Posts Tagged 'भारतीय राजनीति'

Posted by: on: April 17 2013 • Categorized in: Articles

दैनिक भास्कर, 17 अप्रैल 2013 : सारे देश में यह माना जा रहा है कि जनता दल (यू) ने नरेंद्र मोदी के विरुद्घ शंखनाद कर दिया है| यदि भाजपा नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर देगी तो यह गठबंधन टूट जाएगा| यह सोच सतही है और तर्क की तुला पर खरा नहीं उतरता| सबसे पहला प्रश्न [...]

Posted by: on: April 6 2011 • Categorized in: Articles

Dainik Bhaskar, 06 April 2011 : भ्रष्टाचार ने माहौल को इतना गर्म कर दिया है कि इस समय लोकपाल के मुद्दे की प्रतिध्वनि सारे देश में सुनाई पड़ रही है। लोकपाल का अर्थ है, ऐसे पद की स्थापना जो राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सर्वोच्च न्यायाधीश से लेकर छोटे से छोटे सरकारी कर्मचारी के भ्रष्टाचार को पकड़े [...]

Posted by: on: March 23 2011 • Categorized in: Articles

दैनिक भास्कर, 23 मार्च 2011 : कैसी विडंबना है कि जूलियान असांज जैसा आदमी हमारे प्रधानमंत्री के कथन को सफेद झूठ बता रहा है और यह भी कह रहा है कि वे जानबूझकर लोगों की आंखों में धूल झोंक रहे हैं| असांज को अदालत में घसीटना तो दूर रहा, भारत सरकार क्या उसके तीखे आरोपों [...]

Posted by: on: March 18 2011 • Categorized in: Articles

Jansatta, 18 March 2011 : किसी भी सरकार के लिए इससे ज्यादा बुरा वक्त क्या हो सकता है, जो मनमोहनसिंह-सरकार को देखना पड़ रहा है| जितने घोटाले इस सरकार के राज में एक साथ हुए हैं, अभी तक किसी भी सरकार के राज में नहीं हुए| इस सरकार ने जनता के पैसे की जैसी लूट [...]

Posted by: on: March 16 2011 • Categorized in: Articles

दैनिक भास्कर, दिल्ली, 16 मार्च 2011 : सारा देश इधर भ्रष्टाचार की खबरों से बिलबिला रहा है और वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी की हिम्मत देखिए कि उन्होंने सांसदों की स्थानीय विकास राशि दो करोड़ से बढ़ाकर पाँच करोड़ रू. कर दी| अब देश के प्रत्येक सांसद को हर साल पांच करोड़ रू. इसलिए मिलेंगे कि [...]

Posted by: on: March 16 2011 • Categorized in: Articles

Dainik Hindustan, 16 March 2011 : भारत की राजनीति में भ्रष्टाचार फिर एक बार बड़ा मुद्दा बन गया है, लेकिन हैरत की बात यह है कि किसी के पास उसका कोई ठोस इलाज नहीं दिख रहा। प्रधानमंत्री माफी मांग लेते हैं और विपक्षी दल की नेता उन्हें तुरंत माफ कर देती हैं। विपक्ष संयुक्त संसदीय [...]

Posted by: on: March 9 2011 • Categorized in: Articles

Dainik Bhaskar(BHOPAL), 09 March 2011 : आज सारा देश सदमे में है। वर्तमान सरकार की प्रतिष्ठा जितनी तेजी से पेंदे में बैठती जा रही है, आज तक किसी सरकार की नहीं बैठी। चीनी हमले और बोफोर्स के वक्त भी देश को धक्का लगा था, लेकिन दोनों प्रधानमंत्रियों की बाती बुझते-बुझते दो-ढाई साल लग गए थे। [...]

Posted by: on: January 15 2011 • Categorized in: Articles

जनसत्ता, 17 जनवरी 2011 : भाजपा की कार्यकारिणी के राष्ट्रीय अधिवेशन से भाजपा के कार्यकर्ता काफी उत्साहित मालूम पड़ते हैं लेकिन गुवाहाटी की इस नौटंकी में से निकला क्या ? यदि थोड़ी गहराई में जाएँ तो पता चलेगा कि कांग्रेस के दुर्भाग्य को भाजपा अपना सौभाग्य बनाने पर तुली हुई है| इससे ज्यादा कुछ नहीं| [...]

Posted by: on: December 15 2010 • Categorized in: Articles

संसद का यह सत्र जितना निष्फल रहा, पहले कोई सत्र नहीं रहा। संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को लेकर पहले भी हंगामे हुए, लेकिन सरकारों ने आखिरकार विपक्ष की बात मान ली। इस बार सरकार अड़ी रही, क्योंकि उसे पता है कि संसद में चाहे उसके गठबंधन का बहुमत है, लेकिन जेपीसी में वह अल्पमत में [...]

Posted by: on: December 1 2010 • Categorized in: Articles

Dainik Bhaskar (Bhopal), 01 Dec 2010 : लोकतंत्र में गोपनीयता का क्या काम है ? जब सारा शासन जनता के लिए, जनता द्वारा, जनता का है तो उसमें कोई भी बात छिपाने लायक क्यों होनी चाहिए ? यह तो आदर्श स्थिति है लेकिन व्यवहार में तो कुछ और ही होता है| जितनी बातें बताई जाती हैं, [...]

