस लोकायुक्त ने यदि कोई सही जांच की और सही निर्णय किया तो भी लोग उस पर भरोसा नहीं करेंगे। न महेता हेगड़े बन पाएंगे और न ही मोदी येदियुरप्पा! कांग्रेस का लक्ष्यभंग तो अभी से हो चुका।

यह अच्छा हुआ कि कर्नाटक में राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच जैसी थुक्का-फजीती हुई थी, वैसी गुजरात में नहीं हो रही है। नरेंद्र मोदी ने शिक्षक दिवस पर उपस्थित राज्यपाल महोदया को ‘मातृतुल्य’ कहकर और अदालत के केस में से भी उनका नाम हटाकर विशेष गरिमा का परिचय दिया है।

इसी तरह का गरिमामय संकेत केंद्र और राज्यपाल की तरफ से भी आना चाहिए, ताकि इस गरिमाहीन विवाद का पटापेक्ष हो। इस तरह के शुद्ध राजनीतिक मामलों का निपटारा भी यदि अदालतें करती रहीं तो हमारे राजनेताओं की बची-खुची साख को भी बट्टा लगे बिना नहीं रहेगा।

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विशेषाधिकार: फिजूल की अकड़

ओम पुरी और किरन बेदी के प्रहारों से कुछ सांसदों का आहत होना स्वाभाविक है। यदि वे बिल्कुल भी आहत नहीं होते तो क्या होता ? उनकी जितनी इज्जत बची हुई है, वह भी पैंदे में बैठ जाती। अन्ना के आंदोलन ने हमारे सभी दलों के नेताओं को इतना अप्रासंगिक बना दिया था कि वे पहले से जले-भुने बैठे हुए थे। ऊपर से रामलीला मैदान के मंच से वक्ताओं ने उनके जख्मों पर नमक छिड़कने में कोई कसर उठा नहीं रखी थी। प्रशांत भूषण, ओमपुरी और किरन बेदी के व्यंग्य बाण तो हमारे जागरूक सांसदों को दिखाई पड़ गए लेकिन उनके पहले भी वक्ताओं ने उन पर जो तेजाब उंडेला था, वह उनकी आंखों से ओझल हो गया है। यदि कोई खोजी अध्येता सारे बाणों और तेजाबों को इकट्ठा कर ले तो उससे ऐसा विषैला घोल बन जाएगा कि सांसदों का शर्म के मारे मरने का जी करेगा।

इस शर्म से बचने के लिए कुछ सांसद विशेषाधिकार प्रस्ताव ला रहे हैं। वे गड़े-मुर्दे उखाड़ना चाहते हैं। जाहिर है कि लोकसभा और राज्यसभा के अध्यक्ष और सभापति इन प्रस्तावों को स्वीकार करने के पहले सौ बार सोचेंगे। यदि ये प्रस्ताव सदन के पटल पर रखे गए तो क्या होगा ? जो आक्रामक जुमले जनसभा में बोले गए वे सदन की संवेदना को दुबारा आहत करेंगे। वे दोनों पक्षों द्वारा दोहराए जाएंगे। अभी तक वे अखबार के हिस्से हैं। अब वे संसदीय कार्यवाही के हिस्से बन जाएंगे। करोड़ों लोग उन्हें दुबारा सुनेंगे और पढ़ेंगे। अलग-अलग लोगों द्वारा अलग-अलग वक्तों पर बोले गए तेजाबी वाक्य जब एक साथ सदन में पेश किए जाएंगे तो क्या होगा ? सदन की गरिमा कहां तक बच पाएगी ? खंडन-मंडन, निंदा-स्तुति और आरोप-प्रत्यारोप का नया बवंडर उठ खड़ा होगा। रामलीला की जगह सारा देश अब रावण-लीला देखेगा। सांसदों की गरिमा गिरेगी। जनता तालियॉं बजाएगी।

