Posts Tagged 'जाति'

Posted by: on: May 26 2011 • Categorized in: Articles

Dainik Bhaskar, 26  May 2011 : पिछले साल ‘सबल भारत’ के आंदोलन ‘मेरी जाति हिंदुस्तानी’ ने देश में कुछ ऐसी जागृति फैलाई कि सरकार को जनगणना से जाति को बाहर करना पड़ा। इस आंदोलन के पास न जन-शक्ति थी, न धन-शक्ति और न ही मीडिया-शक्ति। सिर्फ विचार-शक्ति ने हमारे राजनीतिक नेताओं को जरा हिलाया, जगाया [...]

Posted by: on: August 11 2010 • Categorized in: Articles

दैनिक भास्कर, 11 अगस्त 2010| जिन लोगों के हाथ में हमने देश की पतवार दे रखी है, उनका हाल क्या है, इसका हमें सही-सही पता लग रहा है, जातीय गणना के सवाल से ! 2011 की जन-गणना में जाति को जोड़ा जाए या नहीं, इस मुद्रदे पर हमारे प्रमुख राजनीतिक दलों को दिग्भ्रम आश्चर्यजनक है| [...]

Posted by: on: August 6 2010 • Categorized in: Articles

नई दुनिया, 06 अगस्त 2010 : जातीय गणना के इरादे को देश सफल चुनौती दे रहा है| जबसे ‘सबल भारत‘ ने ‘मेरी जाति हिंदुस्तानी‘ आंदोलन छेड़ा है, इसका समर्थन बढ़ता ही चला जा रहा है| देश के वरिष्ठतम नेता, न्यायाधीश, विधिशास्त्री, विद्वान, पत्र्कार, समाजसेवी और आम लोग भी इससे जुड़ते चले जा रहे हैं| इसमें [...]

Posted by: on: July 9 2010 • Categorized in: Articles

दैनिक भास्कर, 2 जून 2010| जन-गणना में जाति गिनाने के पक्ष में अजीबो-गरीब तर्क दिए जा रहे हैं| पहला तर्क यह है कि जाति हिंदुस्तान की सच्चाई है| इसे आप स्वीकार क्यों नहीं करते ? यह तर्क बहुत खोखला है, क्योंकि इस देश में जाति ही नहीं, अन्य कई सच्चाइयाँ हैं| क्या हम उन सब [...]

Posted by: on: July 6 2010 • Categorized in: Articles

नवभारत टाइम्स, 6 जुलाई I संसद के पिछले सत्र् में लगभग सभी दलों ने फैसला कर लिया था कि 2011 की जनगणना में जातीय गणना अवश्य होनी चाहिए लेकिन पिछले सप्ताह दस मंत्रियों के समूह ने न सिर्फ इस बंद पिटारे को दुबारा खोल दिया बल्कि अगले एक माह तक इस मुद्दे पर खुली बहस [...]

Posted by: on: June 28 2010 • Categorized in: Articles

दैनिक हिन्दुस्तान (4 जून 2010) भारत के टूटने का जैसा खतरा इस समय खड़ा हुआ है, शायद भारत के इतिहास में पहले कभी खड़ा नहीं हुआ| भारत पहले भी दर्जनों बार टूटा, जुड़ा और फिर टूटा, इसके बावजूद वह आज भी दुनिया का एक बड़ा राष्ट्र है लेकिन इस बार जो खतरा इसके सामने आया [...]

Posted by: on: May 27 2010 • Categorized in: Articles

27 मई 2010, जनसत्ता | तर्क यह दिया जाता है कि अगर हम दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को आरक्षण देते रहना चाहते हैं तो जन-गणना में जाति का हिसाब तो रखना ही होगा| उसके बिना सही आरक्षण की व्यवस्था कैसे बनेगी ? हॉं, यह हो सकता है कि जिन्हें आरक्षण नहीं देना है, उन सवर्णों [...]

Posted by: on: May 11 2010 • Categorized in: Articles

भास्कर (नई दिल्ली) 11 मई 2010 | अगर हम दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को आरक्षण देते रहना चाहते हैं तो जन-गणना में जाति का हिसाब तो रखना ही होगा| उसके बिना सही आरक्षण की व्यवस्था कैसे बनेगी ? हॉं, यह हो सकता है कि जिन्हें आरक्षण नहीं देना है, उन सवर्णों से उनकी जात न [...]

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