Posts Tagged 'बीजेपी'

Posted by: on: October 13 2011 • Categorized in: Articles

Rashtriya Sahara, 13 Oct 2011 : लालकृष्ण आडवाणी की रथ-यात्रा को लेकर पता नहीं कौन-कौन परेशान हो रहा है? क्या कांग्रेस, क्या संघ-भाजपा, क्या कुछ मुस्लिम नेता और क्या कुछ क्षेत्रीय नेता ! सभी मिलकर 83 साल के इस चिर-युवा नेता की टांग-खिंचाई कर रहे हैं। इन परेशान होनेवाले महानुभावों से कोई पूछे कि भ्रष्टाचार-विरोधी [...]

Posted by: on: October 4 2011 • Categorized in: Articles

Naya India, 04 Oct 2011 : भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में से क्या निकला, यह बताना भाजपा के नेताओं के लिए भी मुश्किल है। देश को आशा थी कि यह दिल्ली बैठक बड़ी जानदार सिद्ध होगी लेकिन वह होती, उसके पहले ही उसका दम निकल गया। बैठक के आरंभ से अंत तक नरेंद्र मोदी उस [...]

Posted by: on: September 2 2009 • Categorized in: Articles

दैनिक भास्कर, 2 सितंबर 2009 : अगर आज भाजपा बिखर जाए तो क्या होगा ? देश का बड़ा अहित हो जाएगा| स्वयं प्रधानमंत्री ने यह चिंता व्यक्त की है| वे देश का रथ चला रहे हैं| रथ का दूसरा पहिया टूट जाए तो रथ चलेगा क्या ? रथ का यह दूसरा पहिया हिल जरूर रहा [...]

Posted by: on: August 25 2009 • Categorized in: Articles

दैनिक भास्कर, 25 अगस्त 2009 :  यदि जसवंतसिंह को जिन्नावाली किताब के कारण निकाला गया है तो यह घटना भाजपा का शाश्वत कलंक कहलाएगी| किसी पार्टी का संसदीय बोर्ड इतना गैर-जिम्मेदाराना फैसला कैसे कर सकता है ? संसदीय बोर्ड किसी भी पार्टी का दिलो-दिमाग होता है| लगता है, शिमला में उसे ठंड लग गई| पुस्तक-विमोचन [...]

Posted by: on: June 24 2009 • Categorized in: Articles

दैनिक भास्कर, 24 जून 2009 : भाजपा पर कौनसा संकट आया था, जो दूर हो गया ? ‘भाजपा में ज्वालामुखी’, ‘भाजपा की दुर्दशा’, ‘भाजपा का अध:पतन’ आदि शब्दों का प्रयोग पता नहीं कुछ लोगों ने क्यों किया था ? दो-चार नेताओं ने अध्यक्ष को चिटि्रठयॉं क्या लिख दीं, अखबारों में कोहराम-सा मच गया| अखबार और [...]

Posted by: on: May 19 2009 • Categorized in: Articles

राष्ट्रीय सहारा, 19 मई 2009 : पहला प्रश्न तो यही है कि जो हुआ, उसे भाजपा की हार कहा जाए या नहीं| यदि यह अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव की तरह अगर सीधा चुनाव होता तो निस्संकोच यह कहा जा सकता था कि कांग्रेस जीत गयी और भाजपा हार गयी| लेकिन यह चुनाव परिणाम कुछ इस [...]

Posted by: on: May 10 2009 • Categorized in: Articles

दैनिक भास्कर, 18 मई 2009 : इस चुनाव के सबसे चमत्कारी पहलू पर बहुत कम लोगों का ध्यान गया है| वह पहलू है, अखिल भारतीयता की पुष्टि ! पिछले 20 वर्षों में हर चुनाव ने अखिल भारतीयता को धक्का पहुंचाया| इंदिरा गांधी की शहादत के साये में हुए 1984 के चुनाव ने कॉंग्रेस को 400 [...]

Posted by: on: December 9 2008 • Categorized in: Articles

दैनिक भास्कर, 9 दिसंबर 2008 :   पाँच राज्यों के चुनाव-परिणामों ने यह सिद्घ किया है कि भारत का लोकतंत्र् काफी परिपक्व होता जा रहा है| किसी भी लोकतंत्र् को कमज़ोर करनेवाले जितने भी तत्व हो सकते हैं, इन चुनावों ने उनको पराजित किया है| सबसे पहली बात तो यह कि लगभग सभी राज्यों में मतदान [...]

Posted by: on: June 6 2008 • Categorized in: Articles

नवभारत टाइम्स, 6 जून 2008 : भाजपा अध्यक्ष का यह कहना मोटे तौर पर ठीक ही है कि कर्नाटक-विजय के बाद भाजपा कांग्रेस से भी बड़ी पार्टी बन गई है| भाजपा का राज बड़े राज्यों में है और कांग्रेस का छोटे राज्यों में ! भाजपा और उसकी साथी पार्टियों के राज्यों के सांसदों और विधायकों [...]

Posted by: on: February 8 2008 • Categorized in: Articles

नवभारत टाइम्स, 8 फरवरी 2008 : लालकृष्ण आडवाणी ने जो किया, अगर वह वे नहीं करते तो क्या करते? क्या वे बेनज़ीर भुट्रटो की तरह अपनी जि़द पर अड़े रहते और भारत में वह होने देते, जो पाकिस्तान में भी नहीं हुआ? बेनज़ीर का हत्यारा कौन है, यह अभी तक पता नहीं चल पाया और [...]