यों भी रामदेव और अन्ना हजारे के मामलों में हमारे कुछ माननीय सांसदों ने जिन शब्दों का प्रयोग किया है, क्या उनसे उनकी गरिमा बढ़ी है ? क्या वे ‘माननीय’ कहलाने लायक रह गए हैं ? उन्होंने अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को गहरी ठेस पहुंचाई है। आम जनता ने ही नहीं, उनकी पार्टी ने भी उनके मुंह पर ताला ठोक दिया है। यह तो ठीक ही हुआ लेकिन संसद ने क्या कभी यह सोचा कि रामदेव और अन्ना जैसे श्रेष्ठ पुरूषों को ‘ठग’ और ‘ऊपर से नीचे तक भ्रष्ट’ कहनेवाले सांसदों को क्या सजा दी जाए ? यदि ‘गंवार और अनपढ़’ शब्दों का प्रयोग करने के लिए 15 दिन की सजा हो सकती है तो ‘ठग और भ्रष्ट’ शब्दों का इस्तेमाल करने के लिए कितने साल की सजा होनी चाहिए ? यह कैसा लोकतंत्र है कि सांसद कत्ल भी कर दें तो उसकी चर्चा न हो और जनता आह भी भर ले तो बदनाम हो जाए ? क्या विशेषाधिकार सिर्फ सांसदों का होता है ? क्या जनता का कोई विशेषाधिकार नहीं है ? विशेषाधिकार का दावा तो उन्हें करना चाहिए, जिनके आचरण में कुछ विशेषता हो, बात-बात पे ‘दुर्वासा मुद्रा’ धारण करना कहॉं तक उचित है ?

यह लोकतंत्र की शीर्षासन मुद्रा है। इस देश का मालिक कौन है ? कौन किसको नियुक्त करता है ? जनता संसद को नियुक्त करती है या संसद जनता को नियुक्त करती है ? नौकरानी के विशेषाधिकार अपनी जगह हैं लेकिन महारानी के विशेषाधिकार की भी तो कोई चर्चा करे ? यह हमारे लोकतंत्र का दुर्भाग्य है कि चुने जाने के बाद नौकर मालिक बन बैठता है। हमारे नेताओं की अकड़ देखने लायक होती है। जिन्हें सदा विनम्र, आभारी और कर्तव्यशील होना चाहिए वे अहिंसक और दुखी  लोगों पर लाठी-गोली बरसाते हैं, अरबों-खरबों के घोटाले करते हैं और उन पर कोई मालिक उंगली उठाए तो कहते हैं कि हम उसके हाथ तोड़ देंगे। संसद की गरिमा गिराने के लिए साधारणजन की जरूरत नहीं है, उसके लिए तो हमारे माननीय सांसदों की करतूतें ही काफी हैं।

संसद के सदनों में अक्सर क्या होता है ? ऐसे कितने दिन होते हैं, जब मीरा कुमार और हामिद अंसारी जैसे सज्जनों को अपना माथा नहीं ठोकना पड़ता है ? चीखते- चिल्लाते सांसदों को चुप कराते-कराते उनका गला सूख जाता है। कितने ही फूहड़, अश्लील, अशिष्ट और विषैले वाक्यों को उन्हें आए दिन संसद के रेकार्ड से बाहर करना पड़ता है। सांसदों को मार्शलों द्वारा उठवाकर बाहर फिंकवाना पड़ता है। ऐसे सांसदों को अपूर्व आंदोलन की उत्तेजना में कहे गए कुछ शब्दों को पकड़कर क्यों बैठ जाना चाहिए ? वे भी उन्हें अपनी स्मृति से बाहर (विलोपन) क्यों नहीं कर देते ? कठोर शब्दों का प्रयोग करलेवालों ने खेद व्यक्त कर दिया है। कृपया उनकी भावना को समझने का कष्ट कीजिए।

यदि सचमुच अन्ना आंदोलन के वक्ताओं के विरूद्ध विशेषाधिकार प्रस्ताव लाया गया तो यह मामला काफी दूर तलक चला जा सकता है। संसद की जिस सर्वोच्चता का राग हमारे कुछ उत्साही सांसद अक्सर अलापते रहते हैं, वे गहरी निराशा को प्राप्त होंगे। क्या वे नहीं  जानते कि भारतीय संसद, ब्रिटिश संसद की कार्बन-कॉपी नहीं है ? यह ठीक है कि हमने संसदीय ढांचा ब्रिटेन से उधार लिया है लेकिन उसमें हमारे संविधान निर्माताओं ने अमेरिकी संविधान का छोंक लगा रखा है। ‘नियंत्रण और संतुलन’ का सिद्धांत संसद पर अंकुश लगाता है। संसद संविधान के मूलभूत ढांचे को नहीं बदल सकती और उच्चतम न्यायालय संसद के कानून को भी ‘असंवैधानिक’ घोषित कर सकता है। इसके अलावा यह कौन नहीं जानता कि ब्रिटेन और भारत-जैसे देशों में संसद तो सरकार की कठपुतली बनी रहती है। बहुसंख्यक दल का नेता याने प्रधानमंत्री उसे मनचाहा नाच नचाता रहता है। ऐसी संसद अगर यह दावा करती है कि वह जनता से भी ऊपर है तो यह दावा हास्यास्पद ही है। रामदेव और अन्ना के आंदोलन की पृष्ठभूमि में इस तरह के दावे करना जनक्रोश को भड़काना है। जन-आंदोलनों से खिसियाकर अकड़ दिखाना बिल्कुल भी उचित नहीं है। जब जनता अगड़ाई लेती है तो शक्तिशाली सम्राटों की सत्ता भी सूखे पत्तों की तरह उड़ने लगती है। यह तो सिर्फ संसद है, वह भी हमारी चुनी हुई। हमेशा के लिए भी नहीं। सिर्फ पांच साल के लिए। उसके भी दो-ढाई साल बीत चुके हैं। क्या वर्तमान सांसद ढाई साल बाद अपने नहीं लौटने का पुख्ता इंतजाम करने में जुटे हुए हैं ?

