Hindustan, 22 July 2011 : हिलेरी क्लिंटन की भारत-यात्रा के दौरान गुलाम नबी फई की गिरफ्तारी कोरा नाटक ही मालूम पड़ती है। फई वाशिंगटन में कश्मीर-अमेरिकन कौंसिल चलाते हैं। इसे आईएसआई ने लगभग 20 करोड़ रुपये चोरी-छिपे दिए हैं, ऐसा अमेरिकी पुलिस का आरोप है। लेकिन यह किसे पता नहीं है कि ‘कश्मीर का झंडा’ उठाने वाले [...]
Posts Tagged 'अमेरिका'
Dainik Bhaskat (Bhopal), 13 July2011: जिस अनिष्ट की आशंका थी, वही हुआ। भारत-अमेरिका परमाणु सौदे की असलियत अब सामने आती चली जा रही है। भारत और अमेरिका, दोनों ही एक-दूसरे को ठगने की कोशिश कर रहे थे। अब दोनों एक-दूसरे को कोसने लगेंगे। संबंधों के इस नए दौर की शुरुआत परमाणु सप्लायर्स ग्रुप के एक [...]
दैनिक हिन्दुस्तान, 8 अप्रैल 2011 : अगर आज ईसा मसीह होते तो क्या करते ? अपना माथा कूट लेते| अगर कोई उन्हें टेरी जोन्स की हरकतों से वाकिफ करवा देता तो वे कहते कि ऐसे ईसाई धर्म से मेरा कोई लेना-देना नहीं है| फ्लोरिडा के किसी गुमनाम चर्च के पादरी जोन्स ने 20 मार्च को [...]
‘राष्ट्रीय सहारा, 29 दिसंबर 2010 | ‘स्टार्ट’ नामक संधि पर मुहर लगाकर अमेरिकी सीनेट ने न सिर्फ ओबामा की प्रतिष्ठा में चार चांद लगा दिए हैं बल्कि विश्व निरस्त्रीकरण और विश्व शांति को नया आयाम प्रदान कर दिया है| यह वह संधि है जिस पर अप्रैल माह में अमेरिका और रूस ने मिलकर प्राहा में [...]
Dainik Bhaskar, 17 Nov 2010 : ऐसा लगता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा आशा से अधिक सफल रही, क्योंकि उनकी यात्रा से बहुत आशाएं किसी ने नहीं लगा रखी थीं। भारत सरकार को भी पता नहीं था कि सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता को लेकर वे क्या कहेंगे या [...]
Rashtriya Sahara, 3 Nov 2010 : ओबामा की भारत-यात्रा के दौरान क्या भारत को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने का आश्वासन मिलेगा? यदि मिलेगा तो भी काफी घुमा-फिराकर। फ्रांस और ब्रिटेन की तरह अमेरिका साफ-साफ बोलने से कतराता है। क्यों? इसलिए कि भारत ने पिछले छह दशकों में संयुक्त राष्ट्र महासभा में और सुरक्षा [...]
दैनिक हिन्दुस्तान, 07 सितंबर 2010 : अगर ओबामा की जगह बुश होते तो अमेरिका के लिए कहा जाता कि ‘बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले’ | एराक से निकलना कोरिया और वियतनाम से भी बदतर ही रहा, हालांकि वहां बहुत ज्यादा अमेरिकी मारे गए थे| एराक में बुश क्यों घुसे थे, यह आज [...]
Dainik Bhaskar, 14 April 2010 : अमेरिका की अफ-पाक नीति इतनी दिग्भ्रमित है कि वॉशिंगटन सम्मेलन में उसे पाक को ससम्मान बुलाना पड़ा। जो आतंकवाद का गढ़ व परमाणु चोरी के लिए दुनिया में कुख्यात राष्ट्र है, उसके प्रधानमंत्री का ह्वाइट हाउस में स्वागत करना कितनी बड़ी मजबूरी है। ईरान और उत्तरी कोरिया को दुत्कारना [...]
दैनिक भास्कर (नई दिल्ली), 25 जनवरी 2010 | बराक हुसैन ओबामा के एक साल में ऐसा क्या कर दिया कि उनकी लोकपि्रयता का ग्राफ 80 से गिरकर 50 के आस-पास आ गया है ? ऐसा तो प्राय: तभी होता है, जब कोई राष्ट्रपति वाटरगेट में फंस जाए या ल्यूंस्की मामले में उलझ [...]
Dainik Hindustan, 04 Dec 2009 : ओबामा की नई अफगान-नीति में नया क्या है? उसमें ऐसा क्या है, जिसके कारण उसे बुश से अलग कहा जा सके? सिर्फ एक बात अलग है। वह यह कि अब से 18 माह बाद अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी शुरू हो जाएगी। वापसी की बात कभी बुश के दिमाग में आईही नहीं। [...]