Posted by: on: January 11 2008 • Categorized in: Articles

दैनिक भास्कर, 11 जनवरी 2008 :  भारत रत्न के लिए श्री अटलबिहारी वाजपेयी से बेहतर उम्मीदवार कौन हो सकता है और उनको यह सम्मान देने के लिए कॉंग्रेस सरकार से बेहतर सरकार कौन हो सकती है? कॉंग्रेसियों के लिए यह कदम वरदान साबित हो सकता है| अब तक कॉंग्रेसी अटल बिहारी वाजपेयी को ‘गलत पार्टी [...]

Posted by: on: September 1 2007 • Categorized in: Articles

रा. सहारा, 1 सितंबर 2007 :   परमाणु समझौते के सवाल पर भाजपा के बदलते हुए पैतरे जनता के लिए एक पहेली बन गये है| क्या प्रतिपक्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी ने शीर्षासन कर दिया था? क्या उन्होंने मनमोहनसिंह-सरकार से गुपचुप हाथ मिला लिया था? क्या अमेरिकियों ने उन्हें अपने जाल में वैसे ही फॅंसा लिया है, [...]

Posted by: on: March 2 2007 • Categorized in: Articles

नवभारत टाइम्स, 2 मार्च 2007 : यदि किसी पार्टी की केंद्र में सरकार हो और दो-तीन राज्यों में वह चुनाव हार जाए तो यह मानकर चला जाता है कि कोई खास फर्क नहीं पड़ता| दो-चार पेड़ों के गिर जाने से क्या जंगल खाली हो जाता है ? प्राय: नहीं होता लेकिन पंजाब, उत्तराखंड और मणिपुर [...]

Posted by: on: February 28 2007 • Categorized in: Articles

नई दुनिया, 28 फरवरी 2007 : पंजाब, उत्तराखंड और मणिपुर के चुनावों से यह स्पष्ट संदेश उभर रहा है कि कांग्रेस पार्टी की ताकत बुरी तरह से घट रही है. अब पूरे राष्ट्र में मुश्किल से गिनी-चुनी जगहों पर ही कांग्रेस की सरकार है, वो भी दूसरों के टेकों पर टिकी हुई है. इसका सीधा [...]

Posted by: on: February 3 2007 • Categorized in: Articles

नवभारत टाइम्स, 3 फरवरी, 2007 : राजनाथसिंह की नई टीम पर संघ और भाजपा में कोई खलबली नहीं है लेकिन मीडिया को बुखार चढ़ आया है| मीडिया को खबर चाहिए और खबर है, संजय जोशी, मोदी और जेटली| इन तीनों सज्जनों के चारों तरफ खबरों का जाल बुन लिया गया है| मीडिया खुद इस जाल [...]

Posted by: on: May 6 2006 • Categorized in: Articles

  दैनिक भास्कर,  6 मई 2006 : प्रमोद महाजन का महत्व क्या था, इसका पता इसी बात से पता चलता है कि भाजपा के अध्यक्ष राजनाथसिंह और लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी यात्रएं रद्द कर दीं और वे महाजन की अंत्योष्टि में उपस्थित हुए| प्रमोद के बिना भाजपा की कल्पना करना ही कठिन है| प्रमोद ने [...]

Posted by: on: January 21 2006 • Categorized in: Articles

दैनिक भास्कर, 21 जनवरी 2006 : कर्नाटक से बढ़कर बुरी खबर काँग्रेस के लिए क्या हो सकती थी? वोल्कर रिपोर्ट और क्वात्रेची-प्रसंग के बादलों ने काँग्रेस की मलिका को पहले से घेर रखा था और अब कर्नाटक में वज्रपात हो गया| काँग्रेस को पता था कि देवगौड़ा उसकी सरकार गिराने पर आमादा हैं और वह [...]

Posted by: on: January 6 2006 • Categorized in: Articles

जनसत्ता, 6 जनवरी 2006 : भाजपा के तीन प्रमुख संकट हैं| पहला नेतृत्व का, दूसरा विचारधारा का और तीसरा छवि का ! नए पार्टी-अध्यक्ष की नियुक्ति निर्विध्न हो गई, इसका मतलब यह नहीं कि नेतृत्व का संकट टल गया बल्कि वस्तुस्थिति यह है कि अब नेतृत्व का संकट बढ़ गया है| नए पार्टी-अध्यक्ष कितने स्वायत्त [...]

Posted by: on: January 6 2006 • Categorized in: Articles

जनसत्ता, 6 जनवरी 2006 : भाजपा के तीन प्रमुख संकट हैं| पहला नेतृत्व का, दूसरा विचारधारा का और तीसरा छवि का ! नए पार्टी-अध्यक्ष की नियुक्ति निर्विध्न हो गई, इसका मतलब यह नहीं कि नेतृत्व का संकट टल गया बल्कि वस्तुस्थिति यह है कि अब नेतृत्व का संकट बढ़ गया है| नए पार्टी-अध्यक्ष कितने स्वायत्त [...]

Posted by: on: December 2 2005 • Categorized in: Articles

नवभारत टाइम्स, 02 दिसम्बर 2005 : पहले संघ और लालकृष्ण आडवाणी भिड़े और अब भाजपा और उमा भारती भिड़ गए| इस भिडंत में विचारधारा कहां है, आदर्श कहां हैं, सिद्घांत और नीतियां कहॉं हैं? यह शुद्घ सत्ता-संघर्ष है| आडवाणी और उमा से बेहतर सिद्घांतशास्त्री कल तक कौन था? लेकिन संघ और आडवाणी की भिड़ंत में [...]

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