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लीबिया की बगावत के मायने

Dainik Bhaskar, 24 Aug 2011 : लीबिया के तानाशाह कर्नल मुअम्मर गद्दाफी अभी तक पकड़े नहीं गए हैं और उनके भागने की भी पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन पश्चिमी राष्ट्रों के नेताओं ने अपनी पीठ खुद ठोकनी शुरू कर दी है। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने तो गद्दाफी के पतन की घोषणा कर दी है और ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने बताया है कि लीबिया की राजधानी त्रिपोली पर बागियों का अधिकार हो चुका है और गद्दाफी कभी भी पकड़े जा सकते हैं।

गद्दाफी की सरकार के उलटने की संभावनाएं इतनी बार व्यक्त हो चुकी हैं कि जब तक पुख्ता सबूत सामने नहीं आएं, लोगों को इन घोषणाओं पर भरोसा नहीं होता। यों तो गद्दाफी पिछले दो-ढाई माह से कहीं दिखाई नहीं पड़े, यानी वे भूमिगत होकर अपनी सेनाओं को लड़वा रहे हैं, लेकिन बागी सेनाओं ने अब त्रिपोली पर ही कब्जा नहीं कर लिया है, बल्कि वह उनके महलों में भी घुस गई है। उनका बेशकीमती सामान लोग लूट ले गए हैं।

उनके तीनों पुत्रों के मारे जाने या गिरफ्तार होने की खबरें भी हैं। लेकिन उनके चर्चित पुत्र सैफ का अचानक सीएनएन चैनल पर प्रकट होना इस बात का संकेत देता है कि गद्दाफी मरते-मरते भी काफी खून बहाकर जाएंगे।

अगर गद्दाफी अब भी बच जाते हैं तो यह बड़ा आश्चर्य होगा। चीन जैसे अत्यंत सावधान राष्ट्र ने भी गद्दाफी का मर्सिया पढ़ दिया है। चीन ने कहा है कि उसके पास इसके सिवाय कोई विकल्प नहीं है कि वह लीबिया की जनता की इच्छा का सम्मान करे।

भारत ने अभी तक अपनी प्रतिक्रिया प्रकट नहीं की है। फरवरी 2011 में शुरू हुए गद्दाफी विरोधी अभियान पर अपनी राय जाहिर करने के पहले भारत हमेशा फूंक-फूंककर कदम रखता रहा है। उसने संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में भी गद्दाफी के विरोध में वोट नहीं दिया था, क्योंकि उसे अंदाज था कि गद्दाफी आसानी से हटने वाले नहीं हैं। भारत को अपने सैकड़ों नागरिकों की चिंता थी, जो त्रिपोली और अन्य लीबियाई शहरों में काम कर रहे थे।

उनमें से ज्यादातर सुरक्षित भारत लौट आए हैं। अब नए लीबिया को मान्यता देने में भारत देर करेगा तो उसे काफी नुकसान हो सकता है। हम यह न भूलें कि कर्नल कज्जाफी ने कभी पाकिस्तान को भारत के विरुद्ध खड़ा करने में जी-जान लगा दी थी। उन्होंने उसे ‘इस्लामी बम’ और ‘कश्मीर की आजादी’ के लिए जबर्दस्त ढंग से उकसाया था। उन्होंने कनाडा से उड़े उस जहाज को भी गिरवाया था, जिसमें कई भारतीय भी मारे गए थे। अंतरराष्ट्रीय जिहादी आतंकवाद को बढ़ावा देने में गद्दाफी ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

