दैनिक भास्कर, 11 अक्टूबर 2007 : सरकार को यों तो दस दिन की मोहलत और मिल गई है लेकिन वह यह समझ नहीं पा रही है कि कम्युनिस्टों के साथ चल रही रस्साकशी में वह रोज़ अपना कितना नुकसान करती जा रही है| 22 अक्तूबर तक मोहलत मिलने के कारण सेंसक्स में तो उछाल आ [...]
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जनसत्ता, 9 अक्टूबर 2007 : जनरल परवेज मुशर्रफ यों तो राष्ट्रपति का चुनाव जीत गए हैं लेकिन, ये जीत भी क्या जीत है? यह ऐसी जीत है, जिसकी विधिवत घोषणा नहीं हो सकती, क्योंकि मुशर्रफ का चुनाव विधिसम्मत है या नहीं, यह सर्वोच्च अदालत 17 अक्तूबर के बाद तय करेगी| अदालत का रवैया विचित्र् है| [...]
NavBharat Times, 06 Oct 2007 : भारत क्या करे? अपने राष्ट्रहितों की रक्षा करे या पड़ोसी देशों में लोकतंत्र की रक्षा करे? अपना राष्ट्रहित बड़ा है या दूसरों कालोकतंत्र? भारत के चारों तरफ लोकतंत्र लहूलुहान हुआ पड़ा है और भारत ने अपने होंठ सिले हुए हैं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत का दुखड़ा यह है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश [...]
रा. सहारा, 21 सितंबर 2007 : माओवादियों ने कोईराला सरकार से इस्तीफा क्या दिया, नेपाल को दुबारा चौराहे पर ला खड़ा किया है| अभी केवल चार माओवादी मंत्री ही सरकार से बाहर आए हैं| कोई आश्चर्य नहीं कि सारे माओवादी सांसद अपने पद से इस्तीफा दे दें| यों तो आज की नेपाली सरकार और संसद [...]
जनसत्ता, 7 सितंबर 2007 : रावलपिंडी में हुए दो बम-विस्फोटों ने मुशर्रफ-बेनज़ीर सौदेबाजी के कोढ़ में नई खाज पैदा कर दी है| जिस आधार पर अमेरिका इस समझौते को बढ़ावा दे रहा है, वह ढहता हुआ नज़र आ रहा है| अमेरिका का लक्ष्य बहुत सीमित है| तानाशाह से भी हाथ मिलाना पड़े तो उसे कोई [...]
रा. सहारा, 1 सितंबर 2007 : परमाणु समझौते के सवाल पर भाजपा के बदलते हुए पैतरे जनता के लिए एक पहेली बन गये है| क्या प्रतिपक्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी ने शीर्षासन कर दिया था? क्या उन्होंने मनमोहनसिंह-सरकार से गुपचुप हाथ मिला लिया था? क्या अमेरिकियों ने उन्हें अपने जाल में वैसे ही फॅंसा लिया है, [...]
Navbharat Times, 29 Aug 2007 : क्या अब हैदराबाद भी आतंकवाद की सूची में एक और नाम की तरह टांग दिया जाएगा? लगता तो यही है। हर आतंकवादी खून-खराबे के बाद हमारे नेतागण जैसे मगरमच्छ के आंसू हमेशा बहाते हैं, वैसे उन्होंने अब भी बहा दिए हैं। हताहतों के प्रति सहानुभूति और सरकारी ढिलाई की निंदा करके [...]
दैनिक भास्कर, 22 अगस्त 2007 : इस समय सबसे ज्वलंत प्रश्न यही है कि क्या मनमोहन-सरकार गिर जाएगी? और गिर गई तो देश की राजनीति किधर जाएगी? परमाणु-समझौते का क्या होगा? भारत की विदेश नीति पर उसका क्या असर पड़ेगा? सरकार के गिरने का अंदेशा इसलिए बढ़ गया है कि वामपंथियों द्वारा निकाला गया मध्यम [...]
