Posts Tagged 'हिंदी'

Posted by: on: September 14 2011 • Categorized in: Articles

14 Sept 2011 : संयुक्तराष्ट्र संघ में अगर अब भी हिंदी नहीं आएगी तो कब आएगी ? हिंदी का समय तो आ चुका है लेकिन अभी उसे एक हल्के-से धक्के की जरूरत है| भारत सरकार को कोई लंबा चौड़ा खर्च नहीं करना है, उसे किसी विश्व अदालत में हिंदी का मुकदमा नहीं लड़ना है, कोई [...]

Posted by: on: September 14 2011 • Categorized in: Articles

Dainik Bhaskar, 14 Sept. 2011 :   संयुक्तराष्ट्र संघ में अगर अब भी हिंदी नहीं आएगी तो कब आएगी ? हिंदी का समय तो आ चुका है लेकिन अभी उसे एक हल्के-से धक्के की जरूरत है| भारत सरकार को कोई लंबा चौड़ा खर्च नहीं करना है, उसे किसी विश्व अदालत में हिंदी का मुकदमा नहीं लड़ना [...]

Posted by: on: September 14 2010 • Categorized in: Articles

दैनिक भास्कर, 14 सितंबर 2010 | यह सवाल ‘भास्कर’ को पूछना चाहिए था, देश के गांधीवादियों से, आर्य समाजियों से, समाजवादियों से, संघियों से, हिंदी साहित्य सम्मेलनों से और दक्षिण के हिंदी प्रचारकों से लेकिन उन्होंने यह मुझसे पूछ लिया है| क्यों पूछा है, यह तो वे ही बता सकते हैं लेकिन इस सवाल का [...]

Posted by: on: April 7 2010 • Categorized in: Articles

Dainik Bhaskar (Bhopal), 7 April 2010 : हमारे देश का भद्रलोक अंग्रेजों का उत्तराधिकारी क्यों बना हुआ है? यह बगुलाभगत अपने स्वार्थ की माला जपना कब बंद करेगा? दिमागी गुलामी और नकल से भारत का छुटकारा कब होगा? इसकी पहल जनता को ही करनी होगी। गुलामी के खंडहरों को ढहाने का अभियान यदि जनता स्वयं [...]

Posted by: on: July 28 2009 • Categorized in: Articles

दैनिक भास्कर, 28 जुलाई 2009 :  कर्नाटक सरकार बच्चों की पढ़ाई के लिए कन्नड़ माध्यम को अनिवार्य बनाना चाहती है| उच्चतम न्यायालय ने कर्नाटक सरकार के इस फैसले को रद्रद कर दिया है| न्यायालय का निर्णय सही है, क्योंकि पहली से पांचवीं तक के सभी बच्चों पर अगर आप कन्नड़ माध्यम थोपेंगे तो आप अपना [...]

Posted by: on: April 20 2009 • Categorized in: Articles

Navbharat Times, 20 April 2009 : हिंदुस्तान को खुद पर शर्म कब आएगी? कितनी शन्नो अयूब मरेंगी, तब इस देश की नींद खुलेगी? लाखों शन्नो रोज अंग्रेजी की प्राणलेवा चक्की में पिस रही हैं लेकिन उनकी कराह हमारे कानों तक नहीं पहुंचती, क्योंकि वे मरती नहीं हैं। बेचारी शन्नो मर गई, तभी देश को पता चला कि एक [...]

Posted by: on: April 14 2009 • Categorized in: Articles

दैनिक भास्कर, 14 अप्रैल 2009 : हिंदुस्तान को खुद पर शर्म कब आएगी ? कितनी शन्नो अयूब मरेंगी, तब इस देश की नींद खुलेगी ? लाखों शन्नो रोज अंग्रेजी की प्राणलेवा चक्की में पिस रही हैं लेकिन उनकी कराह हमारे कानों तक नहीं पहुंचती, क्योंकि वे मरती नहीं है| बेचारी शन्नो मर गई, तभी देश [...]

Posted by: on: April 28 2008 • Categorized in: Articles

दैनिक भास्कर, 28 अप्रैल 2008 : प्रो. यशपाल यों तो हैं, वैज्ञानिक लेकिन बात उन्होंने ऐसी कह दी है, जो महात्मा गांधी और राममनोहर लोहिया ही कह सकते थे| आजकल वे एनसीईआरटी की राष्ट्रीय पाठ्रयक्रम समिति के अध्यक्ष हैं| इस समिति का काम देश भर की शिक्षा-संस्थाओं के लिए पाठ्रयक्रम बनाना है| ऐसी कई समितियॉं [...]

Posted by: on: July 21 2007 • Categorized in: Articles
Posted by: on: July 16 2007 • Categorized in: Articles

नवभारत टाइम्स, 16 जुलाई 2007 : इस बार विश्व हिंदी सम्मेलन का सारा ज़ोर इस बात पर रहा कि हिंदी संयुक्तराष्ट्र की भाषा कैसे बने| सम्मेलन का आयोजन संयुक्तराष्ट्र के परिसर में हुआ और संयुक्तराष्ट्र के महासचिव बान की मून ने उसका उदघाटन किया| इधर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भी अपने संदेश में हिंदी [...]