अरब-अफ्रीकी जगत में गद्दाफी ने अपनी अलग पहचान बना ली थी। 42 साल तक सत्ता में बने रहना अपने आपमें अजूबा था। उनका कबीला लीबिया में सबसे बड़ा नहीं था, लेकिन डंडे और पैसे के जोर पर उन्होंने लगभग डेढ़ सौ कबीलों को अपनी जेब में डाल रखा था। दो-तीन बार उनके विरुद्ध बगावत की कोशिश हुई, लेकिन उन्होंने उन्हें बेरहमी से दबा दिया। तेल की अकूत आमदनी का इस्तेमाल उन्होंने न सिर्फ अपनी अय्याशी के लिए किया, बल्कि दुनिया के कई नामी-गिरामी नेताओं को अपना दोस्त बनाने के लिए भी किया।

फरवरी में जब उनके विरुद्ध बगावत शुरू हुई तो दुनिया के लोग यह देखकर आश्चर्य में पड़ गए कि इटली के प्रधानमंत्री सिल्वियो बलरुस्कोनी ने गद्दाफी का डटकर समर्थन किया और उन्हें सलाह दी कि वे बगावत को बलपूर्वक दबा दें। इटली का यह रवैया अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन के रवैए के एकदम विपरीत था। वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज ने तो पश्चिमी राष्ट्रों की इस बात के लिए निंदा की कि वे नाटो फौजों का इस्तेमाल करके लीबिया पर बम बरसा रहे हैं।

दक्षिण अफ्रीका के साथ गद्दाफी के रिश्ते इतने घनिष्ठ थे कि लोगों को शक है कि वे लीबिया से भागकर वहीं छिपे हुए हैं। रूस जैसे राष्ट्र का भी गद्दाफी के प्रति रवैया नरम रहा है। रूस ने नाटो राष्ट्रों के गद्दाफी विरोधी सैन्य अभियान का समर्थन नहीं किया था। और अब रूस ने मांग की है कि लीबिया के आंतरिक मामलों में बाहरी शक्तियों का हस्तक्षेप न हो।

रूस की यह मांग कहां तक व्यावहारिक हो सकती है? गद्दाफी को हटाने के लिए पश्चिमी राष्ट्रों ने अपने करोड़ों डॉलर फालतू नहीं बहाए हैं। उन्होंने पहले तो लीबिया पर प्रतिबंध लगाए, फिर उसकी संपत्ति जब्त कर ली और फिर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में उस पर मुकदमा चला दिया। पश्चिमी राष्ट्रों ने जो सैन्य हस्तक्षेप किया, उसे उन्होंने मानव अधिकार रक्षा का जामा पहनाया, लेकिन असलियत क्या है? वही है, जिसके कारण उन्होंने इराक और अफगानिस्तान पर कब्जा किया था।

अपने आर्थिक और सामरिक स्वार्थो के वशीभूत होकर पश्चिमी राष्ट्र पहले तो इन विकासमान राष्ट्रों पर हमला बोल देते हैं और फिर अभिमन्यु की तरह उनके चक्रव्यूह में फंस जाते हैं। अफगानिस्तान के कारण बर्बाद हुए रूस से वे कोई सबक नहीं लेते। लीबिया की तदर्थ सरकार को अभी सभी राष्ट्र मान्यता दे देंगे, लेकिन अगले कई वर्षो तक वहां वास्तविक शासन फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे राष्ट्रों का ही बना रहेगा। कोई आश्चर्य नहीं कि लीबिया में इराक की तरह बराबर बगावत की आग भी सुलगती रहे।

गद्दाफी के कबीले के लोग क्या चुप बैठ जाएंगे? यह भी असंभव नहीं कि लीबिया के विभाजन की मांग जोर पकड़ने लगे। गद्दाफी के बाद के लीबिया को संभालना बच्चों का खेल साबित नहीं होगा। कबीलों और आपसी झगड़ों में उलझे हुए इस देश में लोकतंत्र की स्थापना कैसे होगी, यह केवल पश्चिमी राष्ट्र ही बता सकते हैं। आर्थिक संकट में फंसे हुए पश्चिमी राष्ट्रों ने एक नई बला अपने सिर मोल ले ली है।

लेकिन एक अच्छी बात यह होगी कि लीबिया अन्य देशों के बागियों का प्रेरणास्रोत बनेगा। यमन, सीरिया, जॉर्डन और सऊदी अरब जैसे देशों के बागी सोचेंगे कि यदि गद्दाफी जैसे कद्दावर तानाशाह को धूल चटाई जा सकती है तो उनके अपने मुल्कों के तानाशाह किस खेत की मूली हैं। इसमें शक नहीं कि ट्यूनिशिया और मिस्र के शासकों के मुकाबले गद्दाफी को हटाना काफी मुश्किल सिद्ध हुआ है, लेकिन इस तख्तापलट ने कई अन्य तख्तापलटों की नींव मजबूत कर दी है। लीबिया की घंटियों की गूंज अब हम शीघ्र ही अन्य अरब देशों में सुनेंगे।

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अन्ना का अनशन : आगे क्या ?