Rastriya Sahara, 22 Aug 2007 : समझ में नहीं आता कि डॉ. मनमोहन सिंह ने अपनी सरकार को दॉंव पर क्यों लगा दिया है? इस परमाणु समझौते के कारण वह यह भी भूल गए कि वे जनता के द्वारा चुने हुए नहीं, सोनिया गांधी के द्वारा नियुक्त प्रधानमंत्री हैं| इस परमाणु समझौते में ऐसा क्या [...]
Dr. Vaidik’s Interview on Afghanistan Donna Jacobs Citizen Special Monday, August 06, 2007 (TheOttawa Citizen 2007, USA) : If western military forces pull out of Afghanistan too soon, says a friend of Mohammed Zaher Shah, the country’s aged last king who died on July 23, “the situation might explode in such a manner that you’ll [...]
नवभारत टाइम्स, 16 जुलाई 2007 : इस बार विश्व हिंदी सम्मेलन का सारा ज़ोर इस बात पर रहा कि हिंदी संयुक्तराष्ट्र की भाषा कैसे बने| सम्मेलन का आयोजन संयुक्तराष्ट्र के परिसर में हुआ और संयुक्तराष्ट्र के महासचिव बान की मून ने उसका उदघाटन किया| इधर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भी अपने संदेश में हिंदी [...]
दैनिक भास्कर 8 जुलाई 2007 : लाल मस्जिद के खिलाफ सैनिक कार्रवाई करके जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने एक तीर से कई निशाने साध लिये हैं| सबसे पहले तो पाकिस्तानी अखबारों के मुखपृष्ठों से मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी लगभग नदारद हो गए हैं| सारे अखबार और टी.वी. चैनल लाल मस्जिद की लाली से लाल हो रहे [...]
नवभारत टाइम्स, 28 June 2007 : अब से डेढ़ साल पहले किसने सोचा था कि फलस्तीन के दो टुकड़े हो जाऍंगे और वहॉं भी एक नए अल-क़ायदा की नींव पड़ सकती है| सच्चाई तो यह है कि पिछले 59 साल में उसके तीन टुकड़े हो गए हैं| पहले इस्राइल और फलस्तीन बने और अब ‘फतहस्तान’ [...]
जनसत्ता, 19 जून 2007 : जनरल परवेज़ मुशर्रफ अब जाऍंगे या रहेंगे, यह प्रश्न दिल्ली के कूटनीतिक तबकों में आजकल जमकर पूछा जा रहा है| यह प्रश्न अभी तक इसीलिए नहीं पूछा गया था कि बलूच नेता अकबर बुगती की हत्या और मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी के बावजूद मुशर्रफ की शेष सारी गोटियॉं फिट मालूम [...]
NavBharat Times, 16 June 2007 : सत्तारूढ़ दल ने प्रतिभा पाटिल को अपना उम्मीदवार बनाया तो लोग यह मानकर चल रहे हैं कि अगली राष्ट्रपति वही होंगी। संजीव रेड्डी के अपवाद को भूल जाएं तो अब तक ऐसा ही होता आया है। यदि प्रतिभा राष्ट्रपति महोदया कहलाएंगी, तो स्वतंत्र भारत केइतिहास में यह 1 नई बात होगी। भारत ने दुनिया को उस [...]
राष्ट्रीय सहारा, 12 जून 2007 : भारत-अमेरिका वार्ता भंग नहीं नहीं हुई, यह खुशी की बात है| अगर वह सफल हो जाती तो वह दुनिया का आठवाँ आश्चर्य होता| वह सफल हो जाए, यह कौन नहीं चाहेगा? यदि दोनों राष्ट्रों के बीच परमाणु-सहयोग के दरवाज़े खुल जाएँ तो पता नहीं ऊर्जा के कौन-कौन से एरावत [...]