दैनिक भास्कर, 28 जनवरी 2006 : अमेरिका के राजदूत डेविड मल्फोर्ड ने मनमोहन-सरकार को साँसद में डाल दिया है| उन्होंने पी टी आई को भेंटवार्ता क्या दी, पूरे नेपथ्य का पर्दा ही हटा दिया है| भारत और अमेरिका के बीच अभी तक दबे-छिपे जो कुछ चल रहा था, वह सब उजागर हो गया है| लोगों [...]
राष्ट्रीय सहारा, 22 जनवरी 2006 : हर 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मनाया जाएगा, यह घोषणा सरकार ने इतनी दबी जुबान से की है कि बहुत से हिंदी अखबारों को ही कुछ पता नहीं चला है हैदराबाद के प्रवासी सम्मेलन के दौरान सरकार को याद आया कि पहला विश्व हिंदी सम्मेलन नागपुर में 10 [...]
राष्ट्रीय सहारा, 22 जनवरी 2006 : भारत के सिर पर बोफोर्स का भूत कब तक नाचता रहेगा? क्या इसे दफन करने का वक्त नहीं आ गया है? जिस भूत ने राजीव सरकार और नेहरू परिवार की प्रतिष्ठा को दफन कर दिया, जिसने वी.पी. सिंह, देवगौड़ा, गुजराल और अटल सरकार को निकम्मा सिद्घ कर दिया, जिसने [...]
दैनिक भास्कर, 21 जनवरी 2006 : कर्नाटक से बढ़कर बुरी खबर काँग्रेस के लिए क्या हो सकती थी? वोल्कर रिपोर्ट और क्वात्रेची-प्रसंग के बादलों ने काँग्रेस की मलिका को पहले से घेर रखा था और अब कर्नाटक में वज्रपात हो गया| काँग्रेस को पता था कि देवगौड़ा उसकी सरकार गिराने पर आमादा हैं और वह [...]
दैनिक भास्कर, 21 जनवरी 2006 : कर्नाटक से बढ़कर बुरी खबर काँग्रेस के लिए क्या हो सकती थी? वोल्कर रिपोर्ट और क्वात्रेची-प्रसंग के बादलों ने काँग्रेस की मलिका को पहले से घेर रखा था और अब कर्नाटक में वज्रपात हो गया| काँग्रेस को पता था कि देवगौड़ा उसकी सरकार गिराने पर आमादा हैं और वह [...]
दैनिक भास्कर, 12 जनवरी 2006 : ईरान ने अपनी परमाणु भट्टी दुबारा सुलगा ली है| उसने 30 माह पहले यूरोपीय देशों के आग्रह पर अपना यूरेनियम संवर्द्घन का कार्यक्रम बंद कर दिया था| उसका कहना है कि उसने अपनी मर्जी से यह कार्यक्रम बंद किया था और अब अपनी मर्जी से उसे वह चालू कर [...]
नवभारत टाइम्स, 12 जनवरी 2006 : वृंदा कारत ने किसका भला किया? न खुद का, न मजदूरों का, न देश का, न आयुर्वेद का, न मार्क्सवादी पार्टी का! हर दृष्टि से उनका अभियान गलत साबित हो रहा है| वृंदाजी ने पहले इतने सही मुद्दों पर लड़ाइयाँ लड़ी हैं कि जब उन्होंने स्वामी रामदेव के खिलाफ [...]
राष्ट्रीय सहारा, 6 जनवरी 2006 : नेपाल के माओवादियों ने फिर पुरानी राह पकड़ ली है| चार माह से चले आ रहे संघर्ष-विराम को उन्होंने समाप्त घोषित कर दिया है| उन्होंने न तो संयुक्तराष्ट्र, न नेपाल के राजनीतिक दलों और न ही भारत सरकार के अनुरोध को स्वीकार किया| वे अब मनमानी पर उतर आए [...]
जनसत्ता, 6 जनवरी 2006 : भाजपा के तीन प्रमुख संकट हैं| पहला नेतृत्व का, दूसरा विचारधारा का और तीसरा छवि का ! नए पार्टी-अध्यक्ष की नियुक्ति निर्विध्न हो गई, इसका मतलब यह नहीं कि नेतृत्व का संकट टल गया बल्कि वस्तुस्थिति यह है कि अब नेतृत्व का संकट बढ़ गया है| नए पार्टी-अध्यक्ष कितने स्वायत्त [...]
जनसत्ता, 6 जनवरी 2006 : भाजपा के तीन प्रमुख संकट हैं| पहला नेतृत्व का, दूसरा विचारधारा का और तीसरा छवि का ! नए पार्टी-अध्यक्ष की नियुक्ति निर्विध्न हो गई, इसका मतलब यह नहीं कि नेतृत्व का संकट टल गया बल्कि वस्तुस्थिति यह है कि अब नेतृत्व का संकट बढ़ गया है| नए पार्टी-अध्यक्ष कितने स्वायत्त [...]