23 अगस्त 2011 : अन्ना हजारे के अनशन ने सरकार को सांसत में डाल दिया है| यदि वह सरकारी लोकपाल बिल को वापिस लेती है और उसकी जगह जन-लोकपाल बिल पेश करती है तो माना जाएगा कि उसने संसद की गरिमा गिरा दी है, क्योंकि उसे प्रवक्ता अभी तक यही तर्क दे रहे थे कि संसद सर्वोच्च है और सिविल सोसाइटी के तथाकथित प्रवक्ता अपनी मनमानी संसद पर नहीं थोप सकते| इसके विपरीत अगर सरकार अपनी बात पर अड़ी रहती है और 30 अगस्त तक कोई भी समझौता नहीं होता है तो यह स्थिति देश के लिए अत्यंत विस्फोटक हो सकती है|

अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल गुस्साए हुए नौजवानों को अहिंसा और अनुशासन का लाख पाठ पढ़ाते रहें लेकिन उन्हें पता है कि देश की सड़कों पर उतरे हुए नागरिक उनके अनुयायी नहीं हैं| वे उनके संगठन के कार्यकर्त्ता नहीं है| वे उनकी बात मानने के लिए वचनबद्घ नहीं हैं| रामलीला मैदान पहुंचनेवाले और देश की सड़कों पर हल्ला बोलनेवाले लाखों लोग अपनी अंदर की आवाज पर मैदान में उतरे हैं| भ्रष्टाचार की बारूद देश के कोने कोने में पहले से बिछी हुई थी| उस पर तीलियॉं फेंकने का काम पिछले दिनों उजागर हुए भयंकर घोटालों ने किया है| बाबा रामदेव ने लगभग एक लाख कि.मी. की यात्राऍं की और लगभग 10 करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष संबोधित किया| उन्होंने काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ अपूर्व वातावरण तैयार किया| रामलीला मैदान में 4 जून को हुई रावण-लीला ने देश के नौजवानों को पहले से भी अधिक भड़का दिया|

इन भड़के हुए नौजवानों का नेतृत्व कोई नहीं कर रहा है| हमारे राजनीतिक दल इतने असहाय और निरूपाय पहले कभी नहीं दिखे| 1975-77 में जयप्रकाशजी का नेतृत्व था और उनके पीछे सारे प्रतिपक्षी दल थी| आज केवल अन्ना है और वे सिर्फ एक प्रतीक हैं| लोगों को इससे कोई मतलब नहीं कि अन्ना की कोई विचारधारा भी है या नहीं ? अन्ना टीम द्वारा उछाले गए जन-लोकपाल बिल के अलावा अन्ना के पास कोई दृष्टि है या नहीं, इसका भी कोई महत्व नहीं है| इस समय तो सारे देश पर अन्ना का नशा छाया हुआ है| यह नशा इतना गहरा और व्यापक है कि अन्ना नहीं होते तो भी यह होता| सरकार को ऐसी लहर का अंदेशा बिल्कुल भी नहीं था| इसीलिए सरकार अन्ना और रामदेव पर पुराने नुस्खे आजमाती रही, उन्हें बातों में उलझाती रही और वक्त काटती रही|

जन-आंदोलन इस मुकाम पर आ चुका है कि तर्क-वितर्क की ज्यादा गुंजाइश नहीं रह गई है| अन्ना की सेहत बिगड़नी शुरू हो चुकी है| एक-दो दिन में स्थिति चिंतास्पद बन जाएगी| जब मुद्रदा यह नहीं रह जाएगा कि जन-लोकपाल बिल की किस धारा को स्वीकार करें और किसे रद्द करें ? ज्यों-ज्यों 30 अगस्त की स्थिति नजदीक आती जाएगी, सरकार पर दबाव बढ़ता चला जाएगा| अन्ना के साथ सरकार वह नहीं कर सकती, जो उसने बाबा रामदेव के साथ किया है| यदि अन्ना को रामलीला मैदान से जबर्दस्ती उठाकर अस्पताल ले जाने की कोशिश की गई तो उसके परिणाम अकल्पनीय होंगे| सिर्फ रामलीला मैदान ही नहीं, देश की गली-गली और कूचे-कूचे में सरकार को जनता के क्रोध का मुकाबला करना होगा|