Posted by: on: April 20 2007 • Categorized in: Articles

रा सहारा, 20 अप्रैल 2007 : संयुक्तराष्ट्र संघ में अगर अब भी हिंदी नहीं आएगी तो कब आएगी ? हिंदी का समय तो आ चुका है लेकिन अभी उसे एक हल्के-से धक्के की जरूरत है| भारत सरकार को कोई लंबा चौड़ा खर्च नहीं करना है, उसे किसी विश्व अदालत में हिंदी का मुकदमा नहीं लड़ना [...]

Posted by: on: January 19 2007 • Categorized in: Articles

राष्ट्रीय सहारा, 19 जनवरी 2007 : राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के अध्यक्ष सेम पित्रेदा के भोलेपन पर तरस आने के अलावा क्या आ सकता है ? उन्होंने प्रधानमंत्री को सिफारिश भेज दी है कि भारत के सभी बच्चों को पहली कक्षा से अंगे्रजी पढ़ाओ और अनिवार्य रूप से पढ़ाओ| पित्रेदा का आशय पवित्र् है| इरादा गलत [...]

Posted by: on: January 22 2006 • Categorized in: Articles

राष्ट्रीय सहारा, 22 जनवरी 2006 : हर 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मनाया जाएगा, यह घोषणा सरकार ने इतनी दबी जुबान से की है कि बहुत से हिंदी अखबारों को ही कुछ पता नहीं चला है हैदराबाद के प्रवासी सम्मेलन के दौरान सरकार को याद आया कि पहला विश्व हिंदी सम्मेलन नागपुर में 10 [...]

Posted by: on: October 21 2005 • Categorized in: Articles

NavBharat Times, 21 Oct 2005 : हिंदी का कारवां किधर जा रहा है? वह आगे बढ़ रहा है या पीछे हट रहा है? साफ-साफ कुछ नहीं कहा जा सकता| इसका जवाब हां या ना में नहीं हो सकता| आगे बढ़ना और पीछे हटना परस्पर विरोधी क्रियाएं हैं| यदि ये एक साथ हों तो गाड़ी जहां [...]

Posted by: on: September 11 2005 • Categorized in: Articles

Jansatta, 11 Sept 2005 : हिंदी दिवस के अवसर पर अपने पाठकों के लिए हम डॉ  वेदप्रताप वैदिक का यह विशेष लेख प्रकाशित कर रहे हैं| डॉ  वैदिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जाने-माने विशेषज्ञ तो हैं ही, भारत मे उनकी पहचान भारतीय भाषाओं के समर्थ सेनानी के रूप में है| महर्षि दयानंद, महात्मा गांधी और डॉ [...]

Posted by: on: September 14 2004 • Categorized in: Articles

दैनिक भास्कर,  14 सितंबर 2004 :

Posted by: on: August 21 2004 • Categorized in: Articles

राष्टीय सहारा,  21 अगस्त 2004:

Posted by: on: December 6 2003 • Categorized in: Articles

R Sahara, 6 Dec 2003 : तीन मूर्ति भवन में हुई अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी ने हमारी ऑंखें खोल दीं| इस संगोष्ठी में चीन, जापान, यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका आदि से लगभग दर्जन भर विद्वान आए थे| चीनी विद्वान प्रो. कुई ने जो कुछ कहा था, वह आपने पिछले हफ्ते पढ़ा| दूसरे दिन की संगोष्ठी की अध्यक्षता करने [...]

Posted by: on: November 30 2003 • Categorized in: Articles

R Sahara, 30 Nov 2003 : हिन्दी की अन्तरराष्ट्रीय स्थिति पर तीन मूर्ति भवन में संगोष्ठी चल रही है| अनेक देशों के विद्वान आए हुए हैं| चीन के युवा प्राध्यापक ज्यांग जिंग कुई ने चीन में हिन्दी की स्थिति पर अच्छा प्रकाश डाला| कैसे चीनी-हिन्दी शब्दकोश बन रहा है, कैसे रामचरितमानस का चीनी पद्यानुवाद हुआ, [...]

Posted by: on: September 14 2003 • Categorized in: Articles

Hindustan, 14 Sept. 2003 : हिन्दी को ‘हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान’ के नारे  के साथ जोड़ना सरासर गलत है | पहली बात तो यह कि हिन्दी सिर्फ हिन्दुओं की भाषा नहीं है | यदि यह हिन्दुओं की ही भाषा है तो अमीर खुसरो, रहीम, रसखान, मलिक मुहम्मद जायसी, कुतबन, मंझन, ताजबीबी, आलम, रसलीन  आदी को क्या [...]

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