राष्ट्रीय सहारा, 28 July 2011 : मौलाना गुलाम मुहम्मद वस्तानवी को दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम के पद से हटाए जाने का असली अर्थ क्या है? इसे कुछ लोग धर्मनिरपेक्षता की हार बता रहे हैं तो कुछ मुस्लिम कट्टरपंथ की जीत कह रहे हैं और कुछ यह भी मान रहे हैं कि देवबंद के इस्लामी मदरसे से [...]
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दैनिक हिन्दुस्तान, 8 अप्रैल 2011 : अगर आज ईसा मसीह होते तो क्या करते ? अपना माथा कूट लेते| अगर कोई उन्हें टेरी जोन्स की हरकतों से वाकिफ करवा देता तो वे कहते कि ऐसे ईसाई धर्म से मेरा कोई लेना-देना नहीं है| फ्लोरिडा के किसी गुमनाम चर्च के पादरी जोन्स ने 20 मार्च को [...]
Dainik Bhaskar, 29 Jan 2011 : आरिफ मोहम्मद खान को इस देश में शाह बानो मामले के ‘हीरो’ के तौर पर जाना जाता है| मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए राजीव गांधी सरकार के जिस मंत्री ने सदन की चलती बहस के दौरान ही अपना इस्तीफा लिखकर भेज दिया, उस शख्स का नाम [...]
Dainik Bhaskar (Bhopal), 19 May 2010 : दारुल उलूम के जो दो-तीन ताजातरीन फतवे इधर विवादास्पद हो गए हैं, क्या वे इस लायक हैं कि उन पर ध्यान दिया जाए? जिन फतवों पर खुद इस्लामी लोग कन्नी काट रहे हैं और उर्दू अखबार जिनका मजाक उड़ा रहे हैं, उनका आम लोगों से क्या लेना-देना? ऐसे [...]
Dainik Hindustan, 1 Dec 2009 : जस्टिस लिब्रहान ने जिन एक हजार पन्नों पर अपनी रपट लिखी है, वे बर्बाद हो गए। उन्हीं एक हजार पन्नों पर यदि छोटे बच्चों को क ख ग पढ़ाया जाता तो उनका कुछ बेहतर इस्तेमाल होता। यह कैसी रपट है कि बाबरी मस्जिद तोड़नेवाले एक भी कारसेवक पर वह [...]
राष्ट्रीय सहारा, 29 जून 2009 : बुर्के के पक्ष में जितने तर्क हो सकते हैं, उससे कहीं ज्यादा उसके विरूद्घ हो सकते हैं लेकिन बुर्के पर प्रतिबंध लगाने का तर्क काफी खतरनाक मालूम पड़ता है| फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सारक़ोजी यदि अपनेवाली पर उतर आए तो कोई आश्चर्य नहीं कि वे बुर्का-विरोधी कानून पास करवा [...]
दैनिक भास्कर, 25 सितंबर 2008 : यह ठीक है कि हर आतंकवादी मुसलमान है लेकिन क्या हर मुसलमान आतंकवादी है? जब तक इस सवाल का हम सही जवाब नहीं ढूंढते, आतंकवाद का खात्मा असंभव है| सच्चाई तो यह है कि आतंकवाद और इस्लाम एक दूसरे के पर्याय नहीं हैं| इस्लाम को माननेवालों के अलावा भी [...]
रा. सहारा, 16 फरवरी 2008 : ऐसा लगता है कि आजकल तुर्की में उलटी गंगा बह रही है| दुनिया के सारे मुस्लिम देशों में औरतें आंदोलन कर रही हैं कि पर्दा हटे लेकिन तुर्की की औरते कहती हैं कि हमें पर्दा करने दो| क्या यह मॉंग अजीब-सी नहीं लगती? तुर्की को पिछड़ा हुआ या गरीब [...]
दैनिक भास्कर, 11 मार्च 2006 : ईरान और एराक के प्रति अमेरिकी नीतियाँ, बुश की भारत-यात्र और पैगंबर के कार्टूनों का कोई विरोध करे, इसमें ज़रा भी बुराई नहीं है| बुश- यात्रा का जमकर विरोध हीं होता तो भारत का बड़ा नुकसान हो सकता था| बुश का जितना विरोध हुआ, मनमोहनसिंह के हाथ उतने ही [...]
Nav Bharat Times, 22 Oct 2003 : इस्लामी सम्मेलन संगठन (ओ आई सी) में 57 राष्ट्र हैं| 57 राष्ट्र जिस अन्तरराष्ट्रीय संगठन के सदस्य हों, वह क्या नहीं कर सकता ? संयुक्तराष्ट्र संघ के बाद उसे सबसे अधिक शक्तिशाली मंच होना चाहिए था लेकिन पिछले 34 साल में वह चूं-चूं का मुरब्बा बनकर रह गया| [...]
R Sahara, 6 Aug 2003 : सबके लिए निजी कानून एक जैसा हो, इस अल्लाह की गाय पर लठ्मलट्ठा क्यों शुरू हो गया है? उच्चतम न्यायालय ने यह पहली बार नहीं कहा है| शाह बानो और सरला दलाल के मामलों में वह पहले भी संसद से अनुरोध कर चुका है कि देश के सभी नागरिकों [...]
Jansatta, 20 Oct 2002 : मुसलमान आखिर कौन हैं, कैसे हैं, कहाँ से आए हैं, क्या करते हैं, क्या सोचते हैं, कैसे रहते हैं, गैर-मुस्लिमों से उनके रिश्ते कैसे हैं, उनके प्रति गैर-मुस्लिमों का रवैया क्या है, मुस्लिम जगत के प्रति उनका अपना रवैया क्या है, भारत और मुसलमान साथ-साथ रह सकते हैं या नहीं [...]
नवभारत टाइम्स, 8 मार्च 2002 : गुजरात में जो हुए, वे दंगे नहीं थे| दंगों में मार-काट दोतरफ़ा होती है| यहाँ तो एकतरफा हमले हुए| पहले मुसलमानों ने एकतरफा हमला किया और फिर हिन्दुओं ने भी एकतरफा हमला किया| हमले दोनों तरफ से हुए लेकिन एक के बाद एक ! एक साथ दोनों तरफ से [...]