74 साल के अन्ना कहते हैं कि वे दो-तीन हफ्ते काट लेंगे लेकिन इस आत्म-विश्वास और उत्साह के माहौल में यदि अचानक उन्हें कुछ हो गया तो न अन्ना की टीम कुछ कर पाएगी और न ही सरकार ! रामुलू और तारासिंह के अनशनों से अधिक भयंकर स्थिति अब खड़ी हो जाएगी| यह ठीक है कि विरोधी दलों को राजनीतिक लाभ उठाने का अपूर्व अवसर मिलेगा लेकिन भारत सारी दुनिया में बदनाम हो जाएगा| भारत और भ्रष्टाचार एक दूसरे के पर्याय बन जाएंगे| बिगड़ी हुई स्थिति को काबू में लाने के लिए सरकार को प्रचुर बल प्रयोग करना होगा| यह असंभव नहीं कि सरकार को इस्तीफा देना पड़ जाए|

लेकिन इससे बनेगा क्या ? क्या ऐसा होना देश के हित में है ? क्या यह घटनाक्रम सचमुच भ्रष्टाचार को मिटा सकेगा ? भ्रष्टाचार तो तब भी नहीं मिट सकता जब कि जन-लोकपाल बिल जस-का-तस कानून बन जाए| जन-लोकपाल तो भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का शुभारंभ मात्र् है| यदि सचमुच एक शक्तिशाली लोकपाल हो तो लोगों को भ्रष्टाचार करने में थोड़ा डर लगेगा| भ्रष्टाचार को रोकने, पकड़ने और दंडित करने के लिए अभी भी कई कानूनी प्रावधान हैं लेकिन उनकी गिरफ्त में कितने लोग आ पाते हैं| यदि हमारे नेतागण भ्रष्ट हैं और खुद जनता भ्रष्टाचार में शामिल है तो लोकपाल भी क्या कर लेगा ? भ्रष्टाचारी लोग लोकपाल को भी भ्रष्ट कर देंगे| एक शक्तिशाली लोकपाल तो भ्रष्टाचार के वृक्ष के कुछ पत्ते ही तोड़ सकता है, वह भ्रष्टाचार की जड़ों को मट्ठा नहीं पिला सकता| लोकपाल की कार्रवाई शुरू ही तब होगी, जब पहले भ्रष्टाचार हो जाए| भ्रष्टाचार हो ही नहीं, इसके लिए हमें लोकपाल से बहुत आगे जाना होगा| देश में जबर्दस्त नैतिक-जागृति पैदा करनी होगी| जाहिर है कि हमारे राजनीतिक दल यह काम करने में असमर्थ है| उन्हें इस बात की भी चिंता नहीं है कि लोकपाल जैसे सीमित और सतही मुद्दे पर यह देश खतरे की खाई में गिरने को तैयार बैठा है| यदि ऐसा होता है तो इसके जिम्मेदारी सरकार और अन्ना टीम, दोनों पर होगी|

तो क्या किया जाए ? इस समय सरकार और अन्ना टीम, दोनों से अपेक्षा है कि वे परिपक्वता और लचीलेपन का परिचय दें| अन्ना टीम 30 अगस्त का आग्रह छोड़े और सरकार अपने बिल को वापिस ले| सरकार जन-लोकपाल के लगभग सभी प्रमुख मुद्दों को नए बिल में समाहित करे| वह चाहे तो जन लोकपाल बिल को जस-का-तस स्थायी समिति को भेज दे| उस पर सभी दल और सारा देश खुलकर विचार करे| उचित संशोधन-परिवर्धन हों| आखिरकार कानून तो संसद ही बनाएगी| सरकार और सिविल सोसाइटी को तो कानून बनाने का अधिकार नहीं है| ऐसा होने पर संसद की गरिमा गिरने का सवाल ही नहीं उठता| हॉं, सरकार की नाक जरूर नीची हो जाएगी| लेकिन इसकी बजाय यदि वे सब घटनाऍं हो जाए, जिनका संकेत ऊपर की पंक्तियों में किया गया है तो नाक क्या, सिर का बचना ही कठिन हो जाएगा| यदि अन्ना-टीम इसी मुद्दे पर अड़ी रहती है कि 30 अगस्त तक संसद उसी विधेयक को कानून बनाए, जो उसने उछाला है तो यह भी ज्यादती है| यह सचमुच जनता द्वारा चुनी हुई संसद के सम्मान में स्पष्ट कोताही है| आंदोलनकारियों को चाहिए कि वे सरकार और संसद में फर्क करें|

 

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लोकशक्ति ऐसी होती है, सरकार !