Posted by: on: November 25 2010 • Categorized in: Articles

दैनिक भास्कर, नई दिल्ली, 27 नवंबर 2010 | भारत के इतिहास की यह कितनी बड़ी विडंबना होगी| हमारे समाज के बारे में लिखा जाएगा कि भारत की सबसे भ्रष्ट सरकार उस समय हुई, जब डॉ. मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री थे| सबसे स्वच्छ प्रधानमंत्री की सबसे भ्रष्ट सरकार ! सचमुच भ्रष्टाचार के इतने बड़े और [...]

Posted by: on: September 8 2010 • Categorized in: Articles

Dainik Bhaskar, 8 Sept. 2010  :  मोटे तौर पर देखें तो भारत में सब ठीक-ठाक ही चल रहा है। न हम किसी युद्ध में फंसे हैं, न कोई दंगे हो रहे हैं, न चीन और पाकिस्तान की तरह हजारों लोग बाढ़ में मर रहे हैं, न सरकार के गिरने की कोई नौबत है। विकास दर [...]

Posted by: on: August 25 2010 • Categorized in: Articles

Dainik Bhaskar (Bhopal), 25 August 2010 : सांसदों का वेतन और सुविधाएं बढ़नी चाहिए, इसमें जरा भी शक नहीं है, लेकिन क्या वजह है कि इस बढ़ोतरी की इतनी निंदा हो रही है? क्या कारण है कि स्वयं सरकार भी स्थायी समिति के सुझाव को नहीं मान रही है और बढ़ोतरी में कंजूसी कर रही [...]

Posted by: on: April 30 2010 • Categorized in: Articles

Dainik Bhaskar, 30 April 2010 : लोकसभा में कटौती प्रस्ताव क्या गिरा उसने भारतीय राजनीति के चेहरे पर उगे हुए सारे फुंसी-फोड़े और मस्से उजागर कर दिये। कांग्रेस के संसदीय मामलों के प्रबंधक बेशक अपनी पीठ थपथपा सकते हैं कि उन्होंने विपक्ष को चारों खाने चित्त कर दिया लेकिन उन्हें भी पता है कि उनकी [...]

Posted by: on: April 29 2010 • Categorized in: Articles

Dainik Hindustan, 29 April 2010 : भारतीय लोकतंत्र में कई ऐसी चीजें हैं जो चौंका देती हैं। हमारी संसद में आमतौर पर ऐसे पांच या दस सदस्य भी नहीं होते, जो कुल मतों के 50 प्रतिशत से चुने जाते हों। स्पष्ट बहुमत से चुने हुए सदस्य पांच प्रतिशत भी नहीं होते यानी 95 प्रतिशत से ज्यादा सदस्यों को [...]

Posted by: on: January 7 2010 • Categorized in: Articles

हिन्दुस्तान, 7 जनवरी 2010 :  गुजरात विधानसभा ने अनिवार्य मतदान का विधेयक क्या पास किया, सारे देश में हंगामा मच रहा है| सारे देश से इस विधेयक का कोई संबंध नहीं है| यह सिर्फ गुजरात के लिए है| वह भी स्थानीय चुनावों के लिए ! विधानसभा और लोकसभा के चुनाव तो जैसे अब तक होते [...]

Posted by: on: September 23 2009 • Categorized in: Articles

दैनिक भास्कर, 23 सितंबर 2009 : किसे सादगी कहे और किसे अय्याशी ? हवाई जहाज की ‘इकॉनामी क्लास’ में यात्रi को सादगी कहा जा रहा है| इन सादगीवालों से कोई पूछे कि हवाई-जहाज में कितने लोग यात्र करते हैं ? मुश्किल से दो-तीन करोड़ लोग ! 100 करोड़ से ज्यादा लोग तो हवाई जहाज को [...]

Posted by: on: May 18 2009 • Categorized in: Articles

दैनिक भास्कर, 18 मई 2009 : इस चुनाव के सबसे चमत्कारी पहलू पर बहुत कम लोगों का ध्यान गया है| वह पहलू है, अखिल भारतीयता की पुष्टि ! पिछले 20 वर्षों में हर चुनाव ने अखिल भारतीयता को धक्का पहुंचाया| इंदिरा गांधी की शहादत के साये में हुए 1984 के चुनाव ने कॉंग्रेस को 400 [...]

Posted by: on: July 24 2008 • Categorized in: Articles

दैनिक भास्कर, 24 जुलाई 2008 : लोकसभा के अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से निकालकर माकपा ने क्या पा लिया? उसे यह संतोष तो हो सकता है कि अब सोमनाथ अगला चुनाव माकपा के झंडे तले नहीं लड़ पाऍंगे लेकिन माकपा के युवा नेताओं को यह तो सोचना चाहिए था कि किसको किसकी ज्यादा जरूरत [...]

Posted by: on: July 24 2008 • Categorized in: Articles

Navbharat Times, 24 July 2008 : यह कैसा विश्वास मत है? मत तो मिल गया, लेकिन विश्वास हिल गया। विश्वास की परवाह किसे है? न सत्तारूढ़ दलों को और न ही विपक्षी दलों को। दोनों पक्ष मत के चक्कर में मतवाले हुए जा रहे थे। कितनी आसानी से पक्ष और विपक्ष, दोनों के नेताओं ने मान लिया [...]

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