नवभारत टाइम्स, 02 जनवरी 2006 : कोई संसद अपने 11 सदस्यों को एक साथ निकाल बाहर करे, ऐसा पहले कभी देखा-सुना नहीं गया| निकालने में जो फुर्ती दिखाई गई, वह भी अपूर्व थी| अगर अदालत को मौका मिल जाता तो अंजाम शायद झारखंड रिश्वत कांड से भी बुरा हो सकता था| उस मामले में तो [...]
राष्ट्र्रीय सहारा, 11 दिसंबर 2005 : प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहनसिंह की मास्को-यात्र खाली वार्षिक कर्मकांड बनकर रह जा सकती थी, जैसे कि पिछले साल रूसी राष्ट्र्रपति ब्लादिमीर पूतिन की दिल्ली-यात्र रही लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री की इस यात्र ने अनेक छोटे-मोटे लक्ष्य सिद्घ किए| पहले राजनीतिक लक्ष्यों को ही लें| सबसे पहला लक्ष्य तो ईरान का [...]
नवभारत टाइम्स, 02 दिसम्बर 2005 : पहले संघ और लालकृष्ण आडवाणी भिड़े और अब भाजपा और उमा भारती भिड़ गए| इस भिडंत में विचारधारा कहां है, आदर्श कहां हैं, सिद्घांत और नीतियां कहॉं हैं? यह शुद्घ सत्ता-संघर्ष है| आडवाणी और उमा से बेहतर सिद्घांतशास्त्री कल तक कौन था? लेकिन संघ और आडवाणी की भिड़ंत में [...]
राष्ट्र्रीय सहारा, 27 नवंबर 2005 :बिहार के चुनाव-परिणाम का क्या कोई अखिल भारतीय अर्थ है? अगर है तो क्या है? सबसे पहला तो यही कि बिहार में बुरी तरह हारने के बावजूद केंद्र का कांग्रेस-गठबंधन कमजोर नहीं होगा| उसी तरह कमजोर नहीं होगा, जैसे कि उ.प्र. में हारने पर भाजपा-गठबंधन नहीं हुआ था| जैसे भाजपा-गठबंधन [...]
नवभारत टाइम्स, 25 नवम्बर 2005 : कांटों भरा ताज किसे कहते हैं, यह देखना हो तो श्रीलंका के राष्ट्र्रपति को देखें, जो मुश्किल से 2 प्रतिशत वोटों से जीते हैं| महिंद राजपक्ष को रनिल विक्रमसिंघ के मुकाबले सिर्फ एक लाख 80 हजार वोट ज्यादा मिले हैं| जीतनेवाले को 48 लाख 87 हजार और हारनेवाले को [...]
R Sahara, 19 Nov. 2005 : जो लोग दक्षेस की तुलना ‘एसियान’ या ‘यूरोपीय आर्थिक समुदाय’ से करते हैं, वे तो निराश ही होंगे| वे कह सकते हैं कि दक्षेस का ढाका-सम्मेलन निरर्थक रहा| नेताओं ने गप्पे हांकने, भाषण झाड़ने और सैर-सपाटा करने के अलावा क्या किया? बरसों पुराने प्रस्ताव उन्होंने दुबारा पास कर दिए| [...]
Nav Bharat Times, 17 Nov 2005 : अफगानिस्तान दक्षेस में आ गया, यह ढाका-सम्मेलन की सबसे बड़ी सफलता है| दक्षेस को बने, 20 साल हो गए लेकिन अफगानिस्तान और बर्मा उसके बाहर ही रहे| अफगानिस्तान और बर्मा के बिना क्या दक्षिण एशिया की कल्पना की जा सकती है? दक्षिण एशिया क्या है? वह प्राचीन भारत [...]
NavBhart Times, 5 Nov 2005 : सुभद्राकुमारी चौहान ने कभी पूछा था, ‘वीरों का कैसा हो वसंत?’ अब पूछने का समय आ गया है कि ‘भारत की कैसी हो प्रतिकि्रया’, दिल्ली के बम-विस्फोटों पर, रघुनाथ मंदिर पर, अक्षरधाम पर, संसद पर और लालकिले पर हुए हमले पर ! संसद पर हुए हमले से भारत थोड़ा [...]
NavBharat Times, 29 Oct 2005 : भारत की परमाणु नीति को जितनी चतुराई से विदेश सचिव श्याम सरन ने प्रतिपादित किया, पिछले कई वर्षों में किसी अन्य विदेश सचिव या विदेश मंत्री ने नहीं किया| प्रतिरक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान में दिया गया विदेश सचिव का व्याख्यान इसलिए भी अनूठा हो गया है कि उसमें [...]
Bhaskar, 27 Oct 2005 : अखबारों को आपात्काल में ही नहीं दबाया जाता, उन्हें सामान्यकाल में भी दबाया जा सकता है| राजीव गांधी जब मानहानि-विधेयक लाए थे तो देश में आपात्काल नहीं था और अब जबकि सब-कुछ सामान्य है, मनमोहनसिंह सरकार एक ऐसा आदेश ले आई है, जो अखबारों का दम घोट सकता है| आदेश [...]