दैनिक भास्कर, 17 अगस्त 2011 : प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से कोई यह आशा नहीं करता कि वे जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी या अटल बिहारी वाजपेयी की तरह लालकिले से कोई ओजस्वी या प्रेरणादायक भाषण देंगे| वे जन नेता नहीं हैं| वे नेता भी नहीं हैं, लेकिन जो व्यक्ति सात बार लालकिले से राष्ट्र को संबोधित कर चुका हो, क्या उसमें इतना आत्मविश्वास भी पैदा नहीं हुआ कि वह आठवीं बार बिना पढ़े बोल सके ? लिखे हुए भाषण तो सौ-दो सौ श्रोताओं की विद्घत गोष्ठियों में पढ़े जाते हैं| जिस भाषण को सुनने के लिए देश के करोड़ों लोग आस लगाए रखते हैं, वह बेजान शब्दों की शवयात्र बनकर रह जाए, इससे बढ़कर लोकतंत्र् की विडंबना क्या होगी ?

इस निराशा के बावजूद प्रधानमंत्री की ईमानदारी की दाद देनी होगी| उन्होंने माना कि इस समय भ्रष्टाचार सबसे बड़ी समस्या है| उनके भाषण पर भ्रष्टाचार छाया रहा| सबसे ज्यादा शब्द उन्होंने इसी मुद्दे पर खर्च किए| वे चाहते तो उनके ड्राइंगरूम में बैठे इस हाथी की वे अनदेखी कर सकते थे| वे भी मिस्र के होस्नी मुबारक की तरह आंख मींचे रह सकते थे, लेकिन पिछले कुछ हफ्तों से चल रहे जनांदोलनों ने सरकार की नींद हराम कर दी है| अच्छा हुआ कि उन्होंने लिखा हुआ भाषण पढ़ा वरना लेने के देने पड़ जाते| कांग्रेस के कुछ उत्साही युवा नेताओं ने अपने त्वरित बयानों से अपनी पार्टी और अपनी शख्सियत को जैसा नुकसान पहुंचाया, वैसा नुकसान प्रधानमंत्री ने नहीं पहुंचाया| इस नाजुक मौके पर उनका नौकरशाही स्वभाव उनके काम आया| उनके भाषण पर किसी ने वाह-वाह नहीं की तो आलोचना भी नहीं की|

यह तो उन्होंने ठीक ही कहा कि उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है| जादू की बात जाने दें, भ्रष्टाचार से निबटने के लिए उनके पास कैसी भी छड़ी नहीं है| लेकिन भ्रष्टाचार का विरोध करने वालों को उन्होंने बता दिया कि उनके पास डंडा है| यह डंडा उनकी सरकार ने पहले रामदेव पर बजाया और अब अन्ना हजारे पर बजा दिया| डंडे के जोर पर इस लोकतंत्र् को चलाने की कोशिश 1974-75 में भी हुई थी, लेकिन उसका परिणाम क्या हुआ ? भारत की परम प्रतापी प्रधानमंत्री को भारत की जनता ने सूखे पत्ते की तरह उड़ा दिया| अब जिन नेताओं की हैसियत सूखे पत्ते की भी नहीं है, वे जनता के हिमालय से टकराना चाहते हैं| वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं|

उनकी हिमाकत देखिए कि वे अनशन और प्रदर्शन को संसद और लोकतंत्र् की अवहेलना बता रहे हैं| संसद की इज्जत पैंदे में किसने बिठाई ? नेताओं ने या जनता ने ? नेताओं ने संसद में सवाल पूछने के लिए पैसे खाए| मंत्रियों ने धांधली की और संसद की आंखों में धूल झोंकी| उन्हें संसद ने नहीं, अदालतों ने निकाल बाहर किया| लोकपाल जैसे विधेयक चालीस साल से लटके हुए हैं| आखिर क्यों ? क्योंकि संसद को हमारे नेताओं ने पंगु बना रखा है| यदि रामदेव और अन्ना हजारे जैसे लोग देश को हिलाते हैं तो हमारे कुछ नेता कहते हैं कि वे संसद के अधिकारों का हनन कर रहे हैं| संसद के अधिकार के नाम पर नेताओं के अधिकार सुरसा के मुंह की तरह बढ़ते जा रहे हैं| सांसदों के वेतन और भत्तों की तुलना जरा देश के 80 करोड़ लोगों से कीजिए, 20 रूपए रोज वाले लोगों से कीजिए| एक-एक सांसद को 25 से 30 करोड़ रूपए की स्वविवेक राशि दे दी गई है| इस अधिकार का ‘सदुपयोग’ कैसे होता है, यह सबको पता है| किसी भी जनांदोलन ने संसद या सांसदों के अधिकारों में कटौती की मांग नहीं की है, लेकिन वे सिर्फ संसद के कर्तव्य पर सवाल खड़ा कर रहे हैं|