Dainik Hindustan, 27 Nov 2009 : प्रधानमंत्री डॉ़ मनमोहन सिंह की वाशिंगटन यात्रा के दौरान भारत-अमेरिका परमाणु करार को लागू करने की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई, लेकिन क्या सिर्फ इसीलिए उनकी इस यात्रा को मात्र औपचारिकता मान लिया जाए? क्या यह मान लिया जाए कि ओबामा ने भारत के उन घावों पर सिर्फ मरहम लगाने [...]
Dainik Bhaskar, 18 Nov 2009 : अंतरिक्ष को लेकर आजकल सारी दुनिया में गहन विचार-विमर्श चल रहा है। वॉशिंगटन, डीसी में अमेरिका के अत्यंत प्रसिद्ध ‘थिंक टैंक’, सेंटर फॉर स्ट्रेटजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज ने यहां विश्व सम्मेलन का आयोजन किया है, जिसमें चीन समेत अनेक राष्ट्रों के अंतरिक्ष विज्ञान के धुरंधर भाग ले रहे हैं। [...]
Dainik Bhaskar, 16 Nov 2009 : पिछले दो साल में मेरी यह चौथी अमेरिका यात्रा है। इस यात्रा में अमेरिका का जोहाल देख रहा हूं, उसे देखकर दुख होता है। मुझे लगता था कि बराक ओबामा के राष्ट्रपति बन जाने पर अमेरिका के दिन फिरेंगे। बुश की गल्तियां सुधारी जाएंगी, आम आदमी की जिंदगी बेहतर हो जाएगी, इराक [...]
राष्ट्रीय सहारा, 20 अक्टूबर 2009 : ओबामा चाहते तो नोबेल पुरस्कार को अस्वीकार कर सकते थे, जैसे कि प्रसिद्घ फ्रांसीसी साहित्यकार ज्यां पाल सार्भ या वियतनामी बौद्घ भिक्षु थिच कुआंग दो ने कभी किया था| यदि वे ऐसा कर देते तो शायद उनकी हैसियत अमेरिका के राष्ट्रपति से भी ज्यादा हो जाती| अमेरिका के राष्ट्रपति-पद [...]
जनसत्ता, 10 जुलाई 2009 : रूस और अमेरिका के शीर्ष-नेता या तो मिलते ही नहीं हैं और अगर वे मिलते हैं तो सारी दुनिया सांस रोककर देखती है कि देखें, अब क्या होगा ? शीत-युद्घ के दौरान महाशक्तियों के इन वाग्दंगलों का मज़ा संसार ने खूब लूटा लेकिन 20 साल पहले समाप्त हुए शीतयुद्घ के [...]
दै. भास्कर, 16 जून 09 : ओबामा के एतिहासिक क़ाहिरा-भाषण में भारत के लिए क्या है ? उसमें कहीं भारत है या नहीं, यह सवाल अगर भारतीय लोग पूछते हैं तो इसमें गलत क्या है ? ओबामा का काहिरा-भाषण इस्लाम और अमेरिका के संबंधों पर था| लेकिन इस्लाम क्या नील और दज़ला-फरात नदियों तक ही [...]
दै. भास्कर 10 जून 09 : बराक हुसैन ओबामा के काहिरा-भाषण को वही एतिहासिक प्रतिष्ठा प्राप्त हो गई है, जो 1946 में दिए गए विंस्टन चर्चिल के फुल्टन-भाषण को हुई थी| चर्चिल के भाषण ने शीत-युद्घ का बीज बो दिया था और लगता है कि ओबामा का भाषण अंतरराष्ट्रीय-राजनीति का दुर्लभ मरहम सिद्घ होगा| ओबामा [...]
Dainik Bhaskar, 20 Jan 2009 : मूल प्रश्न यह नहीं है कि भारत के प्रति अमेरिका के नए राष्ट्रपति ओबामा की नीति क्या होगी ? बल्कि यह है कि पाकिस्तान के प्रति उनकी नीति क्या होगी ? क्या ओबामा 60 साल से चले आ रहे भारत-पाक नकली शक्ति-संतुलन को खत्म कर सकेंगे ? भारत और [...]
दैनिक भास्कर, 25 सितंबर 2008 : भारत-अमेरिकी परमाणु सौदे का भविष्य चाहे जो भी हो, भारत और अमेरिका के संबंध अब एक नए युग में प्रवेश कर गए हैं| अब से 17 साल पहले जब शीतयुद्घ समाप्त हुआ तो भारत हाथ पर हाथ धरे बैठा नहीं रहा| उसने विश्व राजनीति के बदलते हुए आयामों को [...]