संसद अपना कर्तव्य ठीक से पूरा करे, यही तो मांग है, जन जनांदोलनों की| ये संसद की ताकत घटा नहीं रहे हैं, बल्कि बढ़ा रहे हैं| जिन मुद्दों पर फैसला लेने में राष्ट्रध्यक्षों और प्रधानमंत्रियों को संकोच होता है, उन्हें समर्थन घटने का डर लगा रहता है, लेकिन जिन मुद्दों को वे बिल्कुल ठीक समझते हैं, उन्हीं मुद्दों पर ये आंदोलन जोर दे रहे हैं| डॉ. मनमोहन सिंह चाहते थे कि प्रधानमंत्री पर लोकपाल निगरानी रखे तो यही बात तो अन्ना कह रहे हैं| प्रणब मुखर्जी कहते हैं कि वे काला धन वापस लाएंगे तो यही बात तो रामदेव कह रहे हैं| रामदेव और अन्ना की बात मानने से सांसद की इज्जत बढ़ेगी या घटेगी ? गद्दियों पर जमे हुए लोग सचमुच नेता होते तो वे इन आंदोलनों से अपने फेफड़ों में नई प्राणवायु भर लेते| वे संसद और सरकार के चेहरे पर चार चांद लगा देते|

लेकिन, वे क्या कर रहे हैं ? वे अनशनों और प्रदर्शनों को ब्लैकमेल बता रहे हैं| क्यों बता रहे हैं ? क्योंकि वे डर गए हैं| आजादी के बाद कांग्रेस ने एक भी बड़ा जनांदोलन नहीं चलाया| छोटे-मोटे प्रतिरोधों, दिखावटी जलसों और कुछ नाटकीय प्रदर्शनों के अलावा कांग्रेस ने क्या किया है| वह भी इसलिए वह आठ-दस साल सत्ता से बाहर हो गई थी| यह उसकी मजबूरी थी| इसीलिए जब कोई भी बड़ा जनांदोलन होता है तो उसके हाथ-पांव ही नहीं, दिमाग भी फूल जाता है| उसके पसीने छूट जाते हैं| वह आंदोलनों का मुकाबला राजनीति से नहीं करती है, क्योंकि उसके तरकस में वह तीर है ही नहीं| वह आंदोलनों का मुकाबला राज्य की ताकत से करती है| डंडे और गोली से करती है| राज्य की ताकत का वह दुरूपयोग करती है| अहिंसक आंदोलनकारियों के मुकाबले क्या वह अहिंसक कांग्रेसियों को उतार सकती है? अहिंसक, निहत्थे और बेकसूर सत्याग्रहियों पर डंडे बरसानी वाली कांग्रेस क्या गांधी और नेहरू की कांग्रेस हो सकती है ? अपने नाम के साथ उस महात्मा का नाम जबर्दस्ती जोड़ने वाले लोगों को क्या कोई शर्म नहीं आती ?

अगर यह किसी भी गांधी की कांग्रेस है तो क्या उसे सत्याग्रहियों को ब्लैकमेल करना चाहिए ? क्या गांधी ने अपने विरोधियों का कभी चरित्र् हनन किया ? अन्ना हजारे और रामदेव पर जिस तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं और इन साधु-पुरूषों के लिए जिस तरह की भाषा का प्रयोग किया जा रहा है, क्या यह कांग्रेस-जैसी महान पार्टी की शानदार परंपराओं के अनुकूल है ? जो पार्टी अपने अहिंसात्मक सत्याग्रहों और जनांदोलनों के लिए कभी विश्वविश्यात हुई थी, आज उसके डरे हुए और नादान नेताओ ंने उसकी इज्जत धूल में मिला दी है| सत्तारूढ़ नेता इस मुगालते में न रहें कि अभी तीन साल बाकी हैं| यह ठीक है कि भारत की जनता हिंसा पर उतारू नहीं होगी, लेकिन इस बार अगर उस पर जुल्म दोहराया गया तो ये तीन साल का कुराज अगले तीस साल का वनवास बन जाएगा| जनांदोलनों की यह टक्कर तय करेगी कि लोकतंत्र् में कौन बड़ा है, नौकर या मालिक ?

 

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